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क्या अब पूरे हो चुके हैं आर्थिक मंदी के दिन?

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:00 PM IST

पिछले कुछ हफ्तों से भारत और दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की हालत पस्त है। पूरी दुनिया के वित्त बाजार में डर और चिंता का माहौल है।


निवेशक वैश्विक मंदी, रुकी हुई विकास दर और बढ़ती महंगाई से काफी परेशान हैं। ऊपर से, अमेरिकी मंदी ने भी उनकी नींद उड़ा रखी है। अपने मुल्क में तो चुनावी हलचल और राजनीतिक उठा-पटक की वजह से निवेशकों का जीना और मुहाल हुआ पड़ा है।

पिछले हफ्ते जब से तेल की कीमतें कम होने लगी है, उम्मीद की जा रही है कि केवल अपने मुल्क के ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के लिए बुरा वक्त खत्म हो चुका है। कितनी सही है यह उम्मीद? क्या हमारे लिए सचमुच बुरा वक्त गुजर चुका है? पूरे विश्वास से पूरी दुनिया के वास्ते यह कहने के लिए हमें इस बात को दो या तीन कसौटियों पर कसना होगा। वहीं, अपने मुल्क के लिए इस बात को कहने के लिए कई दूसरी बातों पर भी ध्यान देना पड़ेगा।

पहली बात तो यह है कि जब तक तेल की कीमतों में 15-20 फीसदी की और गिरावट नहीं होती, तब तक भारतीय और वैश्विक बाजारों के लिए रास्ते नहीं खुलेंगे। हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में हाल के दिनों में आई तेज गिरावट का लंबे वक्त से इंतजार था और यह गिरावट आगे भी बरकरार रह सकती है। दुनिया भर में पेट्रोलियम उत्पादों की मांग में भारी कमी आई है। विकसित मुल्कों में तो तेल के उपयोग में भारी कमी है और विकासशील देशों में भी लोगों की पसंद में काफी अंतर आया है।

जैसे-जैसे एशियाई मुल्कों में सब्सिडी में भारी गिरावट आई है, लोगों को भी तेल की ऊंची कीमतों का ज्यादा से ज्यादा दंश झेलना पड़ रहा है। साथ में, शेयर बाजारों का बुरा हाल और तेल की बढ़ती कीमतें भी कच्चे तेल के खुद तक सिमेट स्वभाव की तरफ इशारा करता है। हाल के समय में कच्चे तेल की कीमतों में भले ही अच्छा-खासा इजाफा हुआ हो, लेकिन तेल कंपनियों के शेयरों का हाल खस्ता ही है। यह इस बात की ओर इशारा करता है कि निवेशकों को भी तेल की कीमतों के इतने ऊंचे स्तर पर बने रहने का भरोसा नहीं है।

कच्चा तेल हमेशा से काफी उतार चढ़ाव वाली वस्तु रही है। इसीलिए जब इसकी कीमतें गिरती हैं, तो काफी जबरदस्त तरीके से गिरती हैं। हालांकि, कई लोग अब भी यह सवाल कर रहे हैं कि जब तक 10 फीसदी की रफ्तार से बढ़ रहे चीन से कच्चे तेल की जबरदस्त मांग आती रहेगी, कच्चे तेल की कीमतों में कैसे गिरावट आ सकती है? इसका जवाब आपको विकसित मुल्कों में कच्चे तेल की घटती डिमांड में मिलेगा। विकसित मुल्क को चीन से कहीं ज्यादा कच्चे तेल का इस्तेमाल करते हैं।

इन मुल्कों में अगर पेट्रोलियम उत्पादों का इस्तेमाल घटता है, तो चीन की बढ़ती मांग भी कच्चे तेल की कीमतों को कम होने से रोक नहीं पाएगा। हकीकत तो यह है कि हम शायद इस हालत में पहुंच भी गए हैं। दूसरी तरफ, चीन में पेट्रोल की कीमतों में हाल में हुए इजाफा से उम्मीद तो यह की जा रही है कि इससे वहां तेल की मांग कम होगी। अब जब मांग का असर कम होता जा रहा है, तो केवल भू-राजनीतिक परिस्थितियां ही कच्चे तेल की कीमतों पर असर डाल सकती हैं।

वैसे यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसके बारे में कुछ भी कहना काफी मुश्किल है। भू राजनीतिक परिस्थिति पर असर डालने वाला कोई एक मामला भी तेल की कीमतों को बढ़ाने के लिए काफी हो सकता है। अब अगर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का दौर जारी रहा तो दु्निया भर के वित्त बाजारों के लिए संकट के दिनों को पूरे होते देर न लगेगी। इसके अलावा, दुनिया भर की सरकारों की जान खा रही है महंगाई। दुनिया भर में महंगाई के आंकड़े आज की तारीख में आसमान छू रहे हैं।

दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ रही महंगाई की वजह से केंद्रीय बैंक विकास की रफ्तार को तेज करने की कोशिश भी नहीं कर पा रही है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था प्रॉपर्टी की घटती कीमत की वजह से एक आर्थिक में भंवर में फंस चुकी है, जिससे निकलने के लिए उसे काफी मेहनत करनी पड़ रही है। अब तो इस संकट के बीज ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोप के मुल्कों में भी पड़ चुके हैं। प्रॉपर्टी बाजार में आए इस संकट से निपटने के लिए सरकार को बाजार में पैसों का प्रवाह बढ़ाना चाहिए, लेकिन तेजी से ऊपर चढ़ती महंगाई की वजह से ऐसा करना भी आधिकारियों के लिए मुमकिन नहीं है।

मिसाल के तौर पर अमेरिका को ही ले लीजिए। वहां कारोबारियों और आम लोगों के लिए ब्याज दर पहले काफी ज्यादा थीं, लेकिन फिर उन पर फेड ने अपनी लगाम कसी। मगर अब बर्नान्के अपनी दरियादिली पर लगाम लगाकर ब्याज दरों को बढ़ाने की बात कर रहे हैं, ताकि महंगाई से मुकाबला किया जा सके। यूरोप में भी महंगाई को लेकर काफी हायतौबा मची। इसीलिए तो यूरोपियन सेंट्रल बैंक (ईसीबी) को कम विकास दर के बावजूद ब्याज दरों में इजाफा करना पड़ा। ब्रिटेन इस दुविधा का दूसरा नमूना है।

वहां प्रॉपर्टी की कीमतें तेजी से गिर रही हैं, अर्थव्यवस्था पर जबरदस्त दवाब है और विकास दर का सितारा गर्दिशों में है। इतना सब होने के बावजूद बैंक ऑफ इंग्लैंड (बीओई) कुछ कर पाने की हालत में नहीं है। वजह है, खाद्य पदार्थों और तेल की ऊंची कीमतें। दुनिया भर में सरकारें अर्थव्यवस्था की उतार-चढ़ाव पर नियंत्रण रख पाने में नाकामयाब साबित हो रही हैं। यह काफी खतरनाक बात है। अगर ऐसा होता रहा तो अर्थव्यवस्था में इतने तेज उतार-चढ़ाव आएंगे, जिन्हें सहना हमारे बूते में रहेगा नहीं। किसी भी अर्थव्यवस्था में केंद्रीय बैंक की भूमिका शॉक-एब्जॉर्वर की होती है, जो काफी अहम होती है।

जैसे ही खाद्य पदार्थों और तेल की कीमतों में गिरावट शुरू हो जाएगी, महंगाई के आंकड़े भी तेजी से नीचे आने लगेंगे। इससे दुनिया भर के केंद्रीय बैक अपना ध्यान फिर से अपने वित्तीय ढांचे को मजबूत करने में लगा सकेंगे। महंगाई को कम होना ही पड़ेगा क्योंकि अगर फेड ब्याज दरों में छूट भी देता है तो  उसे दुनिया भर में दोहराया जाएगा। अगर फेड ब्याज दरों में छूट देगा तो उस वजह से डॉलर का हाल बुरा होगा और जिंसों की कीमत में इजाफा होगा। इस वजह से ईसीबी और बीओई को कड़े कदम उठाने पड़ेंगे, जिनमें राहत तब तक नहीं मिलेगी जब तक महंगाई कम नहीं होती।

भारत में तो सरकार की तरफ से आर्थिक सुधारों की रफ्तार तेज करने की जरूरत है। भले बीमा सेक्टर में विदेशी निवेश की सीमा बढाए जाने और सरकारी बैंकों के वोटिंग राइट्स बदलने से कुछ होगा नहीं, लेकिन इससे उत्साह तो बढ़ेगा। अगर पेंशन क्षेत्र में सुधार हो जाते हैं, तो इससे लंबे समय तक काफी सही संकेत जाएंगे।

भारत को कई फंड मैनेजर, जरूरत से ज्यादा हल्का मानते हैं। इसी वजह से मुल्क से तेजी से पैसा निकाला जा रहा है। हालांकि, अब भी भारतीय बाजारों की भाव इतने सस्ते नहीं हुए हैं कि निवेशक यहां भागे चले आएं। इस हालत में या तो हम हालात सुधरने का साल-डेढ़ साल इंतजार करें या फिर नीतियों में बदलाव करके सुधारों की गाड़ी को तेजी से बढ़ाया जाए।

First Published : July 28, 2008 | 11:23 PM IST