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हिंदुस्तानी वैज्ञानिकों के आगे हारी बड़ी बीमारी भी

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:40 PM IST

दुनिया भर में गेहूं की फसल पर आजकल एक नए तरह का रोग कहर बरपा रहा है। यह बिल्कुल नए तरह का रोग है, जो पिछले 50 सालों में इस प्रमुख खाद्य फसल को लगने वाली किसी भी बीमारी या संक्रमण में से सबसे खतरनाक है।


वैज्ञानिकों ने इसे यूजी99 का नाम दिया है क्योंकि इस सबसे पहले निशान यूगांडा में 1999 में मिले थे। आज की तारीख में यह बीमारी पूर्वी अफ्रीका की सीमा को लांघ कर ईरान तक की लंबी दूरी तय कर चुकी है। भारत तक इसके मनहूस कदम अभी तक नहीं पहुंचे हैं और किस्मत से हम इससे बचने के तरीके पहले ही अपना चुके हैं।

इस राह में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के कई सुनियोजित तरीके बड़े काम आए। आईसीएआर के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) पी.एल.गौतम का कहना है कि, ‘अभी तक इस संक्रमण का कोई भी लक्षण देश के किसी भी हिस्से में देखने को नहीं मिला है। वैसे, हम इसके लिए पूरी तरह से तैयार हैं। अगर यह बीमारी देश में घुस भी जाती है, उस स्थिति में भी हम बीमारी को उसी वक्त और वहीं खत्म कर देंगे।’

यूजी99 बीमारी को खत्म करने लेकर जीन्स और इस बीमारी के डंक को झेल सकने वाली प्रजातियों पर काम तो 2004 में ही शुरू हो चुका था। गेहूं के बारे शोध करने वाले मुल्कों में अपने देश का नाम काफी इात के साथ लिया जाता है। भारत ने इस खतरनाक बीमारी पर लगाम लगाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध शुरू करने और इसमें दुनिया भर के वैज्ञानिकों को शामिल करने में बड़ी अहम भूमिका निभाई है।

इस काम में गेहूं क्रांति के जनक कहे जाने वाले नोबल पुरस्कार विजेता कृषि वैज्ञानिक नॉर्मन बोरलॉग भी मदद कर रहे हैं। ग्लोबल रस्ट इनिशिएटिव का प्रमुख सदस्य होने के साथ-साथ भारत उन देशों में भी शामिल है, जो इसके लिए पैसे दे रहे हैं।

यूजी99 के खिलाफ इस जंग में एक बड़ा साथ उस वक्त मिला, जब बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने अप्रैल में रस्ट का मुकाबला करने वाली नए प्रकार की प्रजातियों को अगले तीन साल में विकसित करने के लिए 2.68 करोड़ डॉलर देने का ऐलान किया।

दुनिया ने इससे निपटने के लिए एक काफी अनोखी योजना भी बनाई है। योजना यह है कि जिन-जिन इलाकों से यह रस्ट होकर गुजरा है, वहां इससे मुकाबला करने की काबलियत रखने वाली गेहूं की नई प्रजातियों को लाया जाएगा। इससे इस बीमारी का उसी के घर में मात दी जा सकेगी। साथ ही, अपने घर में ही मात खाने की वजह से यह दूसरे इलाकों में भी फैल नहीं पाएगा।

हमारे देश के कृषि वैज्ञानिकों ने तो इससे निपटने के लिए और भी बड़ी योजना बना कर रखी है। हमने इसे साधने की राह में काफी तरक्की भी कर ली है। गेहूं पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों के लिए अगस्त, 2004 में आयोजित 43वीं वार्षिक कार्यशाला में इस बीमारी से निपटने के तरीकों पर खोज शुरू हुई। उसी कार्यशाला में उन पदार्थों की खोज शुरू हुई, जिनसे इस बीमारी पर नकेल कसी जा सके।

साथ ही, उन जीनों की भी तलाश उसी वक्त शुरू हो गई थी, जिन्हें गेहूं की फसल में शामिल करके इससे निपटा जा सके। चूंकि, इसके प्रकोप से केन्या काफी त्रस्त था, इसीलिए भारत ने केन्या के जोरो में ही इस पर शोध की शुरुआत की। इसके पीछे एक और वजह थी। भारतीय वैज्ञानिक इसे अपने देश में लाने से इसलिए भी डर रहे थे क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि यह बीमारी अपने खेतों में आएं।

जोरो में शोध के नतीजे अब असर भी दिखाने लगे हैं। नतीजों के मुताबिक भारत की गेहूं की काफी प्रजातियां यूजी99 से पूरी तरह से सुरक्षित हैं। खुशी की बात यह भी है कि इन शोधों के मुताबिक भारतीय गेहूं की प्रजातियां केवल यूजी99 से ही नहीं, बल्कि भविष्य में इस तरह के कई दूसरे खतरों से भी पूरी तरह से सुरक्षित हैं।

एक कदम आगे बढ़कर भारत ने तो अभी से ही यूजी99 का मुकाबला करने में सक्षम फसल के जीन्स को दूसरे गेहूं उत्पादक मुल्कों को शोध के लिए मुहैया करवाना शुरू कर दिया है। साथ ही, इन जीन्स को गेहूं की दूसरी प्रजातियों के साथ मिलाने का काम भी शुरू हो गया है। पिछले साल हमारा मुल्क इस तरह की 11 प्रजातियों के चार हजार क्विंटल बीजों का उत्पादन कर चुका है।

साथ ही, पिछले महीने हिसार में नैशनल व्हीट वर्कशॉप ने यूजी99 का मुकाबला करने में सक्षम एक और प्रजाति, राज4120 को व्यावसायिक उत्पादन के लिए इजाजत दे दी। इन कदमों के बावजूद भी यह बीमारी अगर अपने मुल्क में आ भी जाए, तो भी कृषि वैज्ञानिक पूरी तरह से तैयार हैं।

संभावित इलाकों के नियमित सर्वे की पूरी व्यवस्था कर दी गई है, ताकि इस बीमारी के हमारी धरती पर कदम रखते ही इसके बारे में उन्हें फौरन पता चल जाए। इससे यूजी99 को खत्म करने के लिए रसायनों के इस्तेमाल का सहारा लेने में मदद मिलेगी। साथ ही, उन इलाकों या फिर उनके आस-पास के इलाकों में भी इसका मुकाबला करने में सक्षम प्रजातियों को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।

सर्वे के लिए विशेषज्ञों की एक खास टीम का गठन किया गया है, जो हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और दक्षिण में नीलगिरि व पालिनी की पहाड़ियों में गेहूं की फसल पर खास नजर रखेगी। इन इलाकों में उत्तर भारत से जुदा गेहूं की खेती गर्मियों में होती है। इससे इस बीमारी के फैलाव को रोकने में खासी मदद मिलेगी, जो वैसे हवा और पानी के रास्ते फैलती है।

कुछ ऐसी ही रणनीति 1970 के दशक में अपनाई गई थी, जब गेहूं की फसल में रस्ट की शिकायत बड़े स्तर पर आ रही थी। इतने बड़े स्तर पर चल रही इस योजना से लगता तो यही है कि यह बीमारी हमारे मुल्क का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी। हमारे वैज्ञानिकों ने हथियार ही इतने जबरदस्त बनाए हैं।

First Published : September 9, 2008 | 11:48 PM IST