अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले दिनों एक बयान देकर खलबली मचा दी। बुश ने कहा कि भारत और चीन समेत विकासशील देशों में बढ़ती संपन्नता और बेहतर खानपान दुनिया भर में पैदा हुए हालिया खाद्य संकट की वजह है।
आखिर क्या हैं बुश के बयान के निहितार्थ, इसी विषय पर केंद्रित है इस बार की जिरह
विश्व खाद्यान्न संकट के संदर्भ में भारत में बढ़ती खाद्यान्न खपत पर अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के बयान पर बवाल मच गया है। भारतीय राजनीतिज्ञ इसे अपमानजनक बता रहे हैं। पर अमेरिकी सरकार के प्रतिनिधि इसे एक सकारात्मक तकरीर और भारत की बढ़ती आर्थिक क्षमता का प्रतीक बता रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि जॉर्ज बुश के बयान का कोई नकारात्मक आशय नहीं है। यह बयान और उस पर उठा विवाद कई तरह के सवाल उठाता है।
सबसे पहले यह समझे जाने की जरूरत है कि क्या भारत के आर्थिक विकास की वजह से देश में अनाज की खपत बढ़ी है? क्या इससे विश्व की खाद्यान्न उपलब्धता और खाद्यान्न की कीमतें प्रभावित हुई हैं? या फिर भारत में बढ़ती मांग में यह क्षमता है कि वह विश्व स्तर पर खाद्यान्न संकट पैदा कर दे? दूसरा महत्वपूर्ण सवाल भारत के एक महत्वपूर्ण कृषि उत्पादक देश होने संबंधित है।
अमेरिका के साथ भारत दुनिया के दो सबसे बड़े खाद्यान्न उत्पादकों में से एक है। ऐसे में समय आ गया है कि इस बात का विश्लेषण किया जाए कि क्या भारत ने अपने कृषि क्षेत्र को अपनी खाद्यान्न आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने का प्रयास किया है। तीसरा महत्वपूर्ण पहलू, जिस पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए, वह यह है कि विश्व खाद्यान्न संकट क्या भारत के लिए सिर्फ एक समस्या का विषय है या फिर यह भारत के विकास के लिए सारी संभावनाएं संजोए हुए है।
आजादी से लेकर आज तक भारत की आबादी लगभग ढ़ाई गुना हो चुकी है। दूसरे शब्दों में कहें तो उपभोक्ताओं की संख्या ढाई गुना हो गई है। साथ ही पिछले लगभग 30 वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था लगातार 5 प्रतिशत या उससे ज्यादा तेजी से बढ़ी है। नतीजतन, देश में बड़ा मध्यवर्ग विकसित हुआ है।
यह मध्यमवर्गीय आय समूह अमेरिकी आबादी से ज्यादा है। जॉर्ज बुश ने भी यही बात कही थी। मानना होगा कि यह मध्यमवर्गीय आय समूह एक सक्षम उपभोक्ता समूह है, जो निश्चित रूप से खाद्यान्न मांग को बहुत व्यापक रूप से प्रभावित कर रहा है। साथ ही घटती गरीबी भी इस मांग को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
पिछले 2 दशकों से भी ज्यादा वक्त से देश में दलहन और तिलहन की पैदावार जरूरत से काफी कम रही है। स्वाभाविक तौर से इन तमाम चीजों को हमें अंतरराष्ट्रीय बाजारों से खरीदना पड़ा है। आज से 15 साल पहले भी अंतरराष्ट्रीय बाजारों में जब भारत तिलहन आदि खरीदने जाता था, तो हमारी मांग इतनी बढ़ी होती थी कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तिलहन आदि की कीमतें बढ़ जाया करती थीं।
आज 15 साल बाद हमारी मांग कहीं ज्यादा बढ़ गई है। साथ ही हमें अक्सर गेहूं और चावल जैसे अनाज की भी खरीद करनी पड़ रही है। भारत और चीन जैसे देशों की खाद्यान्न संबंधी मांग तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उसकी कीमतों को प्रभावित करने की क्षमता जगजाहिर है। लेकिन यह समझना होगा कि यह हमारे विकास का नकारात्मक पहलू नहीं है, बल्कि हमारे विकास का बाई प्रोडक्ट है, क्योंकि इस मांग को हम सृजित कर रहे हैं।
हम ही दुनिया के बड़े उत्पादक भी हैं। यह स्थिति हमें विश्व बाजारों को प्रभावित करने तथा उसे नियंत्रित करने की एक अनोखी क्षमता और संभावना प्रदान करती है। यह एक ऐसी संभावना है, जो भारत को एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखती है। यहां पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में 1970 से लेकर आज तक आए परिवर्तन में एक समानता सी दिखाई देती है।
ध्यान देने की बात यह है कि 1970 के अंत में एकाएक पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ने लगी। इसके कारण ‘ऑयल शॉक’ की स्थिति पैदा हो गई। उपलब्ध तथ्यों से स्पष्ट है कि इस ‘ऑयल शॉक’ का प्रभाव इतना व्यापक था कि इसने धीरे-धीरे भारत की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया। 1991 आते-आते भारत एक आर्थिक संकट की गर्त में पहुंच चुका था।
इसके ठीक उलट हाल के समय में भारत और चीन में जिस तरह का अभूतपूर्व विकास हुआ है, उससे हमारी पेट्रोल पदार्थों की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है। आज विश्वस्तर पर पेट्रोलियम कीमतों में आई तेजी का सीधा संबंध भारत और चीन के विकास से है। हां, हाल के दिनों में हुई कीमतों की बढ़ोतरी 1970 में हुई बढ़ोतरी से तुलनात्मक तौर पर कहीं ज्यादा है। इसके बावजूद भारत में इससे ‘ऑयल शॉक’ जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं हुई।
कारण सीधा है आज की बढ़ती कीमतें भारत तथा चीन निर्धारित कर रहे हैं, यह भारत के विकास का बाई प्रोडक्ट है तथा भारत के विकास को प्रभावित करने वाला कारक नहीं रह गया है। बिल्कुल यही स्थिति खाद्यान्न क्षेत्र में भी है। भारत आज एक महत्वपूर्ण आर्थिक ताकत है। हमारा आर्थिक विकास हमारी बढ़ती हुई क्रय क्षमता के साथ सीधे जुड़ा हुआ है। 1991 के बाद से किए गए आर्थिक सुधारों का सारा ध्यान औद्योगिक क्षेत्रों के विकास तक ही केंद्रित रहा है।
यही कारण है जिसकी वजह से जहां औद्योगिक क्षेत्र 12 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से विकसित हुआ है, वहीं कृषि क्षेत्र की विकास दर 1 प्रतिशत से 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष के बीच सीमित रह गई है। कृषि क्षेत्र की अपार संभावनाओं का दोहन करने से हम पूरी तरीके से चूक गए।
विश्व खाद्यान्न संकट हमारे आर्थिक सुधारों की अपूर्णता की ओर एक महत्वपूर्ण संकेत है। यदि आज हमने अपने कृषि क्षेत्र को तैयार किया होता तो विश्व के बाजारों पर राज कर रहे होते। कहना होगा कि राष्ट्रपति बुश का बयान एक हकीकत को शब्दों में बांधने का प्रयास है।