पिछले पांच साल से चली आ रही शानदार वृद्धि की खुमारी कुछ उतरती सी नजर आ रही है। एक मुश्किल वक्त ने दस्तक दे दी है और यह लगभग सारे सेक्टरों को प्रभावित कर रहा है।
हफ्ते दर हफ्ते राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्य बद से बदतर होता जा रहा है। जहां तक भारत की बात है तो चालू राजनीतिक उठापठक और अनिश्चितता बहुत ही खराब समय में चल रही है। यह स्थिति इस मायने में बेहतर हो सकती है कि सरकार 22 जुलाई को संसद में होने वाले विश्वासमत में सरकार दम तोड़ दे और आम चुनावों के परिणामों के बाद देश को एक बेहतर गठबंधन सरकार मिले।
इस समय शेयर बाजार का संवेदी सूचकांक पिछले 15 महीनों के न्यूनतम स्तर के आसपास मंडरा रहा है, हर पल के साथ बढ़ती महंगाई से लोग त्राहिमाम करते नजर आ रहे हैं, ऐसे में ‘खुशनुमा वक्त’ का इंतजार कर रही निजी कंपनियों (सरकारी कंपनियां भी) का क्या रुख होना चाहिए? उन सबको मूलभूत चीजों के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए और वापस उनकी दिशा में लौटकर शुरुआत करनी चाहिए। ज्यादा दूर न जाएं, कुछ समय पहले के ही तेजी के दौर की बात करते हैं जब भारत और भारतीय कोई गलती करते नहीं दिखाई पड़ रहे थे।
बहुत सारी कंपनियां अपने कारोबार का दायरा बढ़ाने के काम में जुटी थीं। इसमें बहुत सारी दिग्गज कंपनियां भी शामिल हैं। वास्तव में ये कंपनियां अपने कारोबार को कई शाखाओं में फैलाने की योजना पर काम कर रही थीं। इनमें से कई डाइवर्सिफिकेशन बहुत कारगर भी साबित हुए। सही मायनों में किसी ने भी भारत में आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य के इतनी तेजी से बिगड़ने का अंदाजा नहीं लगाया था। इस समय सावधानी बरतना ही सबसे बड़ा साहस साबित होगा।
इस समय मुख्य (न केवल कोर सेक्टर बल्कि मुख्य उपभोक्ता या ग्राहक और बाजार) बाजार और मुनाफा देने वाले व्यवसायों पर ही ध्यान देना सही रहेगा। इससे न केवल बुरे वक्त से बचा जा सकता है बल्कि यह कारोबार जगत को मजबूती भी देगा। इस कदम से आने वाले वर्षों में भारत में मिलने वाले अवसरों का फायदा उठाने में भी मदद मिलेगी। पिछले कुछ सालों में जमीन-जायदाद की आसमान छूती कीमतों को देखते हुए कपड़े और अन्य दूसरी विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियां रियल एस्टेट के कारोबार की ओर मुखातिब हुई हैं।
इनमें से अधिकतर कंपनियां ऐसी थीं, जिनको रियल एस्टेट कारोबार का कोई तजुर्बा नहीं था जबकि कुछ कंपनियां थोड़े बहुत अनुभव के साथ ही इस कारोबार में उतर आईं। नतीजतन अब ये कंपनियां घाटा उठाने को मजबूर हैं और उनके बहुत सारे प्रोजेक्ट आधे-अधूरे पड़े हैं। इनके पास अपनी स्थिति को बेहतर करने का अवसर अभी भी मौजूद है। इनको वापस उसी कारोबार पर अधिक ध्यान देना चाहिए जिसके ये मंजे हुए खिलाड़ी हैं और जिसमें ये पहले से बेहतर करते आए हैं। इनको अपनी सारी ऊर्जा और तजुर्बे को अपने पुराने कारोबार को मजबूत करने में लगाना चाहिए।
उपभोक्ता वस्तुओं और सेवा आधारित व्यवसायों को चढ़ती मांग को तुरंत प्रगतिशील विचारों के साथ देखना चाहिए। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों को ग्राहकों पर लादना बहुत असंगत होगा क्योंकि ग्राहक तो पहले ही महंगाई की मार से परेशान हैं। अगर कीमतों में और इजाफा होता है तो ग्राहक खरीदारी के लिए हतोत्साहित ही होंगे जिससे कई तरह के कारोबारों का भविष्य प्रभावित हो सकता है। अभी तक ऐसे कुछ उदाहरण सामने भी आए हैं।
हवाई यात्रियों की संख्या में कमी के बावजूद भी विमानन कंपनियां किराया बढ़ाने पर आमादा हैं, प्रीमियम और दूसरे कई तरह के होटल अपने महंगे टैरिफ पर डटे हुए हैं जबकि वह जानते हैं कि उनके होटलों में रुकने वाले कम होते जा रहे हैं, रियल एस्टेट डेवलपर्स और इस क्षेत्र में काम कर रहे कंसल्टेंट अविश्वसनीय आंकड़े पेश कर रहे हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक कई बड़े शहरों में जमीन-जायदाद के दाम नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं जिससे प्रॉपर्टी की खरीद कम हो रही है। इसके अलावा शॉपिंग मॉल, व्यावसायिक और आवासीय संपत्तियों के मालिक भी लोगों को लुभाने के लिए किराये में कमी की नहीं सोच रहे हैं।
दूसरी ओर एफएमसीजी कंपनियां या तो अपने उत्पादों की कीमतें बढ़ा रही है या फिर उनके प्रचार पर किए जाने वाले खर्च में कटौती कर रही हैं। मुश्किल हालात में उत्पाद और विपणन की नई सोच (गुणवत्ता को छोड़कर दूसरे खर्चों में कटौती करके) ही बेड़ा पार लगा सकती है। लब्बोलुआब यही है कि इस वक्त में इसी सोच के सहारे काम करना ही फायदे का सौदा है। कई कंपनियां लागत में कटौती करने में कामयाब रही हैं। यही वक्त की जरुरत भी है। लागत वसूलने का आखिरी रास्ता ग्राहकों के जरिये ही हो सकता है।
नई तकनीकों को अपनाना, बढ़िया स्वचालन, बड़े पदों में कटौती और उत्पादन इकाइयों को ऐसी जगह पर लगाना जहां उसके परिचालन में कम खर्च आए। ये कुछ ऐसे रास्ते हैं जो परिचालन में आने वाली लागत में कटौती करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि बाहरी व्यापार परिदृश्य में परिवर्तनों की यह रफ्तार अपवाद ही है। कारोबारी दिग्गज केवल उसी स्थिति में बढ़िया कर सकते हैं जब वे आने वाली चुनौतियों से बेहतर तरीके से निपटेंगे। योजनाओं पर कम पैसा और समय खर्च होना चाहिए जबकि उनके क्रियान्वयन पर अधिक खर्च किया जाना चाहिए।
अच्छी खबर यही है कि भारत में अभी भी संभावनाएं बरकरार नजर आ रही हैं। भारत की कुछ आधारभूत चीजें न केवल भारतीयों को लुभा रही है बल्कि विदेशी भी यहां कारोबार करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं। अर्थव्यवस्था में इतनी कूव्वत है कि वह एक या दो ‘बुरे वर्षों’ से निपट सके। अगले वित्त वर्ष में भी सकल घरेलू उत्पाद के 6 से 7 फीसदी के सम्मानजनक स्तर पर रहने की पूरी उम्मीद है। बस वक्त की इतनी नजाकत है कि इस समय कुछ अधिक बुद्धिमानी से काम करने और दुराग्रहों से बचने की जरुरत है, ताकि मौजूदा खतरे से निपटा जा सके।