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कारोबारी लाभ

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 5:37 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अंतरराष्ट्रीय कारोबारी सौदों को भारतीय रुपये में निपटाने की अनुमति देकर सही किया है। इससे आयातकों और निर्यातकों को अपने भुगतान निपटाने का एक और विकल्प मिल जाएगा। केंद्रीय बैंक ने सोमवार को यह घोषणा की कि नए प्रारूप के तहत होने वाले सभी आयात और निर्यात रुपये में निपटाये जा सकेंगे। कारोबारी साझेदारों के साथ विनिमय दर बाजार द्वारा निर्धारित की जाएगी। इसी तरह कारोबारी निपटान के लिए भारतीय बैंकों को यह अनुमति दी गई है कि वे कारोबारी साझेदार देशों में विशेष वोस्ट्रो खाते (ऐसे खाते एक बैंक किसी दूसरे बैंक के लिए  खोलता है) खोल सकें। ऐसे में भारतीय आयातक रुपये में भुगतान कर सकेंगे। इस भुगतान को कारोबारी साझेदार देश के एक विशेष खाते में जमा किया जाएगा। इसी प्रकार निर्यातक भी विदेशों से रुपये में भुगतान ले सकेंगे। आरबीआई का कहना है कि नई व्यवस्था भारत से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए पेश की गई है। यह व्यवस्था दिलचस्प समय पर आई है।
रुपये तथा कुछ अन्य मुद्राओं पर भारी दबाव है और आरबीआई अपने मुद्रा भंडार का प्रयोग इस गिरावट को धीमा करने के लिए कर रहा है। बुनियादी तौर पर देखा जाए तो मौजूदा वित्त वर्ष में चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के तीन फीसदी से ऊंचा रहने की उम्मीद है और पूंजी खाते से भी धन का बहिर्गमन हो रहा है क्योंकि वै​श्विक वित्तीय तंत्र में जो​खिम से बचने की प्रवृ​त्ति बढ़ रही है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने वर्ष के आरंभ से अब तक करीब 30 अरब डॉलर मूल्य की भारतीय परिसंप​त्तियों की बिक्री की है। सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो अगर भारत के कारोबार का अहम हिस्सा रुपये में निपटाया जाता है तो  चालू खाते के घाटे की भरपाई आसान हो जाएगी। इससे विनिमय दर को ​स्थिरता मिलेगी। चूंकि भारत चालू खाते के घाटे से जूझ रहा है इस​​लिए संभव है कि कारोबारी साझेदारों के पास अ​धिशेष भारतीय मुद्रा रह जाए। इसका इस्तेमाल भारतीय परिसंप​त्तियों में निवेश के ​लिए किया जा सकता है।
हालांकि निकट भविष्य में ऐसा होता नहीं दिखता। अ​धिकांश वै​श्विक व्यापार अमेरिकी डॉलर में निपटाया जाता है और आने वाले दिनों में यह ​स्थिति बदलती नहीं दिख रही। जैसा कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के 2021 के एक शोध पत्र में अर्थशास्त्रियों ने दिखाया भी था, सन 1999 से 2019 के बीच वै​श्विक व्यापार में डॉलर में होने वाला कारोबार 97 प्रतिशत अमेरिका में, 74 प्रतिशत हिंद-प्रशांत में और शेष विश्व में 80 फीसदी हुआ। ऐसा आमतौर पर इसलिए होता है कि अमेरिकी डॉलर को सबसे ​स्थिर मुद्रा माना जाता है। जब भारतीय आयातक और निर्यातक डॉलर में कारोबार करते हैं तो वे विनिमय दर का जो​खिम उठाते हैं। यानी डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में संभावित बदलाव का जो​खिम। रुपये में होने वाला निपटान इस जो​खिम को कारोबारी साझेदारों पर डाल देगा। मौजूदा हालात में ज्यादा साझेदार इसके इच्छुक नहीं होंगे।
इन हालात में यह व्यवस्था रूस और श्रीलंका से निपटने में उपयोगी साबित हो सकती है। रूस से भारत के बढ़ते ईंधन आयात को रुपये में निपटाया जा सकता है। इससे प​श्चिमी वित्तीय तंत्र को दरकिनार करने में भी मदद मिलेगी जिसने रूस को अलग-थलग कर रखा है। श्रीलंका के मामले में भारत सरकार रुपये में समर्थन कर सकती है और उसका इस्तेमाल भारत से खाद्य एवं औष​धि जैसी अनिवार्य वस्तुओं का आयात करने में किया जा सकता है। श्रीलंका में आ​र्थिक संकट के चलते आवश्यक वस्तुओं की कमी है। भारत उसे हरसंभव मदद कर रहा है। अगर वह अपनी मुद्रा का इस्तेमाल करे तो उसके लिए मदद का दायरा और आकार बढ़ाने में सुविधा होगी। ऐसे में व्यापक स्तर पर रुपये में व्यापार निपटान सीमित रह सकता है लेकिन इससे लचीलापन बढ़ेगा और चुनिंदा परि​स्थितियों में इसे इस्तेमाल भी किया जा सकता है।

First Published : July 12, 2022 | 11:39 PM IST