महिपाल सिंह कहते हैं कि उनका बेटा अब देश का हीरो बन चुका है। अरे, आप महिपाल सिंह और उनको बेटे को नहीं जानते। फिर विजेन्दर सिंह को जरूर जानते होंगे जिन्होंने मुक्केबाजी में देश को पहला ओलंपिक पदक दिलाया।
महिपाल सिंह उसी विजेन्दर के पिता हैं और विजेंदर का कांस्य पदक उनके लिए किसी सोने के तमगे से कम नहीं है। जब से विजेंदर ने अपना पदक पक्का किया तब से मिठाई बांटने का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है और घर में आने-जाने वालों का तांता लगा हुआ है।
विजेन्दर की सफलता से मशहूर हो चुके उनके कोच जगदीश सिंह ने खेल नहीं देखा और वह अपने चेले की सफलता के लिए दुआ करते रहे। जब मैच का नतीजा आ गया तो उन्होंने अपने चेलों से हल्के स्वर में कहा, ‘साढ़े पांच बजे प्रैक्टिस के लिए तैयार रहो।’
अखिल, जितेन्दर और विजेन्दर की सफलता के बाद भिवानी बॉक्सिंग क्लब किसी परिचय का मोहताज नहीं रह गया लेकिन अभी भी वहां सुविधाओं का अकाल है और हालात कतई अच्छे नहीं कहे जा सकते। इस महीने हुई रिकॉर्डतोड़ बारिश की वजह से बॉक्सिंग क्लब तक जाने का रास्ता और भी मुश्किल हो गया है।
वहां पर एक कुंए के जरिये ही पीने के पानी का इंतजाम होता है और क्लब के अंदर केवल जिम में काम आने वाले कुछ उपकरण हैं। क्लब में केवल एक ही बॉक्सिंग रिंग है। यहां बॉक्सिंग सीखने वालों के खाने के लिए कोई भी पोषक चीज उपलब्ध नहीं है। कुल मिलाकर चारों तरफ फैले पानी और कीचड़ में खड़े इस क्लब को कुछ लोग ‘मिनी क्यूबा’ कह कर प्रचारित कर रहे हैं।
कोच, सिंह से जब इस बाबत पूछा जाता है कि जो भी पुरस्कारों की घोषणाएं हुई हैं उनसे वह क्या करना चाहेंगे, तो वह बहुत छोटा जवाब देते हैं। वह कहते हैं, ‘सबसे पहले तो मेरी प्राथमिकता आने वाली चैंपियनशिप की तैयारियों पर ध्यान देने की होगी। यदि मुझे कुछ पैसा मिलता है तब मैं दो पास के दो और प्लॉट खरीदकर अपने क्लब का विस्तार करूंगा और यहां पर सुविधाओं को बढाऊंगा।’ शहर में यह बॉक्सिंग सिखाने वाला सबसे बड़ा प्राइवेट सेंटर है। इसके अलावा शहर में चार अन्य प्राइवेट बॉक्सिंग क्लब है।
पूर्व चैंपियन राज कुमार सांगवान भी शहर का दूसरा सबसे बड़ा बॉक्सिंग कोचिंग क्लब चलाते हैं। भारतीय खेल प्राधिकरण ने भी इसी तरह का क्लब चला रखा है। लेकिन फिलहाल भिवानी बॉक्सिंग क्लब ही इन सबसे आगे है। क्लब का मौजूदा स्वरूप 2003 में सामने आया। यहां प्रशिक्षण लेने वाले तकरीबन 200 युवाओं में से हर एक का सपना चैंपियन बॉक्सर बनने का है।
लेकिन सबसे पहला लक्ष्य स्पोर्ट्स कोटे के मार्फत सरकारी नौकरी हासिल करने का रहता है। इस शहर में बॉक्सिंग के साथ जुड़े लोगों ने पुलिस, सेना, अर्द्धसैनिक बलों के अलावा दूसरे सरकारी विभागों में नौकरी हासिल की है। एक सरकारी सीनियर सेकंडरी स्कूल में हिंदी के अध्यापक और एनसीसी के इंस्ट्रक्टर अनिल कुमार गौड़ कहते हैं, ‘यह इलाका राज्य के सबसे पिछड़े इलाकों में से है।’ उनके मुताबिक शहर के लड़कों के पास नौकरी के लिए पर्याप्त अवसर नहीं हैं।
जगदीश सिंह जिनको भारतीय खेल प्राधिकरण ने भी बतौर कोच नामित किया हुआ है। उन्होंने इस क्लब को चलाने के लिए तकरीबन 40 लाख रुपए का इंतजाम किया जिसके लिए उन्हें अपनी जमीन बेचनी पड़ी और कर्ज भी लेना पड़ा। यहां तक कि अपनी प्रोविडेंट फंड की रकम सहित सारी बचत को उन्होंने इसके लिए दांव पर लगा दिया। इसमें उनको कुछ सहयोग भी मिला। एक ओर पुलिस ने जहां ट्रांसपोर्ट और जगह मुहैया कराने में सहायता की वहीं स्थानीय कारोबारियों ने अलग-अलग श्रेणियों में 11,000 से 25,000 रुपये की राशि इनाम के तौर पर विजेताओं को दी।
बृजलाल सर्राफ और विजय कृष्ण जैसे ज्वैलर्स और हरियाणा सरकार के पूर्व मंत्री और चिनार सूटिंग्स के मालिक राम भजन अग्रवाल ऐसे ही कुछ खास नाम हैं इसके अलावा मित्तल फाउंडेशन ने भी कुछ बॉक्सरों को सहायता दी। फाउंडेशन ने इन बॉक्सरों के कुछ खर्चे उठाए। अब स्पोर्ट्स मैनेजमेंट कंपनियां यहां डेरा डाले हुई हैं क्योंकि उनको यहां कुछ और नगीने छुपे होने का अनुमान है। फिलहाल तो मित्तल फाउंडेशन अपनी सफलता का जश्न मना रहा है।