साइबर क्राइम फैलता जा रहा है। पर ऐसा नहीं है कि साइबर दुनिया के अपराधी किसी अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे तो बस परंपरागत तरकीब से कंप्यूटरों को भेदने में जुटे हैं, जिसे काफी समय से इस्तेमाल किया जाता रहा है।
दरअसल साइबर अपराधी कुछ ऐसी जुगत लगाते हैं जिससे इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ता अपनी व्यक्तिगत जानकारियां उनके हाथों में सौंप देते हैं। आर ऐंड एच सिक्योरिटी कंसल्टिंग के सीईओ हॉवर्ड श्मिट कहते हैं कि साइबर अपराधी बैंक सिस्टम को हैक कर और वहां से बड़ी धनराशि चुराने के बजाय कुछ ही लाख लोगों को बेवकूफ बनाकर उनसे थोड़े से पैसे बनाने में ही अपना भला समझते हैं।
श्मिट व्हाइट हाउस में साइबर स्पेस सिक्योरिटी के विशेष सलाहकार रह चुके हैं। मैकऐफी के हाल के एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका में साइबर अपराधी हर दिन करीब 1.5 करोड़ डॉलर और सालाना करीब 5.5 अरब डॉलर तक कमाते हैं और इसके लिए उन्हें कोई खास मशक्कत भी नहीं करनी पड़ती। वे अमेरिकी आबादी के मात्र 0.5 से 1 फीसदी लोगों से प्रत्येक से महज 20 डॉलर ठग कर इतना कमा लेते हैं।
श्मिट काफी समय तक अमेरिकी सरकार को अपनी सेवाएं देते रहे हैं। वह माइक्रोसॉफ्ट और ईबे जैसी कंपनियों के साथ भी जुड़े रह चुके हैं। वह भारतीय कंपनियों को सुरक्षा परिदृश्य की जानकारी दे रहे थे। श्मिट ने कहा कि उन्हें लगता है कि भारत ने सुरक्षा मुद्दे पर अच्छी तैयारी कर रखी है। उन्होंने कहा, ‘सबसे अधिक अमेरिकी लोगों को साइबर क्राइम का शिकार बनाया जाता है और उसके बाद चीन और यूरोप के लोगों का नंबर है।
इसकी वजह साफ है कि यहां के लोग ही सबसे अधिक इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। पर ऐसे अपराधियों को पकड़ पाना भी इतना आसान नहीं होता क्योंकि ये आपको दुनिया के किसी भी कोने में मिल जाएंगे और कहीं से भी ठगी कर सकते हैं।’ श्मिट को लगता है कि आने वाले कुछ वर्षों में साइबर क्राइम का निशाना सबसे अधिक मोबाइल फोन्स को बनाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि आज जिस तरह कंप्यूटर और लैपटॉप का इस्तेमाल किया जा रहा है, कुछ इसी तरह बदलती तकनीकों के बीच मोबाइल का इस्तेमाल किया जाने लगेगा। उन्होंने कहा कि बढ़ते इस्तेमाल के बीच मोबाइल से ही ये अपराधी आसानी से सारे व्यक्तिगत आंकड़े जुटा लेंगे। श्मिट ने कहा कि भले ही अभी से ही मोबाइल पर ठगे जाने के मामले बढ़ने लगे हैं। अब तक करीब 100 से अधिक मोबाइल वायरस की रिपोर्ट आ चुकी है।
उन्होंने कहा कि मोबाइल पर जितने आंकड़े उपलब्ध होते हैं उनकी सुरक्षा के कारगर इंतजाम नहीं होते हैं इस वजह से उन्हें प्राप्त करना आसान होता जा रहा है। सरकारी वेबसाइटों में घुसपैठ की बढ़ती घटनाओं के बारे में श्मिट कहते हैं कि यह सिलसिला फिलहाल रुकता नहीं दिख रहा है।
वह कहते हैं, ‘इसकी एक बड़ी वजह है कि सरकार को काफी लोग पसंद नहीं करते। सरकार को यह समझना चाहिए कि यह एक ऐसा मुद्दा नहीं है जिससे सिर्फ इंटरप्राइजेज को ही खतरा हो।’ श्मिट कहते हैं कि सिक्योरिटी कानूनों में समय समय पर सुधार की जरूरत है।