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व्यापार गोष्ठी: बिहार बाढ़: प्रकृति के आगे क्यों हैं बेबस?

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:05 PM IST

खुद लोगों ने बुलाई है यह आपदा
राजेंद्र प्रसाद मधुबनी
व्याख्याता मनोविज्ञान, फ्रेंड्रस कॉलोनी, वार्ड न.-14, मधुबनी, बिहार


बाढ़ बिहार के लिए आम है, भले ही जनता और सरकार माने या न माने। बाढ़ की बेलगाम जलधारा नेपाल से होते हुए बिहार आती है। साल 1964 में हुई भारत-नेपाल संधि तकनीकी रूप से पुरानी पड़ चुकी है।

नेपाल से कोसी के  पानी को अधिक मात्रा में बिहार में छोड़ा जाता है। ईंट-चिमनी और रोड-मकान बनानेवालों ने मिट्टी की कटाई नदी की तलपेटी से न करके उपजाऊ मिट्टी को ही काट दिया, जिससे शहर-गांव से ऊंची नदी की तलपेटी हो गई है।

किसे है कुदरत के कहर की चिंता?
विकास कासट
373, विवेक विहार सोडाला, जयपुर

विश्व की सबसे विशालतम लोकतांत्रिक प्रणाली, बड़े पूंजीपति, सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश अपने स्वार्थों में जैसे कि राजनैतिक पार्टियां विपक्ष से अपनी सीट बढ़ाने के चक्कर में, पूंजीपति विदेशी अधिग्रहण के तमगे बढ़ाने के चक्कर में एवं बाकी देश की जनता अपने-अपने स्तर पर अपने अस्तित्व को बचाने के चक्कर में है और ऐसे में कुदरत द्वारा की जाने वाली विनाशलीला को देखकर दो-चार दिन के हो-हल्ला के बाद सब सामान्य हो जाता है। जबकि कुदरत हर विनाश से बचने के मौके देती है चाहे वह बाढ़, भूकंप या तूफान ही क्यों न हो लेकिन ऐसी बारीकियों को देखने वालों की आवाज स्वार्थी समूह के सामने दब जाती है।

दोष नदी का नहीं, निजाम का है
सुशीला देवी
शांति निवास, पहलवान गली, बाकरगंज, पटना

कोसी की बाढ़ कोई साधारण नहीं बल्कि असाधारण है। विडंबना देखिए, सरकार अपनी गलती और लापरवाही को कबूल करने के बजाए दलील दे रही है कि कोसी की धारा मुड़ गई है और यह प्राकृतिक कहर है। सवाल उठता है कि इसका अंदाजा हमारे इंजीनियरों व राजनेताओं को कब से होने लगा? अगर कोसी इतनी आसानी से अपनी चाहत को अंजाम दे देती है तो फिर अरबों रुपये खर्च करके उस पर तटबंध क्यों बनाए गए थे? अगर हमारी कार्यप्रणाली में जिम्मेदारी तय करने और उस पर कार्रवाई करने का रिवाज होता तो शायद प्रलयंकारी बाढ़ नहीं आता।

बया से सीखें आपदा प्रबंधन
बी. सिंह भदौरिया
निदेशक, कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, हुडील हॉउस, रोडवेज बस डिपो, सीकर, राजस्थान

बया नामक छोटी से चिड़िया बरसात से पहले लटकता घर (घोंसला) बनाकर उसमें दाना-पानी रखती है और सारी बरसात मौज करती है। बिहार, केंद्र और नेपाल सरकार बाढ़ को रोकने के लिए रणनीति बनाकर पुराने बांधों की मरम्मत करवाते, नदी-नालों के तटबंध दुरुस्त करवाते, अतिरिक्त जल संचय करने हेतु आवश्यकतानुसार और बांध बनवाते तो संभवत: हमें प्रकृति के आगे विवश नहीं होना पड़ता।

कोई एक कसूरवार नहीं
महर्षि श्याम लाल
एकवोकेट, पूर्व विधायक, चाईटोला, पुरानी बस्ती, बस्ती, उत्तर प्रदेश

बिहार बाढ़ में सर्वाधिक योगदान तीन ‘न’ का है- नेपाल, नीतीश और नेचर। इन तीनों की अपनी विवशता है। कसूरवार किसी एक को नहीं ठहराया जा सकता है लेकिन हमें पहले चुनौतियां देखनी चाहिए। राहत पर राजनीति बाद में कर लेंगे। फिलहाल बाढ़ प्रभावितों को साफ पानी चाहिए, उनको खिचड़ी-चोखा के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। पलायन को रोकना सबसे बड़ा पुण्य होगा क्योंकि इससे दूसरे राज्यों में हालात बेकाबू हो सकते हैं इसलिए किसी एक को नहीं एक अरब देशवासियों को मिलकर मदद करनी चाहिए।

केवल चर्चा और बयानबाजी होती है
श्रवण कुमार नायडू
जमशेदपुर, झारखंड

जब-जब हम प्रकृति के साथ कुकृत्य करेंगे, तब-तब प्रकृति अपनी वीभत्स, विनाशकारी रूप दिखाएगी, फिर चाहे वह बाढ़ के रूप में हो या फिर तूफान के रूप में। हमें प्रकृति संतुलन बनाते हुए प्रकृति के अनुरूप कोई स्थायी समाधान निकालना होगा, जिससे जानमाल की कम बर्बादी हो। करोड़ों रुपये खर्च कर बांध बनाने के बजाए प्रकृति के अनुरूप नदियों से नदियों को जोड़कर भारत के सभी प्रदेशों में पानी का बहाव किया जाए।

एक सुस्पष्ट रणनीति का अभाव
सौरभ राज
सी-297298, नेहरू विहार, नई दिल्ली

‘ब’ से ‘बिहार’ और ‘ब’ से ‘बाढ़’ दोनों एक-दूसरे के पूरक हो गए हैं। क्योंकि यह आपदा वर्तमान की नहीं वरन सदियों की है। हर वर्ष बाढ़ आती है और अपना वीभत्स रूप दिखा जाती है। इस पर चर्चाएं और राजनैतिक बयानबाजी भी काफी होती है लेकिन जो सबसे जरूरी है वह नहीं होता है, कि आगे आने वाले दिनों में इस विभीषिका से कैसे बचा जाए या लोगों को बचाया जाए। सरकार को चाहिए कि कोसी के तटबंधों का कंक्रीटीकरण किया जाए, जिससे कि यह नदी बार-बार अपना रास्ता न बदल सके।

कभी दूरगामी नीति नहीं बनाई गई
प्रशांत वर्मा
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

बिहार में हर साल बाढ़ आती है लेकिन कभी भी दूरगामी प्रयासों पर ध्यान नहीं दिया जाता है, जो बाढ़ के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकें। बाढ़ आने के बाद करोड़ों रुपये के राहत पैकेट को बांटना सरकार को मंजूर होता है लेकिन इन करोड़ों रुपये को बांधों व तटबंधों को बनाने, उन्हें ऊंचा करने, उनकी मरम्मत करने या नए बांधों के निर्माण में नहीं खर्च किया जाता है।

कोसी नदी अपने साथ सबसे ज्यादा रेत ले आती है, जिससे नदी की गहराई निरंतर घट रही है और कम बारिश में भी बाढ़ आ जाती है। इतना ही नहीं तटबंधों के किनारे कहीं-कहीं इतना रेत जमा है कि उनकी ऊंचाई तटबंधों के बराबर हो गई है। ऐसे में ये तटबंध कैसे बाढ़ को रोकने में सक्षम हो सकते हैं?

प्रकृति की उपेक्षा से है यह मंजर
डॉ. जी. एल. पुणताम्बेकर
रीडर, वाणिज्य विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मध्य प्रदेश

बिहार की बाढ़ प्रकृति नहीं पश्चिमी विकास मिथकों, भ्रष्टाचार तथा आपराधिक लापरवाही के आगे बेबस होने का मामला है। प्रकृति की ताकत के प्रति लापरवाही और उपेक्षा से ऐसे ही खौफनाक मंजर पैदा होते हैं। प्रकृति के साथ समन्वय कर उसके दोहन से सुखोपभोग के साथ जुटाने की भारतीय संस्कृति के विपरीत नीतियों और उस पर बेलगाम भ्रष्टाचार ‘कोढ़ में खाज’ है।

विज्ञान के सहारे जूझ तो सकते हैं
कृष्ण कुमार उपाध्याय
एडवोकेट, 8262 बैरिहवां, बस्ती, उत्तर प्रदेश

शायद ही कोई ऐसा हो, जो यह न जानता हो कि प्रकृति सब पर भारी पड़ती है। इसके बावजूद एक के बाद एक हो रहे आविष्कार और वैज्ञानिक प्रगति ने मानव को इतना सक्षम तो बना ही दिया है कि वह आपदाओं को पूरी तरह भले न रोक सके लेकिन उससे होने वाले नुकसान को कम तो कर ही सकता है। तमाम विकसित राष्ट्र, जिन्होंने प्रकृति से होने वाले नुकसान को नियंत्रित करने का प्रयास किया, उन्हें कामयाबी भी मिली। भारत में भी ऐसा ही होना चाहिए। इसमें सबको मिलजुलकर मदद करनी चाहिए।

नेतागण हैं सबसे बड़े दोषी
ओ. पी. मालवीय
भोपाल, मध्य प्रदेश

बिहार बाढ़ की बेबसी का सबसे बड़ा कारण वहां के नेतागण हैं। वे सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे हैं। अगर उन्हें अपने राज्य की इतनी ही चिन्ता होती तो आज यह हालत नहीं होती। केंद्र सरकार को बिहार की जिम्मेदारी लेने की आवश्यकता है। बिहार में इससे पहले भी कई बार बाढ़ आई है और लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं। उत्तर बिहार में विकास के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ है। बिहार को सुदृढ़ करने के लिए आम लोगों को भी आगे आना होगा। कोसी नदी को लेकर अभी तक कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया है।

समय रहते कदम नहीं उठाए गए
अफजल हुसैन ‘अफजल’
परसा तकिया, पुरानी बस्ती, उत्तर प्रदेश

बिहार में आई बाढ़ ने लाखों लोगों को गहरे संकट में डाल दिया है और कई गांवों का नामो-निशान मिटा दिया है। इस समस्या का व्यावहारिक हल ढूंढना होगा, तभी आगे के खतरों से बचा जा सकता है। नेपाल में भीमनगर के पास तटबंध टूटने के बाद कोसी की धारा ने नया रास्ता बनाया और इस जानकारी के बावजूद तत्काल मरम्मत के उपाय नहीं किए गए वर्ना संकट इतना विकराल नहीं होता। कोसी परियोजना भारत नेपाल समझौते के तहत नेपाल स्थित बैराज निर्माण, उसकी मरम्मत और रख-रखाव की  जिम्मेदारी बिहार सरकार की है।

बाढ़ में भी नेता कर रहे कमाई
दीपशंकर व्योमकेश
पत्रकारिता एवं जनसंचार छात्र, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, गायत्रीकुंज, हरिद्वार

कुछ अनहोनी प्राकृतिक आपदा जो यदा-कदा घटती है को छोड़कर पृथ्वी, जल, वायु सभी जगहों पर मानव ने प्रकृति पर हस्तक्षेप किया है। बिहार की बाढ़ कोई नई घटना नहीं है। कोसी की उपान हर वर्ष इस तरह की स्थिति पैदा करती है लेकिन क्या इसे हम नियति मान लें? या फिर प्रकृति के आगे बेबसी? आज छोटे-छोटे देश तक बाढ़ से निपटने के लिए पक्के बांध बना चुके हैं किंतु हमारे देश में बाढ़ तो मंत्रियों अफसरों आदि की कमाई का अच्छा स्रोत बन चुका है।

सरकार को बनानी होगी योजना
एम.पी.नायर
सहायक महाप्रबंधक (एचआर), ग्लोबलिंक डब्ल्यू डब्ल्यू इंडिया प्रा.लि., मुंबई

बिहार जैसी प्रकृति आपदा देखकर लगता है कि धरती की उम्र कम हो रही है। इसके लिए जिम्मेदार भी हम लोग ही हैं। पर्यावरण में घोला जा रहा प्रदूषण का जहर हम सबको विनाश की ओर ले जा रहा है। पृथ्वी पर हरियाली कम हो रही है, प्राकृतिक चक्र का संतुलन बिगड़ रहा है, इस बात को समय रहते समझना होगा। हमें एक दूसरे की मदद करनी चाहिए। ऐसी आपदाओं को रोकने केलिए सरकार को एक योजना बनानी होगी।

बहुउद्देशीय परियोजनाओं की जरूरत
मुनीश्वर
अशोकनगर, पोखरिया, बेगूसराय, बिहार

अपने पुरुषार्थ, प्रतिभा व परिश्रम से दुनिया भर में कामयाबी का झंडा गाड़ चुके ‘बिहारी’ अपने ही प्रांत में प्रकृति की मार झेल बर्बादी, बेबसी और बेकारी का जीवंत पर्याय बन चुके हैं। हर साल बांध की सुरक्षा और तबाही के बाद सहायता, गुणवत्ता, पुर्नवास पर अरबों रुपये खर्च किए जाते हैं। अगर केंद्र और राज्य सरकार दीर्घकालीन नीति बनाकर नेपाल के साथ वार्ता कर बहुउद्देशीय परियोजनाओं को लाती हैं तो निस्संदेह बाढ़ की इस विभीषिका से निजात संभव होगी।

पुरस्कृत पत्र

पूर्व प्रबंधन में राहत कोष क्यों नहीं?
मंजरी पाण्डेय
राष्ट्रीय उर्वरक-भण्डार, गोसाईंगंज, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश

बिहार बाढ़ के मामले में हमारी स्थिति कमोबेश वैसी ही है, जो आजादी के समय थी। हम लोग हर साल बाढ़, विस्थापन, बर्बादी और मौत का मंजर देखते हैं बस अंतर रहता है तो केवल आंकड़ों में। बिहार की भौगोलिक सरंचना, नेपाल के प्रति कमजोर विदेश-नीति के कारण कोसी-समझौते की अवहेलना, बांध बनाने में हमारी असमर्थतता, सरकार और प्रशासन का ढुलमुल रवैया आदि इसे प्राकृतिक आपदा से ज्यादा भी कुछ बना देता है।

कोसी और अन्य नदियां तो हर साल अपना कहर बरपाती हैं। लेकिन कमजोर इच्छाशक्ति और अदूरदर्शिता के कारण हम आज तक कोई प्रभावी मशीनरी नहीं बना पाए। जो राहत कोष सरकार बाढ़ के बाद बनाती है, वही राशि बाढ़ के पहले क्यों नहीं इस्तेमाल में लाई जाती है?

सर्वश्रेष्ठ पत्र

सांप बिल में गया, लकीर पीटते रहे
हर्ष वर्ध्दन कुमार
सृष्टि रूपा भवन, सरस्वती लेन, पूर्वी लोहानीपुर, पटना बिहार

सीधी सी बात है कि हम अपनी गलतियों से सबक नहीं लेते हैं और स्थिति विस्फोटक होने पर हाथ-पांव खड़े कर देते हैं। मेरी राय में यह प्राकृतिक कहर कम राजनीतिक अदूरदर्शिता की देन ज्यादा है। नहीं तो आखिर क्या कारण है कि 1986 में अपने जीवन काल को समाप्त कर चुके भीम नगर बैराज का आज तक पुननिर्माण नहीं किया गया। कोसी की उफनती धाराएं सूबे में व्यापक जानमाल के नुकसान का सबब बनीं और बाढ़ बिहार की नियति। सांप बिल में चले जाने पर लकीर पीटने की आदत को आखिर हम कब त्यागेंगे?

नेता हैं इस बेबसी के जिम्मेदार
आमोद कुमार उपाध्याय
ग्राम व पोस्ट- डेबरी, जिला-संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश

प्रकृति के आगे मानव हमेशा बेबस रहा है। हां, इतना जरूर है कि कुछ लोग समय रहते एहतियाती उपाय करके प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नकुसान को कम कर लेते हैं। बिहार में ऐसा नहीं हुआ। बिहार के राजनेताओं में वहां की तरक्की, खुशहाली व विकास की चिन्ता नहीं है। ऐसी आपदा की घड़ी में भी सत्ता पक्ष और विपक्ष एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। जबकि जनता की जान के लाले है। यही कारण है कि बिहार आज भी पिछड़ा होने के साथ ही साथ अराजकता की चपेट में है।

छोटे बांधों को मिले प्राथमिकता
राकेश हुडिया
चर्नी रोड, मुंबई

प्रकृति के साथ छेड-छाड़ का खमियाजा हमें ही भुगतना होगा। नदियों में बडे-बड़े बांध बनाए जाते हैं लेकिन उसके दूसरे पहलू पर किसी का ध्यान नहीं जाता है। यदि नदियों में छोटे-छोटे बांध बनाए जाए तो जल संकट भी काम होगा और इनके टूटने के बाद कोसी जैसा कहर भी नहीं झेलना पड़ेगा। गुजरात के सौराष्ट्र इलाके में ऐसे बांध (चेक डैम) बनने के बाद उस क्षेत्र में जलस्तर भी बढ ग़या है और गांव के लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। इस तरह की योजनाओं को लागू करके प्रकृति के प्रकोप से बचा जा सकता है।

जिम्मेदारी सरकारों की है
राजेश कपूर
21181, इंद्रा नगर, लखनऊ

अचानक बाढ़ आ जाना त्रासदी है लेकिन कोसी नदी में बाढ़ आना लगभग प्रतिवर्ष होने वाली एक नियमित घटना हो गई है। कारण प्रकृति का प्रकोप हो या नेपाल द्वारा खोला गया पानी, बर्बादी की जिम्मेदारी केंद्र या प्रदेश सरकारों की है। जब बाढ़ आती है, दोषारोपण व राजनीति होती है और हजारों-करोड़ रुपये राहत पर व्यय होता है। यदि इतना ही पैसा योजनाबध्द तरीके से बाढ़ बचाव हेतु बांध आदि बनाने में केवल एक बार ही खर्च किया गया होता तो आज 15 लाख से अधिक लोग इस तरह से बर्बाद नहीं होते।

बकौल विश्लेषक

जल प्रबंधन नाम की चिड़िया को जानता नहीं हमारा देश
डॉ. ओ. पी. शर्मा
पूर्व विभागाध्यक्ष, भूगोल, डीएवीपीजी कॉलेज, लखनऊ

कभी चीन का शोक कही जाने वाली ह्वांगहो नदी अब कुछ भी नहीं रही है। धान की खेती के लिए वरदान बन गयी है चीन की यह नदी। दरअसल हमारे देश में जल प्रबंधन पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया है। आज बिहार में जब बाढ़ है तो सभी सोच रहे हैं वरना कौन ध्यान देता है। कुछ तो नेपाल को दोषी बता कर अपना पल्ला झाड़ रहे हैं तो कुछ कह रहे हैं कि इस बार ज्यादा पानी बरस गया है।

ये कैसी सोच है कि आप पानी पर अंकुश लगाने की बात कर रहे हैं। चेक डैम बनाना, जलाशय बनाना, बांधों का निर्माण और सबसे पहले तो बाढ़ के दौरान कुशल प्रबंधन की बड़ी जरूरत है। यह सही है कि कोसी की जलधारा तेजी से बदलती रहती है और नेपाल से ज्यादा पानी छोड़ देने से दिक्कत बढ़ती है पर हमें अपनी तैयारी करनी होगी। एक बात और बड़े काम की है, वह है इसी पानी के सही इस्तेमाल की।

अगर हम इसमें कामयाब हो गए तो सब ठीक हो जाएगा। बिहार में बीते 20 सालों से बाढ़ से निपटने को कुछ काम नहीं हो रहा है। कोई बांध नहीं बना कोसी पर तो ऐसे कैसे काम चलेगा। आज यह नदी बिहार का शोक बन गयी है। सरकार तो बस इमदाद दे रही है। जान बचाने के लिए कुछ नहीं हो रहा है।

कोसी पर नेपाल से घुसते ही एक बड़ा बांध और कई जल परियोजनाएं बनानी होंगी तभी इस दिक्कत का हल निकलेगा। वरना राहत के ही नाम पर बंदरबांट होती रहेगी और कुछ भी नहीं होने वाला है। सरकार को अब चेत जाना होगा।
बातचीत: सिध्दार्थ कलहंस

कोसी नहीं, सरकार को कोस रहे बिहार के लोग
प्रभुनाथ राय
राष्ट्रीय अध्यक्ष, अखिल भारतीय भोजपुरी समाज

कोसी बिहार का जीवन है। कैसे भूलेंगे इसे लोग। गुणवंती, भागवंती और कोसी माई का कहना सुन के ही तो बिहार के लोग जवान हुए हैं। कोई भी कोसी को नहीं कोस रहा है। भले ही जान जाए पर कोसी की पूजा हो रही है। बिहार की औरतें तो कोसी को पूज कर ही इस दैवी आपदा से बचने का रास्ता खोज रही हैं। बस परेशानी इस बात की है कि सरकार नहीं चेती।

बाढ़ से लोग मरते रहे और सरकार ने उनको निकालने के लिए कुछ भी न किया। वह तो सेना का शुक्र है कि कुछ राहत में तेजी आ गई है। कोसी मइया इस बार नाराज थीं बिहार के लोगों से इसलिए नुकसान ज्यादा हुआ है। वरना कोसी ने अपने चाहने वालों का का कुछ नहीं बिगाड़ा है। अगर समय पर सरकार ने लोगों को निकाल लिया होता तो तमाम जानें बच जातीं।

सरकार देर में चेती और तब तक लोग मुसीबत की गिरफ्त में आते रहे। कोसी जहां-जहां नेपाल से भारत में आती है, वहीं-वहीं पर बांध की जरूरत है। बाकी बिहार में इसे अपनी गति से ही बहने देना चाहिए। बिहार का जीवन है, कोसी, इसे न छेड़े सरकार। बस लोगों को राहत दे आपदा के समय। जैसे इस बार जब बड़ी जरूरत थी।

भोजपुरी समाज ने भेजा है काफी सामान और कोशिश में है और भी कुछ भेजे। एक दिन पहले ही एक ट्रक रवाना किया है मधेपुरा के लिए और जल्दी ही कई और जिलों के लिए सामान भेजेंगे। पर सरकार को अपने काम में तेजी लाने की जरूरत है, जो उसे करना ही पड़ेगा।
बातचीत: सिध्दार्थ कलहंस

…और यह है अगला मुद्दा

सप्ताह के ज्वलंत विषय, जो कारोबारी और कारोबार पर गहरा असर डालते हैं। ऐसे ही विषयों पर हर सोमवार को हम प्रकाशित करते हैं व्यापार गोष्ठी नाम का विशेष पृष्ठ। इसमें आपके विचारों को आपके चित्र के साथ प्रकाशित किया जाता है। साथ ही, होती है दो विशेषज्ञों की राय।

इस बार का विषय है परमाणु करार: देश के साथ छल या ऐतिहासिक उपलब्धि? अपनी राय और अपना पासपोर्ट साइज चित्र हमें इस पते पर भेजें:बिजनेस स्टैंडर्ड (हिंदी), नेहरू हाउस, 4 बहादुरशाह जफर मार्ग, नई दिल्ली-110002 या फैक्स नंबर- 011-23720201 या फिर ई-मेल करें
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आशा है, हमारी इस कोशिश को देशभर के हमारे पाठकों का अतुल्य स्नेह मिलेगा।

First Published : September 7, 2008 | 11:40 PM IST