संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग की जनसंख्या शाखा के एक अनुमान के मुताबिक हमारा देश अगले वर्ष तक आबादी के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा देश बन जाएगा। इसके मुताबिक चालू वर्ष के दौरान भारत की आबादी चीन की आबादी के बराबर हो जाएगी। इनमें से प्रत्येक देश की जनसंख्या 1.4 अरब से कुछ अधिक होगी। बहरहाल ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अगर दोनों देशों की प्रजनन दर में ढांचागत बदलाव नहीं आया तो भारत की आबादी का बढ़ना जारी रहेगा जबकि चीन की आबादी कम होने लगेगी। इसी अनुमान के मुताबिक सन 2050 तक भारत की आबादी करीब 1.7 अरब होगी जबकि चीन की 1.3 अरब। हालांकि ये आंकड़े कुछ अन्य वैश्विक अनुमानों (मसलन द लान्सेट में गत वर्ष प्रकाशित अध्ययन समेत) से मेल नहीं खाते लेकिन इनकी दिशा मेल खाती है।
एक समय था जब बढ़ती आबादी को देश के जनांकीय लाभ के रूप में देखा जाता था। आज यह बात सुनने को नहीं मिलती। इसकी एक वजह यह भी है कि अब यह माना जाने लगा है कि जहां तक वृद्धि लाभांश के प्रतिनिधित्व की बात है तो भारत ने कामगारों की यह पीढ़ी बहुत खराब तरीके से तैयार की है। शैक्षणिक दक्षता भी उपयुक्त स्तर की नहीं हैं। कागज पर देखा जाए तो स्कूली शिक्षा हासिल करने वालों की तादाद बढ़ी है। स्कूलों की गुणवत्ता पर ध्यान न दिए जाने से बच्चों में वे बुनियादी कौशल भी नहीं आ पा रहे हैं जो हाई स्कूल के बच्चों में होने चाहिए। दिल्ली के शहरी और आसपास के इलाकों के स्कूलों पर किया गया अध्ययन बताता है कि हाई स्कूल में पढ़ने वाले एक तिहाई बच्चों के पास बुनियादी गणितीय और भाषाई कौशल नहीं है। कई बच्चों का स्तर तो प्राथमिक विद्यालय के स्तर का है। इस तरह की श्रम शक्ति रोजगार बाजार के लिए शायद ही तैयार हो, और यह जनांकीय लाभ का प्रतिनिधित्व करती नहीं दिखती।
ऐसा कोई श्रम बाजार भी नहीं है जिसके लिए वे तैयारी कर सकें। यह सही है कि जून 2020 से जून 2021 के सावधिक श्रम शक्ति सर्वे से पता चलता है कि इस अवधि में बेरोजगारी पिछले वर्ष से कम रही और इसका स्तर केवल 4.2 प्रतिशत रहा। बहरहाल, जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं, शीर्ष आंकड़े वास्तविक स्थिति दर्शाते हैं। यह बड़ी तादाद में स्वरोजगार वाले लोगों, काम की तलाश न करने वाले लोगों और कृषि कार्यों की ओर वापस लौट चुके लोगों को छिपा लेता है। श्रमिक आबादी अनुपात 40 फीसदी से कम है। जो रोजगार युवा भारतीय श्रमिकों से जनांकीय लाभांश तैयार कर सकते हैं वे न तो
कृषि क्षेत्र में हैं और न ही स्वरोजगार में। जब तक बच्चों की बुनियाद मजबूत नहीं की जाएगी तब तक शायद व्यावसायिक शिक्षा देने के प्रयासों को भी अपेक्षित सफलता प्राप्त न हो सके।
अगर हम दुनिया में सबसे कम रोजगार अनुपात के साथ दुनिया के सबसे बड़ी आबादी वाले देश बन जाते हैं तो यह एक बहुत बड़ी समस्या होने वाली है और भारत शायद इस आकस्मिकता को समझने और इससे निपटने में तत्परता दिखाने में पिछड़ रहा है। जब तक हम दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती आबादी की मानव पूंजी नहीं बढ़ाते, भारत को समस्याओं का सामना करना होगा। ये समस्याएं केवल रोजगार और वृद्धि की आर्थिक समस्याएं नहीं होंगी बल्कि हमें सामाजिक समस्याओं का भी सामना करना होगा। हाल ही में सरकारी और सैन्य नौकरियों को लेकर दंगों जैसे जो हालात बने, उन्हें इसकी बानगी माना जा सकता है।