पर्यावरण के हितों का ध्यान रखने वाली भारतीय ऊर्जा कंपनियां कार्बन ट्रेडिंग के जरिए अतिरिक्त संसाधनों के उत्पादन की जिस कोशिश में लगी थीं, वे कोशिशें अब धूमिल होने लगी हैं।
प्रतिद्वंद्वी चीनी कंपनियां भारतीय कंपनियों को पीछे छोड़ती हुई इनके ग्राहकों को हथियाने में सफल रही हैं। अब वे यूरोपीय यूनियन के उपभोक्ताओं को रिझाने की कोशिशों में जुटी हुई हैं। नए उपभोक्ताओं की खोज में ये चीनी कंपनियां कम कीमतें आंकने को भी तैयार हैं।
भले ही कागजी तौर पर भारत अब भी विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है जो कार्बन क्रेडिट की बिक्री करता है पर 2007 में इसकी बाजार हिस्सेदारी छह फीसदी के करीब आंकी गई थी। वहीं, चीन की इस क्षेत्र में बाजार हिस्सेदारी इससे कहीं अधिक 73 फीसदी के करीब है। अगर वैश्विक कार्बन बाजार पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2007 में इसमें खासी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
वर्ष 2007 में यह बढ़कर 64 अरब डॉलर पर पहुंच गई, जबकि इसके पिछले वर्ष यह महज 33 अरब डॉलर के करीब थी। यह खुलासा विश्व बैंक की ‘स्टेट ऐंड ट्रेंड्स ऑफ दी कार्बन मार्केट 2008’ रिपोर्ट में किया गया है। इस रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि इस क्षेत्र में अब भी चीन की दावेदारी मजबूत बनी हुई है जिसे चुनौती देना फिलहाल तो किसी के बस में नहीं दिखता।
वहीं भारत सर्टीफाइड एमिशन रिडक्शन्स (सीईआर) जिसका विश्व स्तर पर कारोबार क्लीन डेवलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) के तहत किया जाता है, के ममले में चीन से काफी पीछे है। अब सीईआर विक्रेताओं के लिए ध्यान देने वाली बात यह है कि भले ही यूएनएफसीसीसी में पंजीकृत कुल सीडीएम परियोजनाओं में से एक तिहाई परियोजनाएं भारत की झोली में जाती हैं, फिर भी खरीदार भारत की तुलना में चीन से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति में विश्वास करते हैं।
इसकी एक वजह यह हो सकती है कि चीन में सीईआर का उत्पादन करने वाली बड़े आकार की कंपनियों की संख्या ज्यादा है जबकि, भारत में छोटे आकार की कंपनियों की बहुतायत है, जिनमें मोल भाव करने की क्षमता भी बेहतर नहीं है। साथ ही कई बार भारतीय कंपनियां इस उठा पटक वाले बाजार की जटिलताओं को समझने में भी सफल नहीं हो पाती हैं।
इतना ही नहीं वे वैश्विक कमोडिटीज एक्सचेंजों में ऑप्शन ट्रेडिंग के विकल्प के लिए भी तैयार नहीं दिखती हैं। दूसरी ओर स्थानीय एक्सचेंजों में ऑप्शन ट्रेडिंग की सहूलियत अभी तक नहीं दी गई है। वहीं देश में अभी इस बात पर एकमतता नहीं बन पाई है कि सीईआर को उत्पाद की श्रेणी में रखें या फिर सेवा की।
साथ ही विदेशों में इनकी बिक्री को उत्पाद के निर्यात के तौर पर देखें या फिर सेवा निर्यात के रूप में। इन मुद्दों पर जल्द से जल्द कोई नतीजा निकलना चाहिए क्योंकि कार्बन का बाजार आज जैसा है हो सकता है लंबे समय तक वैसा न रहे। भले ही पिछले एक वर्ष में कार्बन का कारोबार दो गुना हो चुका है पर वास्तव में जीएचजी उत्सर्जन में महज सात फीसदी की कमी ही देखने को मिली है।