तेल की कीमतों में तेजी और माल ढुलाई के दाम ऊपर चढ़ने से खरीदार अपनी आपूर्ति प्रक्रिया पर फिर से विचार करने को बाध्य हैं, यानी वे इस कोशिश में जुटे हैं कि आखिर कैसे इस सूची को छोटा किया जाए।
हम भले ही वैश्वीकरण का दम भरते हों और वैश्विक अर्थव्यवस्था के तार जुड़े होने की दलील देते हों पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि माल की ढुलाई महंगी होने से इसे आगे चलकर खतरा हो सकता है।
साथ ही हो सकता है कि अमेरिका में इस बार डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में आ जाए और अगर ऐसा होता है तो यह भी वैश्वीकरण के लिए खतरा हो सकता है। पर पहले हम एक नजर डालते हैं उन घटनाक्रमों पर जो बीत चुकी हैं। जो लोग वैश्वीकरण का विरोध करते आए हैं उनका मानना रहा है कि दरअसल यह व्यवस्था अमेरिका और यूरोप में बैठे शक्तिशाली पूंजीवादियों द्वारा रचा गया षडयंत्र है। इस क्षेत्र में अब तक जो विकास हुआ है, उससे एक बार फिर यह प्रमाणित होता है कि भविष्य के बारे में अनुमान जताना कितना मुश्किल है।
चलिए कुछ ऐसे विकास की चर्चा करते हैं जो बहुत विशिष्ट भले ही न हो, पर ध्यान जरूर खींचते हैं। अस्सी के दशक के मध्य में जब उरुग्वे दौर की वार्ता चल रही थी तो भारत ने सेवाओं को इसमें शामिल करने का विरोध किया था। पर आज, सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी क्षेत्र में भारत ही पूरी दुनिया को टक्कर दे रहा है। यहां से आईटी के साथ साथ दूसरे क्षेत्रों से भी पेशेवर दुनिया भर में भेजे जा रहे हैं। इनकी संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। अगर भारत सेवाओं के मामले में आगे है तो चीन उत्पादन में बाजी मार रहा है।
चीन में उत्पादित वस्तुओं से दुनिया भर के बाजार अटे पड़े हैं। चीन जितनी कम कीमत पर अपने देश में उत्पादित वस्तुएं बाजार में बेच रहा है, उसकी बराबरी कर पाना बाकी देशों के लिए मुश्किल हो रहा है। विश्व के दूसरे देश अब चीन पर यह दबाव भी डाल रहे हैं कि वह धीरे धीरे अपनी मुद्रा का भाव बढ़ाए। इस मसले में घरेलू महंगाई ने भी खलल डाल दिया है और इससे चीन से निर्यात महंगा होने लगा है। इस तरह चीन पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि वैश्विक महंगाई के लिए कहीं न कहीं वह भी जिम्मेदार है।
अगर पूंजी की बात करें तो पता चलता है कि विश्व भर के कुल मुद्रा भंडार का तीन चौथाई से ज्यादा एशियाई केंद्रीय बैंकों में ही जमा है। डॉलर का मूल्य कितना घटेगा और कितना बढ़ेगा इसका निर्णय भी अमेरिका नहीं करता। यह भी काफी हद तक चीन, जापान, वेनेजुएला, ईरान और रूस में लिए जा रहे निर्णयों पर निर्भर करता है। अगर एक बार फिर से पूंजी के मुद्दे पर ही चर्चा करें तो अमेरिका जब सबप्राइम संकट से बुरी तरह जूझ रहा था, उस समय भी कुछ विकसित और सुविधासंपन्न एशियाई देशों ने काफी हद तक अपने आप को इसके प्रभाव से बचाए रखा था।
अगर हम साफ तौर पर यह नहीं कह सकें कि कुछ एशियाई देश इस संकट से पूरी तरह बचे रह पाए थे तो कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि उन्होंने जितना संभव हो सका खुद का बचाव किया था। साथ ही उन्होंने इस सबप्राइम संकट से कई अमेरिकी वित्तीय इकाइयों को भी बचाया था। इतना ही नहीं बल्कि कुछ विकासशील एशियाई देश कोरस, जगुआर और आईबीएम पीसी कारोबारों को अपने मुकुट में जड़ चुके हैं। विश्व स्तर पर अपने कारोबार का डंका बजाने में ये दिन रात जुटे हुए हैं और इन्हें सफलता मिल भी रही है।
एशियाई देश अब हर क्षेत्र में बढ़ चढ़कर भाग ले रहे हैं और अपना परचम भी लहरा रहे हैं। बात चाहे बाजार पूंजीकरण की करें या फिर सबसे बड़े आईपीओ की या फिर अरबपतियों की, सबमें एशिया की पैठ बढ़ती जा रही है। कई और ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें ध्यान में रखकर आप यह कहने से नहीं कतराएंगे कि धीरे धीरे वैश्विक आर्थिक शक्तियों का झुकाव इस ओर होता जा रहा है। लोगों को अब लगने लगा है कि निकट भविष्य में ही आर्थिक जगत में एशिया को टक्कर देना मुश्किल हो जाएगा। दुनिया के सबसे कारगर और बडे बंदरगाह (सिंगापुर, शंघाई और हांगकांग) और हवाई अड्डे (सिंगापुर, कुआलालंपुर और हांगकांग) पूर्व में ही स्थित हैं।
पेइचिंग का अत्याधुनिक टर्मिनल 3 (हीथ्रो के पांच टर्मिनलों को जोड़ दें तो भी यह उससे बड़ा होगा) को समय से कारोबार के लिए खोल दिया गया था और पहले दिन से ही यह बिना किसी परेशानी के काम कर रहा है। वहीं इसके विपरीत हीथ्रो के पांचवे टर्मिनल को चालू करने में इससे चार गुना अधिक समय लगा था और जब यह चालू हुआ तो भी कोई न कोई दुर्घटना घटती ही रही थी। दर्जनों उड़ानें रद्द कर दी गई थीं और इस वजह से हजारों यात्रियों के सामान हवाईअड्डे पर अटके पड़े रह गए थे।
अब जरा एक अन्य घटना की चर्चा करते हैं जो इन घटनाओं से थोड़ा अलग तो है पर इससे भारत के दबदबे का कुछ हद तक अंदाजा लगाया जा सकता है। जो लोग क्रिकेट के शौकीन हैं उन्हें शायद हरभजन का मामला याद होगा। जब भारतीय क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया गई थी उस समय हरभजन सिंह और एंड्रयू साइमंड्स के बीच विवाद छिड़ गया था। कुछ इसी तरह का मामला आईपीएल के मैचों के दौरान भी देखने को मिला था। पर उस समय दुनिया भर में भारतीय टीम को जितना समर्थन मिला था, उससे भारतीय पैसे की शक्ति का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है।
कम से कम क्रिकेट के कारोबार में भारत का कितना रुतबा है, इसे तो बताने की जरूरत नहीं है। क्रिकेट से अलग कारोबार जगत की भी बात करें तो भारत के महत्त्व को दरकिनार नहीं किया जा सकता। टाटा की नैनो कार ने कारोबार की दुनिया में एक नई मिसाल कायम कर दी है। यूटीवी, इरोस और एडीएजी कंपनियां भी हॉलीवुड में कदम रखकर एक नई शुरुआत कर रही हैं ताकि आगे चलकर हॉलीवुड निर्माताओं को टक्कर दी जा सके। शिक्षा के क्षेत्र में भी भारत पीछे नहीं रहा है।
बदलती वैश्विक आर्थिक शक्तियों पर जो महत्त्वपूर्ण किताबें प्रकाशित की गई हैं उनमें इमरजिंग मार्केट्स सेंचुरी (एंटोनी वैन एग्टामेल), दी ड्रैगन ऐंड दी एलीफेंट (अशोक गुलाटी और शेंगेन फैन), बिलियन्स ऑफ इंटरप्रेनुअर्स (तरुण खन्ना) शामिल हैं। पर इन सब विंदुओं से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण एशियाई देशों की विकास गाथा है, जो विश्व व्यापार और निवेश के लिए अपनी अपनी अर्थव्यवस्था को खोले बगैर संभव नहीं थी। एशिया में जो चमत्कार देखने को मिला इसकी शुरुआत जापान के विकास से हुई थी- पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि जापान तब भी विकासशील देश नहीं था।
विकास की जो दूसरी लहर चली उसमें दक्षिण कोरिया, ताइवान, हांगकांग और सिंगापुर शामिल थे। आगे चलकर इस रास्ते पर कदम बढ़ाने वालों में थाईलैंड, मलेशिया, चीन और भारत थे। वियतनाम भी इसी विकास की कहानी में शामिल है। या फिर यूं कहें कि पिछले तीन दशकों में कई ऐसे देश हैं जो गरीब देशों की सूची से बाहर निकल आए हैं। फिर भी वैश्वीकरण के विरोध की लड़ाई जिसे अब तक वामपंथी (मार्क्सवादी) और दक्षिणपंथी (स्वदेशी जागरण मंच) लड़ते आए हैं उसमें कुछ वे खिलाड़ी भी शामिल हो गए हैं जो कभी इसके हिमायती हुआ करते थे।