Categories: लेख

आखिर किसके लिए काम कर रही है सरकार?

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 6:41 PM IST

मुकेश और अनिल अंबानी के बीच कृष्णा गोदावरी बेसिन से 28 एमएमएससीएमडी (मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर प्रतिदिन) प्राकृतिक गैस की आपूर्ति को लेकर बंबई उच्च न्यायालय में कानूनी लड़ाई चल रही है। इस मामले में सरकार अभी भी ऊहापोह की हालत में है।

पिछले दो साल में कम से कम तीन बार ऐसी घटनाएं हुईं (पिछली घटना अभी कुछ ही दिन पहले हुई) जिसमें सरकार ने मुकेश अंबानी का पक्ष लिया, जिससे यह सुनिश्चित हो सके, कि पुराने समझौते के मुताबिक आरआईएल गैस की आपूर्ति न कर सके। लेकिन यहां पर कुछ ऐसे तथ्य हैं, जिन पर विचार करना जरूरी है।

2003 में सरकार की कंपनी एनटीपीसी ने एक निविदा आमंत्रित की, जिसमें कहा गया कि जो भी 12 एमएमएससीएमडी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति 17 साल के लिए कवास और गंधार संयंत्रों को कर सकता है, वह भाग ले सकता है।

रिलायंस ने इसका ठेका हासिल कर लिया, जब उसने 2.34 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू (मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट) की दर से बोली लगाई। इसमें कंपनी ने कुछ अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को भी पीछे छोड़ा था। इसके बाद 2005 के अंत में आरआईएल ने एनटीपीसी के साथ हुए समझौते में कुछ संशोधन किया।

उसने गैस की आपूर्ति की देयता को कम करने की बात कही। बहरहाल एनटीपीसी ने इसे मानने से इनकार कर दिया और उसने कंपनी के खिलाफ बंबई उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दी।

एनटीपीसी ने कहा कि आरआईएल इसके पहले हुए मूल समझौते का सम्मान करे। जब एनटीपीसी समझौता हुआ था उसी के आसपास 2004 की शुरुआत में आरआईएल ने रिलायंस एनर्जी के 7,480 मेगावाट के दादरी विद्युत संयंत्र को 28 एमएमएससीएमडी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने का समझौता किया था।

यह समझौता उसी दर पर हुआ था, जिस पर एनटीपीसी को गैस आपूर्ति करनी थी। उस समय रिलायंस उद्योग का विभाजन नहीं हुआ था। जब रिलायंस परिवार के कारोबार का बंटवारा हुआ, उनके बीच इस बात पर सहमति हुई थी कि आरआईएल के 20 लाख शेयरधारकों का मामला न्यायालय में तय होगा।

जब विभाजन पर फैसला हो रहा था, उसी समय अनिल अंबानी ने आरोप लगाया कि आरआईएल जो सभी कंपनियों का नियंत्रण करती है, के कुछ नियमों में हेरफेर की गई है। 

इसमें गैस की आपूर्ति और उसकी कीमतों का मामला भी शामिल था। इस मामले को लेकर अनिल अंबानी ने बंबई उच्च न्यायालय में अक्टूबर 2007 में याचिका दायर की।

न्यायालय ने कहा कि दोनों पक्ष पारिवारिक समझौते की मूल प्रति के मुताबिक आपस में सहमति बनाकर 4 महीने में समझौता करें।

आरआईएल ने यह कहते हुए अपील की कि पारिवारिक समझौते पर मुकेश ने अंबानी परिवार के सदस्य के रूप में हस्ताक्षर किए थे, न कि आरआईएल की ओर से।

तर्क-वितर्क के बीच पिछले सप्ताह न्यायालय ने कहा कि दोनों भाइयों को इस मामले में अपनी मां से पूछना चाहिए, जिससे शांति बहाल हो सके।
ठ्ठसरकार की स्थिति यह है कि उसे एनटीपीसी मामले को भी देखना है।

साथ ही वह कुछ इस तरह कर रही है, जिससे आरआईएल को संरक्षण मिल सके। जहां इस मामले में न्यायालय में पहले दौर की सुनवाई पूरी हो गई है, एनटीपीसी की मामले में कार्यवाही धीरे-धीरे चल रही है।
अब सरकार की स्थिति देखें। प्रोडक्शन शेयरिंग कांट्रैक्ट (पीएससी) के मुताबिक किसी भी गैस या तेल का कारोबार करने वाले को तेल या गैस का कुछ हिस्सा सरकार को देना होता है।

इसलिए मई 2006 में आरआईएल ने तेल एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को, जिसके मुखिया मुरली देवड़ा हैं, एक पत्र भेजा और कहा कि आप अनिल अंबानी से हुए कॉन्ट्रैक्ट को स्वीकृति प्रदान करें। मंत्रालय ने यह कहते हुए समझौते को निरस्त कर दिया कि इसमें खुली प्रतिस्पर्धा के आधार पर बोली नहीं लगी थी।

एक तरफ तो सरकार ने कहा कि कानूनी रूप से आरआईएल, अनिल अंबानी को गैस नहीं बेच सकती है। यह फैसला पूरी तरह से बेमानी था,  उधर यह भी कहा गया कि सरकार का मतलब केवल राजस्व लेने तक सीमित रहता है- मुकेश किसी भी कीमत पर या मुफ्त में गैस दे सकते हैं अगर वे बाजार भाव पर सरकार के हिस्से का राजस्व अदा करें। 

जहां तक समझौते की वैधानिकता का सवाल है, वह बिल्कुल सही है क्योंकि उसी दर पर एनटीपीसी को भी गैस आपूर्ति किए जाने का समझौता हुआ था, जो दर प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से तय हुई थी।
इस साल 25 जून को उच्चाधिकार प्राप्त मत्रिसमूह की सिफारिशें आईं, जिसमें गैस के उपभोग की नीति तय की गई।

इसमें प्राथमिकता निर्धारित की गई कि किसे पहले गैस की आपूर्ति की जाएगी और किसे बाद में। इसमें सभी गैस परियोजनाओं  के लिए सामान्य नियम बनाए गए लेकिन आरआईएल के केजी बेसिन के लिए अलग से दिशानिर्देश दिए गए।

गैस उपयोग नीति में यह तय किया गया कि न तो एनटीपीसी और न ही अनिल अंबानी की दादरी परियोजना के लिए आरआईएल से गैस की आपूर्ति होगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अगर अनिल अंबानी बंबई उच्च न्यायालय में मुकदमा जीत जाते हैं, तो क्या होगा।

शायद सरकार यह कहे कि उच्चाधिकार प्राप्त मंत्रिसमूह ने अपनी संस्तुति दे दी हैं, इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। तब शायद अनिल अंबानी के मित्र अमर सिंह के हाथ आई ताकत काम आए?

पिछले गुरुवार को न्यायालय में सुनवाई के दौरान सरकारी वकील  टीएस दोआबिया (सेवानिवृत्त न्यायाधीश) ने न्यायालय में कहा कि एनटीपीसी ने आरआईएल से अंतिम समझौता नहीं किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो उन्होंने बंबई उच्च न्यायालय में एनटीपीसी के मामले को बिगाड़ दिया, जिसे भारत के सॉलिसिटर जनरल देख रहे थे।

बहरहाल अगर एनटीपीसी ने आरआईएल के साथ अंतिम समझौता नहीं किया है, तो वह 2003 में हुए समझौते के तहत आरईएल को गैस की आपूर्ति करने को नहीं कह सकती है जब तेल की कीमतें कम थीं, जबकि अब बहुत ज्यादा हो चुकी हैं।

अब देखना यह है कि क्या एनटीपीसी को इस वक्तव्य का खंडन करने की अनुमति मिलती है या नहीं। तथा इसका आरआईएल के खिलाफ उसके मामले पर क्या असर होगा।

लेकिन एक बात स्पष्ट है कि  डॉ. मनमोहन सिंह के 17 साल के आर्थिक सुधारों के बाद भी तटस्थ सरकार अभी कोसों दूर है।

First Published : August 24, 2008 | 11:28 PM IST