पिछले सप्ताह केंद्र की यूपीए सरकार ने अपने 4 साल पूरे कर लिए। इस मौके पर सरकार की गतिविधियों और उपलब्धियों के बारे में एक तुलनात्मक रिपोर्ट जारी की गई।
‘रिपोर्ट टु द पीपुल 2008’ में सरकार के स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास योजनाओं का खास बखान किया गया है। इसमें इस पर भी खासा जोर दिया गया है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान तेजी से समग्र विकास हुआ है।
भारत निर्माण तथा राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की पहुंच इस साल देश भर में किए जाने की प्रशंसा की गई है। आर्थिक विकास के क्षेत्र में इस सरकार का चार सालों का प्रदर्शन बेहतर रहा है, लेकिन महंगाई दर ने इसे फीका कर दिया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस क्षेत्र में सरकार का कुल मिलाकर बेहतर प्रदर्शन रहा है, इसमें महंगाई को एक अपवाद के रूप में बताया गया है जो अंतरराष्ट्रीय प्रभावों के चलते कुछ महीनों से बढ़ रही है, जिस पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। अगर कोई रिपोर्ट को गहनता से देखे तो यही लगता है कि इसे 2009 में प्रस्तावित आम चुनावों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, जिसमें यह विश्वास झलकता है कि मतदाता सकारात्मक रुख अपनाते हुए सरकार के इस रिकार्ड को समर्थन देंगे।
बहरहाल न तो अर्थव्यवस्था और न ही राजनीति, चीजों को उस तरह से लेती हैं, जैसी दिखती हैं। इस बात पर कोई सवाल नहीं उठा सकता कि पिछले पांच साल में भारत को वैश्विक निवेश के मामले में सम्मानजनक स्थान मिला है। पांच साल पहले दुनिया भारत की आर्थिक क्षमता के बारे में बात करती थी, आज यह क्षमता हकीकत में बदल गई है।
हाल के दिनों में आधारभूत ढांचे के मोर्चे पर भी सफलता नजर आने लगी है। हवाई अड्डों का निजीकरण और अल्ट्रा मेगा पॉवर प्रोजेक्ट्स इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं, हालांकि इसका लाभ मिलना अभी शुरू नहीं हुआ है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि आधारभूत ढांचे की मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ा है। इसका असर मतदाताओं के विकास और जीवन स्तर, दोनों पर पड़ रहा है।
अगर समग्रता के मुद्दे पर गौर करें तो परिणाम ही मायने रखता है, न कि कार्यक्रम और पहल। शायद इस मुद्दे पर सरकार पटरी से उतरी हुई नजर आती है। हाल ही में जो घोषणाएं की गई हैं उससे यही लगता है कि सरकार अपने दो दशक पुराने, कड़े नियंत्रण की रणनीति की ओर वापस जा रही है। कुल मिलाकर यह बेहतर संकेत नहीं है। राजनीति के मोर्चे पर पिछले कुछ महीनों से यूपीए सरकार का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा है।
गुजरात, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में हाल में हुए विधानसभा चुनावों में यूपीए सरकार को हार का सामना करना पड़ा। हालांकि इन चुनावों में स्थानीय मुद्दों का महत्वपूर्ण स्थान रहता है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि सरकार के प्रदर्शन को लेकर निराशा है। वर्तमान राजनीति की सबसे काली सच्चाई यही है, सरकार की उपलब्धियां जो भी हों, वह लोगों की उम्मीदों की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही हैं।