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व्यापार विरोधी कदम

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 6:36 PM IST

केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय ने गत सप्ताह एक वक्तव्य जारी करके कहा कि अखबारी कागज समेत किसी भी प्रकार के कागज के आयात के पहले पूर्व पंजीयन कराना जरूरी होगा। नई व्यवस्था के मुताबिक 1 अक्टूबर से कागज का आयात कागज आयात निगरानी प्रणाली के अधीन होगा जिसके तहत आयातकों को खुद को उसी तरह पंजीकृत करना होगा जैसे कि अतीत में कोयला और इस्पात क्षेत्र में करना होता था। एक और उद्योग में लाइसेंस कोटा राज की वापसी को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। देश में यह एक और ऐसा कदम है जो उदारीकरण के पहले की दिशा में बढ़ रहा है, खासतौर पर मंत्रालय ने जो विशिष्ट स्पष्टीकरण मुहैया कराया है उसकी प्रकृति संरक्षणवादी है। संबंधित वक्तव्य में कहा गया है, ‘यह इस श्रेणी में मेक इन इंडिया तथा आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की दिशा में दूरगामी कदम साबित होगा।’ मेक इन इंडिया की अवधारणा भारतीय उद्योग जगत को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की थी लेकिन उसका लगातार दुरुपयोग जारी है।
क्या भारतीय पेपर मिलों के पास यह शिकायत करने की उचित वजह है कि इस क्षेत्र में भारत के कुछ कारोबारी साझेदार देश डंपिंग कर रहे हैं? शायद। डंपिंग एक तकनीकी शब्द है जो यह संकेत देता है कि किसी वस्तु को किसी खास देश में उसके मूल देश की उत्पादन लागत से भी कम दाम पर बेचा जा रहा है। क्या हाल के महीनों में कागज उद्योग के सामने ऐसी स्थिति बनी है? यह सही है कि 2020 में की गई जांच में यह अनुशंसा की गई थी कि कागज से संबंधित कुछ उत्पादों पर पांच वर्ष के लिए ऐंटी डंपिंग शुल्क लगाया जाए। यह स्पष्ट नहीं है कि इसके लिए क्या अनुमान और मॉडल इस्तेमाल किए गए। चाहे जो भी हो, यदि वास्तविक चिंता डंपिंग की है तो मंत्रालय को एक लक्षित, समुचित ऐंटी डंपिंग शुल्क लागू करना चाहिए, न कि आयात लाइसेंस की वापसी करनी चाहिए। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि न्यूजप्रिंट के आयात पर पहले ही 5 प्रतिशत सीमा शुल्क लागू है। क्या ऐसा कोई प्रमाण है कि यह डंपिंग को रोकने में नाकाफी है? यदि ऐसा है तो जनता के समक्ष भी इसका प्रमाण प्रस्तुत किया जाना चाहिए। कई परिपक्व अर्थव्यवस्थाओं में ऐसे स्वतंत्र प्राधिकार हैं जो उत्पादकों, आयातकों तथा उपभोक्ताओं की बात को सुनने के बाद यह तय करते हैं कि आयात से क्या नुकसान हो रहा है। इसके पश्चात स्वतंत्र बोर्ड नियामक उनके निष्कर्षों पर मतदान करते हैं और इस मतदान को भी सार्वजनिक किया जाता है। भारत में भी ऐसी व्यवस्था लागू करने की आवश्यकता है।
खासतौर पर विचित्र बात यह है कि सरकार का यह कदम ऐसे समय पर आया है जब वैश्विक न्यूजप्रिंट कीमतों में तेज इजाफा हो रहा है। न्यूजप्रिंट की कीमत 2020 के निचले स्तर से तीन गुनी हो चुकी है। घरेलू कीमतें भी उसी अनुरूप बढ़ी हैं। यदि भारतीय कागज उद्योग इन हालात में भी अपनी क्षमता का इस्तेमाल कर पाने में नाकाम है तो विदेशी उत्पादकों को क्या दोष देना। समस्या तो आंतरिक है। परंतु जब अफसरशाही में संरक्षणवादी भावना प्रबल हो तो ऐसा होता ही है। औद्योगिक लॉबी अधिकारियों और राजनेताओं को यह विश्वास दिलाने का प्रयास करती हैं कि भावी संरक्षण की कोई वैकल्पिक नीति है ही नहीं। इस प्रक्रिया में वृद्धि, उत्पादकता और उपभोक्ता कल्याण आदि सभी प्रभावित होते हैं। लाइसेंस राज में भारत की यही स्थिति थी। कागज के उत्पादों के आयात पर लगने वाली सीमाओं को हालिया निर्यात प्रतिबंधों, शुल्क वृद्धि और अन्य व्यापार विरोधी कदमों के साथ रखा जाना चाहिए जो बताते हैं कि राजनीतिक नेतृत्व ने वृद्धि के स्रोत के रूप में बुनियादी आर्थिक सिद्धांत के बजाय शंकालु व्यवहार को पनपने दिया है।

First Published : May 31, 2022 | 12:21 AM IST