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व्यापार गोष्ठी: इसी सत्र से लागू हो कोटा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 06, 2022 | 9:04 PM IST

व्यापक सर्वे के बाद ही लागू हो


हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने का आदेश दे दिया है।


पर इस आदेश को कई चरणों में लागू किया जाएगा। सरकार ने तो आईआईटी और आईआईएम को इसी सत्र से कोटा लागू करने का आदेश दिया है। पर मेरे अनुसार, आईआईएम(अहमदाबाद) का यह कहना बिल्कुल सही है कि वह कोटा को चरणबद्ध प्रक्रिया में लागू करेगी। वाकई में यदि जरूरतमंद को फायदा पहुंचाना है तो इस कोटे को व्यापक सर्वेक्षण के बाद ही लागू किया जाना चाहिए। – अजय शर्मा, लॉ स्टूडेंट हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला


ब्रेन-ड्रेन की स्थिति पैदा होगी


इसका एक असर तो यह भी हो सकता है कि अब पहले से ज्यादा संख्या में मां-बाप अपने बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजेंगे। अब की स्थिति में केवल 50.5 फीसदी सीटें ही सामान्य वर्ग के लिए उपलब्ध होंगी, जाहिर है अब प्रतियोगिता पहले से ज्यादा कड़ी हो जाएगी। जो छात्र नामांकन  से वंचित रह जाएंगे वे विदेश का ही रुख करेंगे। – अदिति शर्मा, पंजाब विश्वविद्यालय, यूबीएस, चंडीगढ़


राजनीति से प्रेरित है कोटा


देश में कोटे का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि जरूरतमंद कोटे से लाभांवित नहीं हो पा रहे हैं बल्कि कोटे का फायदा सबल लोग ही उठा रहे हैं। मेरा मानना है कि कोटे (आरक्षण) को पूरी तरह खत्म कर दिया जाना चाहिए। किसी भी जाति विशेष के आधार पर कोटा नहीं दिया जाना चाहिए।


सरकार को चाहिए कि एनजीओ के द्वारा पूरे देश में सर्वेक्षण करवाए की देश में कितने लोगों को वास्तव में कोटे की जरूरत है, फिर सरकार द्वारा सर्टिफिकेट मुहैया कराया जाए और उसी के आधार पर लोगों की मदद की जानी चाहिए। – देवेंद्र, हिंदू कॉलेज, नई दिल्ली


इसी सत्र से लागू हो आरक्षण


गांवों में आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में जिन्दगी गुजार देते हैं। इनमें पिछड़े व निम्न वर्ग के लोगों का प्रतिशत अधिक है। आज-कल प्रबंधन संस्थानों ने व्यवसायिकता का रूप धारण कर लिया है। जिसके चलते ये ज्ञान केंद्रित न होकर अर्थ केंद्रित हो गए हैं।


सरकार ने मैनेजमेंट स्कूलों को मान्यता शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दी थी ताकि प्रत्येक नागरिक भारत के विकाश में अपनी भागीदारी दर्ज कर सके। वह किसी वर्ग विशेष तक सीमित न रह जाए। अत: मैनेजमेंट स्कूलों में इसी सत्र से आर्थिक आधार पर आरक्षण (कोटा) लागू हो जाना चाहिए। जिससे आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को अपनी उन्नति का अवसर मिलेगा। प्रतिभा किन्ही सीमाओं की मोहताज नहीं है। – मनोज कुमार ‘बजेवा’ एवं हेमंत चतुर्वेदी, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय,हरिद्वार


आधार जातिगत नहीं आर्थिक हो


किसी भी नई नीति को लागू करने के लिए सरकार द्वारा व्यापक प्रबंध किए जाने चाहिए। अक्सर देखने में यह आता है कि किसी भी मुद्दे पर सालों बहस तो होती है, लेकिन उसके क्रियान्वयन के लिए उचित व्यवस्था हेतु गंभीर सकारात्मक विचार-विमर्श नहीं होता। सरकार आरक्षण या कोटे की बात तो करती है लेकिन वह सिर्फ वोट की राजनीति से प्रेरित होती है। आरक्षण का आधार जातिगत न होकर आर्थिक होना चाहिए।  – सुनील जैन ‘राना’, छत्ता जम्बूदास, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश


जितना जल्दी हो, उतना बेहतर


कोटा लागू होने वाला है, यह अच्छी बात है। इस बाबत सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी आ गया है, तो इसे जितना जल्दी हो सके लागू कर दिया जाना चाहिए। हालांकि सरकार ने कोटे को लागू करने के लिए कुछ ज्यादा ही जल्दीबाजी की है। सरकार को चाहिए था कि वे आर्थिक दृष्टिकोण के आधार पर कोटा लागू करती। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि सामान्य श्रेणी में भी कई ऐसे परिवार हैं, जो आर्थिक दृष्टि से बेहद कमजोर हैं। – नीरज सिंह, हिंदी (ऑनर्स), हिंदू कॉलेज, दिल्ली


इसी सत्र से कोटा हो


मैनेजमेंट स्कूलों में बहुप्रतीक्षित कोटा प्रणाली इसी सत्र से कार्यान्वित हो, ऐसी बात न केवल ‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ की है, बल्कि हिन्दुस्तान के आधे से ज्यादा उस वर्ग से आ रही है, जो भारतीय साम्यवाद, समाजवाद एवं समतावाद की बुनियाद पर ‘आधारित’ हैं। – विकास वात्सल्य, (मैनेजमेंट विशेषज्ञ), विकास ऑफसेट प्रिंटर्स, बुधवारी बाजार, छिन्दवाड़ा, मध्य प्रदेश


व्यापार के भविष्य के लिए लाभकारी


मैनेजमेंट स्कूल, जहां से स्टूडेंट व्यापार की शिक्षा, व्यापार की सभ्यता और व्यापार प्रबंधन सीखता है, जो केवल इसलिए कि आगे आने वाले समय में व्यापार को अच्छी ऊंचाई मिल सके। उसके लिए आज भारत में हजारों मैनेजमेंट स्कूल हैं, जहां पर प्राय: कोटा सिस्टम का अभाव है, जिसे कि शुरू किया जाना न केवल व्यापार के भविष्य के लिए लाभकारी होगा, बल्कि वर्तमान प्रणाली के लिए एक बढ़िया कदम होगा। इससे एकाधिकार की प्रवृति पर अंकुश लगेगा। – श्रीमती प्रभा वात्सल्य, विकास ऑफसेट प्रिंटर्स, बुधवारी बाजार, छिंदवाड़ा


पिछड़ा हुआ वर्ग तरक्की कर जाएगा


कोटा इसी सत्र से लागू हो
भले बड़ा न काम, हाथ में छोटा हो
लेकिन वह हो बढ़िया, एकदम मोटा हो।
ये बाजार यहां पर, सब कुछ चलता है
अपना सिक्का अच्छा हो, या खोटा हो।
पिछड़ा हुआ वर्ग तरक्की कर जाएगा
मैनेजमैंट स्कूलों में, इसी सत्र से कोटा हो।


– गुलाबचंद वात्सल्य, बुधवारी बाजार, छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश


सेना और प्रबंधन में नहीं हो कोटा


जिस तरह देश की सुरक्षा हेतु कोई समझौता नहीं किया जा रहा उसी तरह देश के प्रबंधन में भी सेना की तरह कोटा नहीं होना चाहिए। कोटा लागू होने से देश का प्रबंधन गड़बड़ा सकता है। काबिलियत के अनुसार चयन ही सही तरीका है मैनेजमेंट में। ये काबिलियत का अपमान है। लाभ ही देना है तो शिक्षा ग्रहण करने पर नि:शुल्क पाठयक्रम नि:शुल्क शिक्षा एवं मैनेजमेंट परीक्षा की नि:शुल्क तैयारी में सरकार जनजाति पिछड़ावर्ग का शत प्रतिशत लाभ दे तो शायद किसी को भी आपत्ति नहीं होगी। – नरेश व्यास,
बद्रीनारायण की गली, गुन्दी का मोहल्ला, जोधपुर, राजस्थान


समय-समय पर समीक्षा हो


पारदर्शिता एवं चरणबध्द तरीके से इसे इसी सत्र से लागू करना चाहिए। मोइली समिति ने स्पष्ट कहा था कि आरक्षण चरणबध्द तरीके से आगामी तीन वर्षो में लागू हो। इस बीच सीटों में तथा आधारभूत संरचना में पर्याप्त वृध्दि कर ली जाए ताकि सामान्य संवर्ग के छात्रों के वर्तमान सीटों में कोई कटौती न हो। इसके साथ आरक्षण को अनंत काल का उपहार न मानकर इसकी मूल भावना को ध्यान में रख कर समय-समय पर इसकी समीक्षा भी होनी चाहिए जिसकी ओर सुप्रीम कोर्ट ने इशारा भी किया है। – विवेक कुमार सिंह, सहायक प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक, स्काई स्टार बिल्डिंग, सिलीगुड़ी


केवल वोट बैंक के लिए


जब भी कोई व्यक्ति किसी क्षेत्र विशेष में देश का गौरव बढ़ाता है तब यह नहीं देखा जाता कि वह किस ‘कोटे’ का है? आज कोटा यानी जाति व वर्ग विशेष को दी जाने वाली सुविधाएं केवल वोट-बैंक की द्योतक बन कर रह गई हैं, जिससे राष्ट्र गौरव अथवा श्रेष्ठता की उम्मीद नहीं करना चाहिए। ऐसे में यदि कोटे के अंतर्गत मैनेजमेंट स्कूलों में प्रवेश दिया जाता है तब निश्चित ही लाभांवित होने वालों से उच्चतर श्रेष्ठता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। – संतोष मालवीय ‘प्रेमी’, आरएमएस कॉलोनी चौराहा, 222 मालवीय गंज, इटारसी


संस्थानों की स्वायत्तता जरूरी


एक तरफ महंगाई एवं बढ़ती मुद्रास्फीति तो दूसरी तरफ आरक्षण, कोटा की समस्या। इनमें कई समस्याओं का आकलन करते हुए कोटा इसी सत्र से लागू हो या नहीं, किस प्रणाली, नीतियों पर पुरजोर ध्यान आवश्यक है, किस मैनेजमैंट आधार को अपनाना है, सभी को दृष्टिगत रखते हुए ही सरकार को आगे बढ़ना चाहिए। – नयन प्रकाश गांधी,
वसंत विहार, कोटा, राजस्थान


इस सत्र से संभव नहीं है कोटा


इसी सत्र में मैनेजमेंट स्कूलों में कोटा लागू होने की कोई गुंजाइश नहीं बचती है। ज्ञात हो कि सभी मैनेजमेंट शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया लगभग पूर्ण हो चुकी हैं तो संस्थानों द्वारा कोटा लागू करने की सभी संभावनाएं क्षीण हो चुकी हैं। इसके अलावा मैनेजमेंट संस्थाओं में आरक्षण  लागू करने के लिए बुनियादी सुविधाओं को सर्वप्रथम अमल में लाना होगा। – डॉ. गुंजन, प्रवक्ता, यूथ फॉर इक्वालिटी, मुंबई


इसी सत्र से लागू होना जरूरी


इसी सत्र से कोटा लागू होना जरूरी है। शैक्षणिक संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है, लेकिन इतनी संख्या में इस वर्ग से आनेवाली छात्रों की संख्या में काफी कमी देखी जा रही है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले  के अनुरूप इस प्रावधान को संपूर्ण तरीके से अमल में लाने के लिए 3 से 4 वर्षों का समय और लग सकता है। अंकों और काबिलियत के आधार पर भी छंटनी होने की संभावना काफी अधिक है। – डॉ. ए. जे. सिंह, प्रिंसिपल, दादर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट, मुंबई


समग्र विकास के लिए आवश्यक


देश में समग्र विकास के लिए सभी वर्ग के लोगों की भागीदारी आवश्यक है। मैनेजमेंट स्कूलों में इसी सत्र से कोटा लागू होना चाहिए, जिससे देश के आर्थिक रूप से पिछड़े व कमजोर लोगों को देश के विकास में भागीदार बनाया जा सके। कोटा सिस्टम इसी सत्र से लागू होना चाहिए। – अमर आनंद मेरठी, कृष्णा कॉलोनी, मेरठ कैंट, उत्तर प्रदेश


यह प्रतिभा के खिलाफ


दुनिया में आदर्श स्थिति वह है जहां किसी तरह का कोई कोटा या आरक्षण न हो, न राजनैतिक और न ही आर्थिक क्योंकि यह प्रतिभा के खिलाफ है। आरक्षण के बजाए बेहतर तो यह होगा कि समाज के कमजोर तबके को ज्यादा से ज्यादा संसाधन मुहैया कराए जाएं। आने वाले कुछ सालों में यह कोटा निजी क्षेत्र में भी लागू कर दिया जाएगा। इससे हमारी अर्थव्यवस्था के  विकास और प्रतियोगी स्थिति बुरी तरह प्रभावित होगी। – विक्रम भवानी सिंह, एमबीए प्रथम वर्ष, डिपार्टमेंट ऑफ मैनेजमेंट साइंस, पुणे विश्वविद्यालय 
  
जातिगत विभेद नीति सही नहीं


सरकार जातिगत विभेद की नीति अपना रही है। यह पूरी तरह से अमानवीय है और सरकार सिर्फ वोट बैंक के लिए ऐसा कर रही है। क्यों नहीं राष्ठ्रपति और प्रधानमंत्री पद के लिए भी सीट आरक्षित कर दी जाती। – पंकज कुमार, प्रथम वर्ष, राय बिजनेस स्कूल, फरीदाबाद


बकौल विश्लेषक


कोटा लागू हो पर संस्थानों की क्षमता भी तो देखिए


देश के सभी प्रबंधन संस्थानों को इसी सत्र से कोटा लागू कर देना चाहिए। लेकिन कोटा को लागू करने से पहले यह देखना होगा कि संस्थानों के पास क्षमता कितनी है। अलग-अलग संस्थानों की अलग-अलग क्षमता होती है। उदाहरण के लिए भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) का इन्फ्रास्ट्रक्चर बहुत अच्छा है, जहां कोटा लागू करने में दिक्कत नहीं आएगी। लेकिन दूसरे संस्थानों को थोड़ा वक्त और सहायता दी जानी चाहिए ताकि वे अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को विकसित कर सकें ।


कोटा को लागू किए जाने से निस्संदेह छात्रों की संख्या में बढ़ोतरी होगी और साथ ही शिक्षकों पर भी भार बढ़ेगा। इसका कोई तुरंत समाधान तो नहीं है और संकाय सदस्यों की भर्ती प्रक्रिया में भी वक्त लगेगा। लेकिन जब तक इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए जाते हैं तब तक संस्थानों को यह भार उठाना ही चाहिए।


वर्तमान समय में प्रबंधन संस्थानों में पैसे वाले छात्रों की बहुलता है। अब क्योंकि कोटा लागू कर दिया जाएगा तो अब इस ओर अधिक से अधिक संख्या में छात्र आकर्षित होंगे। यह व्यावसायिक विषय अब किसी खास तबके तक ही सिमट कर नहीं रह जाएगा।


हमें इस बात पर खासाध्यान देना चाहिए कि छात्रों की संख्या बढ़ जाने से संस्थान की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। गुणवत्ता से मेरा आशय पढ़ाई से है। इसके अलावा हम लोगों को अपने अंतरराष्ट्रीय स्तर को कायम रखना होगा। कोटा लागू किए जाने से कितने लोग लाभान्वित होंगे, इस बारे में कुछ भी निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। – सुनीता सिंह सेनगुप्ता, प्रोफेसर, फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज


बातचीत: पवन कुमार सिन्हा


क्या प्रवेश परीक्षा के लिए तैयार हैं ओबीसी छात्र ?


इस बाबत सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी हरी झंडी दिखा दी गई है। इसमें कोई शक नहीं कि कोटे को लागू किए जाने से संस्थानों में सीटें बढाई जाएंगी। लिहाजा सरकार ने इस साल अतिरिक्त सीटों की पूर्ति के लिए आईआईएम को करीब 53 करोड़ रुपये और अन्य संस्थानों को कुल 2500 करोड़ रुपये की राशि मुहैया करवाई है।


लेकिन प्रश्न यह है कि ओबीसी में आने वाले छात्र क्या इस वक्त प्रबंधन संस्थानों में दाखिले के लिए पूरी तरह तैयार हैं? सरकार द्वारा इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए हैं ताकि उन छात्रों द्वारा प्रबंधन संस्थानों एवं अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों की प्रवेश परीक्षा वे पास कर सकें।


बहरहाल आईआईएम जैसे संस्थानों में पढ़ने की इच्छा रखने वाले छात्रों (ओबीसी) के सामने सबसे बड़ी समस्या पैसे की भी है। अधिकांश छात्र आर्थिक दृष्टि से सक्षम नहीं होने की वजह से भी संस्थानों में दाखिला नहीं ले पाते हैं।


इसके अलावा प्रबंधन संस्थानों में कोटे संबंधी सीटों की पूर्ति को लेकर कर भी है। पहले से एससीएसटी के लिए लागू किए गए कोटे में छात्रों की संख्या पूरी नहीं पाती है। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसी स्थिति ओबीसी कोटे में भी संभव हो। ऐसी स्थिति में सामान्य वर्गों के छात्रों का दाखिला हो सकता है।


एक आंकड़े के मुताबिक अधिकांश भारतीय प्रबंधन संस्थानों में काबिल छात्र नहीं मिल पाने की वजह से एसटी कोटे की 30 फीसदी सीटें खाली रहती हैं। अखबार में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते साल आईआईएम अहमदाबाद में एसटी के लिए 19 आरक्षित सीटों में से करीब 10 सीटें खाली रह गई थीं। – श्रीलता मेनन, संपादक (सामाजिक क्षेत्र) , बिज़नेस स्टैंडर्ड


पुरस्कृत पत्र


क्रमबध्द तरीके से लागू किया जाए


उच्चशिक्षा में ओबीसी आरक्षण को सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी मिलने के बाद उसका सही क्रियान्वयन करना किसी यक्ष-प्रश्न से कम नहीं है। पूरा  27 फीसदी आरक्षण लागू करना जबकि शिक्षा की गुणवत्ता में कमी न आए, भारतीय प्रबंधन संस्थानों व भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के लिए कम चुनौती पूर्ण नहीं है।


इस संदर्भ में, बेहतर यही होगा कि आरक्षण-व्यवस्था को क्रमबध्द तरीके से प्रतिवर्ष दस-प्रतिशत ओबीसी छात्रों को चयनित कर आरक्षण को तीन वर्ष की अवधि में पूरी तरह लागू करना चाहिए तथा इन संस्थानों में उपलब्ध स्थानों में भी इतनी ही वृध्दि प्रतिवर्ष करनी चाहिए। इन संस्थानों को पर्याप्त संसाधन जुटाने का अवसर भी मिल जाएगा। क्रमबध्द आरक्षण ही ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के सामाजिक लक्ष्य को पा सकता है। – तरुण शर्मा, 297, ढाका जौहर, मुखर्जीनगर, दिल्ली


सर्वश्रेष्ठ पत्र


यह समाज को बांटने वाला है


मेरी राय में देश के किसी भी शिक्षण संस्थान में कोई कोटा नहीं होना चाहिए। ऐसा इसलिए कि कोटा समाज में हिंसा, भेदभाव और घृणा पैदा करता है। यह समाज को कई भागों में बांटता है। आज लोग एक-दूसरे को उसकी जाति की वजह से जानते हैं न कि आदमी के दिमाग और उसकी बहुमुखिता के चलते।


यह प्रतियोगिता है जो तय करे। इसे तय करना राजनीतिज्ञों का काम नहीं है।  यह सही है कि पिछड़े वर्ग के लोगों को कुछ सहयोग चाहिए पर ऐसा सहयोग जो समाज में बंटवारा कराए, उचित नहीं है। – गौतम कुमार, आईआईएलएम इंस्टीटयूट ऑफ हायर एजुकेशन, लोदी रोड, नई दिल्ली


समान धरातल बनाना होगा


यह ठीक है कि समाज के कमजोर तबके को मदद की दरकार है लेकिन वह दूसरे वर्गों की कीमत पर तो नहीं हो सकता।  क्या यह सही होगा कि सामान्य श्रेणी के एक प्रतियोगी की सीट संसाधनों की सीमितता के चलते हाथ से चली जाए और किसी मंत्री का आरक्षण प्राप्त भतीजा उस पर काबिज हो जाए।


हमें छात्रों के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए एक समान धरातल सुनिश्चित करना होगा। जरूरत इस बात की है कि व्यावसायिक शिक्षा और प्रशिक्षण के लिए गांवों और छोटे शहरों  में कॉलेज खोले जाएं। – आशुतोष कुमार, एमबीए छात्र, आईएमईआरटी – पुणे विश्वविद्यालय


इस साल नहीं लागू होना चाहिए


आरक्षण लागू करने से पहले संविधान देखना चाहिए। भारतीय संविधान सभी वर्गों को समान अधिकार की बात कहता है। ऐसे में जाति या वर्ग विशेष को आरक्षण देने से समाज बंट जाएगा। कई मायनों में यह योग्यता की तिरस्कृत करने और अयोग्यता को पुरस्कृत करने की बात है।


पहले भी पिछड़ी जातियों के आर्थिक रूप से सबल वर्ग को ही फायदा हुआ है। ऐसे में आरक्षण लागू करने के विषय में राष्ट्रीय सहमति होनी चाहिए, उसके बाद ही कदम आगे बढ़ाये जाने चाहिए। कम से कम इस साल से तो आरक्षण लागू नहीं होना चाहिए। – बी.डी.दीक्षित,  रेलवे अधिकारी(सेवा.), आई.पी. एक्सटेंशन, दिल्ली


सुप्रीम कोर्ट का फैसला सर्वोपरि


सुप्रीम कोर्ट का निर्णय दो विचारधाराओं के बीच सामंजस्य स्थापित कर विधि के सुप्रसिध्द सिध्दांत ‘हर्मोनियस कंस्ट्रक्शन’ को स्थापित किया है। इसमें निहित उद्देश्य सभी के लिए उच्च गुणवत्ता की शिक्षा है। मैनेजमेंट स्कूल इसी सत्र से कोटा को लागू कर न्यायपालिका के प्रति सम्मान दर्शा सकते हैं।


इसी सत्र से प्रवेश करने देने से पहले सुनिश्चित करना होगा कि प्रतिभाएं बाहर न रह जाएं और बिलकुल नालायक, प्रबंधन में आकर इस क्षेत्र की गरिमा व गुणवत्ता को तार-तार न करने पाएं। सर्वोच्च न्यायापालिका का निर्णय अंतिम है। – मनोज बिनिवाल, एलएलबी, फाइनल इयर, 1513, केईएच कंपाउंड, इंदौर


…और यह है अगला मुद्दा


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First Published : May 5, 2008 | 12:26 AM IST