ईंधन के कारण आईं मुश्किलें
पार्थसारथी बसु, सीएफओ, स्पाइसजेट
विमानन ईंधन (एटीएफ) में जबरदस्त बढ़ोतरी होने के कारण विमानन कंपनियों का घाटा बढ़ता जा रहा है। नागरिक विमानन मंत्री प्रफु ल्ल पटेल भी साफ कह चुरके हैं कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक इन कंपनियों का घाटा बढ़कर 8000 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। हालांकि पिछले साल उन्हें 4,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था।
इससे बिल्कुल स्पष्ट है कि विमानन कंपनियों को दोगुना नुकसान हो रहा है। बहुत सारी कंसल्टेंसी एजेंसियों का भी अनुमान है कि विमानन उद्योग को 10,000 करोड़ रुपये की चपत लग सकती है। मिसाल के तौर पर अगर कोई विमानन कंपनी भारत में ईंधन भरवाती है तो उसे 68,000 रुपये प्रति किलोलीटर देने पड़ते हैं। उसी समय अगर कोई दूसरी कंपनी सिंगापुर में वही ईंधन भरवाती है तो उसे मात्र 41,000 रुपये देने पड़ते हैं। इस तरह आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत में एटीएफ की कीमतों में लगभग 40 प्रतिशत का इजाफा हो गया है।
एटीएफ की कीमत में अगर 20,000 रुपये प्रति किलोलीटर की कटौती कर दी जाए तो एयरलाइंस को अपने सालाना ईंधन खर्च में 400 करोड़ रुपये की कमी लाने में मदद मिल सकती है। हालांकि यह जरूरी नहीं कि एटीएफ की कीमतों में कटौती से सभी एयरलाइन घाटे से उबर जाएंगी। फिर भी उन्हें काफी राहत मिलेगी और कुछ हद तक दबाव कम हो जाएगा। पर सवाल है कि क्या तेल बेचने वाली कंपनियां एटीएफ की कीमतें कम करने को तैयार होंगी? वैसे भी तेल विपणन के 95 प्रतिशत बाजार पर सरकारी कंपनियों का ही दबदबा है।
ऐसी स्थिति में अगर सस्ती उडानों की बात की जाए तो यह ठीक उसी तरह की बात होगी कि आ बैल मुझे मार। ऐसी बात नहीं है कि इन विमानन कंपनियों को अपने व्यापार की चिंता नहीं है। बिल्कुल है, इसलिए वे ग्राहकों को आकर्षित करने और प्रतिस्पद्र्धा में बने रहने के लिए नित-नए ऑफर देती हैं और यात्रियों को अधिक से अधिक सुविधाएं मुहैया कराने का काम करती हैं। लेकिन जिस रफ्तार से तेल की, खासतौर पर एटीएफ की कीमतें बढ़ी हैं, उससे साफ है कि अब सस्ती उडानों का समय नहीं रहा।
आज प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है और महंगाई की स्थिति काफी भयावह हो गई है। कई एयरलाइन्स ने तो अपना घाटा कम करने के लिए उडानों की संख्या कम कर दी है और उनके रूट भी बदल दिए हैं या फिर दो उड़ानों का विलय कर दिया है। हालांकि विमानन कंपनियों के कुल घाटे का तीन-चौथाई हिस्सा उनके ईंधन खर्च के कारण होता है। इसलिए उस लिहाज से उस घाटे का असर विमान परिचालन की हरेक गतिविधि पर पड़ता है। यात्री की उडान टिकटें भी उसी का एक हिस्सा होता है। इसलिए यात्री टिकटों की दरों में में इजाफा होना स्वाभाविक है।
वैसे, अगर भविष्य में ईंधन की कीमतों में किसी प्रकार की कमी आई तो यात्री किराये में भी कमी आ सकती है। मगर जिस तरह से ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैैं, उससे तो लगता नहीं कि भविष्य में इस तरह की कमी के कोई आसार नहीं हैं।
(कुमार नरोत्तम से बातचीत पर आधारित)
कायम रहेंगी सस्ती विमान सेवाएं
नीलू सिंह, सीओओ,ईजीगो वन ट्रैवल ऐंड टूर्स
सस्ती विमान सेवाओं की बात करें तो पिछले कुछ समय में जिस तरह से एटीएफ की कीमतों में इजाफा हुआ है, उसके बाद से अचानक यह लगने लगा है कि उनका भविष्य अब बहुत चमकदार नहीं है। पर मेरी राय में यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।
सस्ती विमान सेवाओं के दिन अभी लदे नही हैं और नई आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर चले भारत में इन सेवाओं के लिए अपार संभावनाएं हैं। एटीएफ कीमतों में इजाफे का सस्ती विमान यात्री सेवाओं पर कोई खास असर नहीं पड़ा है,क्योंकि इस बढ़ोत्तरी के बावजूद भी ये विमानन कंपनियां फुल कैरियर सर्विस कंपनियों के मुकाबले 10 से 15 फीसदी कम पर सेवाएं मुहैया करा रही हैं। बात अगर हमारे ईजीगो वन की करें तो हम स्पाइस जेट के साथ टिकट पे टिकट ऑफर प्रस्तुत कर रहे हैं।
मतलब यह कि अगर आप स्पाइस जेट का एक टिकट खरीदें तो दूसरा टिकट आपको बिल्कुल मुफ्त मिलेगा। अलबत्ता, आपको कुछ कर जरूर देना पड़ेगा। हाल के किराया-अधिभार में इजाफे के बाद इस तरह की सेवाओं की मांग में इजाफा ही हुआ है। इसके अलावा हमने इस चीज को भी नोटिस किया है कि खासकर कॉरपोरेट ट्रैवलर इन कैरियर सेवाओं की ओर ज्यादा रुख कर रहे हैं,क्योंकि ये उन्हें अपेक्षाकृत सस्ती पड़ती हैं और नतीजतन वो नॉन-पीक ऑवर्स में भी यात्रा करना गवारा नहीं समझते। खासकर,जरूरत केसमय में इन तरह की सेवाओं से उन्हें अच्छी खासी बचत हो जाती है।
अब अगर दूसरे पायदान की बात की जाए तो अभी इस ईंधन के वितरण में लगी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर तेल आयात पर 10 फीसदी सेवा कर, 20 फीसदी इंपोर्ट पैरिटी चार्ज और तकरीबन 8 फीसदी एक्साइज डयूटी लगती है। नतीजतन परिशोधित केरॉसिन ऑयल की कीमत अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क से 60 फीसदी ज्यादा हो जाता है। इस तरह आप देखेंगे कि एटीएफ पर जितने चार्जेज लगाए गए हैं, उनकी बदौलत सरकार के खजाने में 5,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा पहुंच जाते हैं।
एटीएफ पर राज्य सरकारों का भी अड़ियल रुख है,और वे इन चार्जेज को लेकर सख्त हैं। ऐसे में इन परेशान हालात में एक रास्ता यह बचता है कि तेल मार्केटिंग कंपनियों के एकाधिकार पर कुछ किया जाए। इसके तहत ओपेन एक्सेस सिस्टम एक रास्ता है, जिसके जरिए रिलायंस इंडस्ट्रीज और एस्सार ऑयल जैसे नए खिलाड़ियों के दस्तक देने से अब तक एकछत्र राज कर रही ऑयल कंपनियों का एकाधिकार टूटेगा।
अगर लो-कॉस्ट कैरियरों को 25 फीसदी की छूट मिल जाए तो उनके लिए 392 करोड़ रुपया बचा पाना मुमकिन होगा। लिहाजा, अब कैरियर कंपनियों को चाहिए कि वे मैंटेनेंस, रिपेयर समेत ओवरहॉल तकनीक यानी एमआरओ तकनीक पर खर्च करें ताकि सस्ती सुविधाएं दे सकने में कोई परेशानी न हो। साथ ही कंपनियों को चाहिए कि वे इस मुश्किल भरे दौर का पूरे धीरज से सामना करें। इससे वे निश्चित तौर पर इस मुश्किल से पार पा सकेंगी। यह बात बिल्कुल कही जा सकती है कि लो -कॉस्ट एयरलाइंसों का दौर बरकरार रहेगा।
(अमित कर्ण से बातचीत पर आधारित)