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कानून के अभाव में बेबस हैं खरीदार

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 1:04 PM IST

हमारे देश में कानूनों की भरमार है। कुछ कानून तो ऐसे हैं जो किसी सामाजिक या राजनीतिक समस्या के तात्कालिक समाधान के लिए आनन फानन में बना दिए जाते हैं।


उदाहरण के लिए धूम्रपान, कूड़ा-करकट, भिक्षावृत्ति, जुआ और यहां तक कि गायों को खुला छोड़ देने की समस्या के लिए भी कानून हैं। हालांकि इनका शायद ही अमल होता है और इन्हें आसानी से भुला दिया जाता है। इसके अलावा आर्थिक मसलों से जुड़े मुद्दे भी हैं, जहां विभिन्न दबाव समूहों के चलते कानून को अधिसूचित  नहीं किया गया।

इन्हीं में से एक है-हायर पर्चेज यानी किश्तों में खरीद से जुड़ा अधिनियम। अगर ठीक ढंग से इसका मसौदा तैयार किया जाता और ठीक तरह से इसे लागू किया जाता तो वित्तीय सेवा प्रदाताओं द्वारा की जाने वाली जोर जबरदस्ती और वाहनों तथा सामान उठा ले जाने की कोशिशों पर लगाम लगाई जा सकती थी। पिछले सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय में टाटा फाइनैंस से जुड़ा एक और मामला सामने आया, जिसमें न्यायालय ने कंपनी की अपील खारिज कर दी।

उच्च न्यायालयों से मिलने वाली रिपोर्ट के मुताबिक इस तरह के तमाम मामले वहां लंबित हैं। इस समय संविदा अधिनियम-1972 या सेल आफ गुड्स एक्ट 1930 ही ऐसे कानून हैं, जिनके आधार पर न्यायालय फैसले दे सकता है। ये कानून उस समय के हैं जब हायर पर्चेज की प्रक्रिया बहुत ज्यादा नहीं होती थी। यह नियम इंगलैंड के पियानो बनाने वाले एक व्यक्ति द्वारा 1846 में लाया गया था। बाद में इस कानून को सिंगर सिलाई मशीन कंपनी ने एक वकील के माध्यम से प्रमोट किया। वित्तीय कंपनियों ने ऑटोमोबाइल के दौर में इस त्रिकोणीय डील को लोकप्रिय बनाया। इस तरह से हायर पर्चेज अधिनियम भ्रामक लगता है।

संसद ने 1972 में कानून पारित किया और एक साल बाद अधिसूचना जारी की गई। इसे 1973 में निष्प्रभावी कर दिया गया लेकिन 2005 में इसे निरस्त कर दिया गया और हम एक बार फिर संविदा अधिनियम के युग में वापस आ गए। बहरहाल उच्च न्यायालयों के निर्णय में उसी हायर पर्चेज कानून का हवाला दिया जाता है जो अस्तित्व में ही नहीं है। अधिनियम की धारा 20 में विक्रेता के कब्जा करने के अधिकारों को प्रतिबंधित किया गया है, अगर हायर पर्चेज के तहत एक निश्चित हिस्से का भुगतान कर दिया गया है।

विक्रेता अपने माल पर कब्जा पाने के लिए न्यायालय में आवेदन कर सकता है। जब से इस नियम को निरस्त कर दिया गया है, न्यायालय दोनों पक्षों के बीच हुए समझौतों की शर्तों को देखता है। यह हमेशा एकतरफा होता है। यह एक बेहतरीन और भारी-भरकम मसौदा होता है, जो इस काम में माहिर वकीलों द्वारा तैयार किया जाता है, जो न केवल सामान्य खरीदारों की समझ से परे होता है बल्कि न्यायाधीशों के लिए भी मुश्किल होता है। सामान्यत: खरीदार को इसकी प्रति तभी दी जाती है, जब वह इस समझौते पर हस्ताक्षर कर देता है या अंगूठा लगा देता है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2001 में चरणजीत सिंह बनाम सुधीर मेहरा मामले में दिए गए फैसले में संविदा की शर्तों में एक शर्त यह भी थी कि खरीदार द्वारा वित्तीय कंपनी के खिलाफ कोई भी दीवानी या फौजदारी का मुकदमा नहीं किया जा सकता। निश्चित रूप से यह अधिनियम इस तरह की कमियों को दूर करने के लिए पारित किया गया था।  इस कमी की चर्चा करते हुए उद्देश्यों और कारणों में कहा गया, ‘यह कभी कभी बुराई के रूप में सामने आता है, खासकर खरीदारों के मामले में जो खरीद फरोख्त के दौरान कमजोर पार्टी होती है। इस तरह की बुराइयों को दूर करने के लिए विधि आयोग ने अपनी 20वीं रिपोर्ट में विस्तृत सिफारिश की है।

यह विधेयक कुछ संशोधनों के बाद उस सिफारिश को लागू करता है।’ बहरहाल , कई साल के किन्तु परन्तु के बाद सरकार ने इसे विधि मामलों की संसदीय समिति को भेज दिया, उसके बाद इसे विधि आयोग के पास भेजा गया। अपनी 168वीं रिपोर्ट  में आयोग ने इसमें व्यापक संशोधन किए। बहरहाल 2005 में सरकार ने महसूस किया कि यह अधिनियम अपनी प्रासंगिकता खो चुका है। इस अधिनियम को समाप्त करने के लिए तर्क देते हुए कहा गया, ‘आयोग की रिपोर्ट के परीक्षण के बाद यह स्पष्ट हुआ है कि अधिनियम में जो गणितीय फार्मूला दिया गया है, जैसा कि आयोग ने हायर पर्चेज के मामलों के लिए सिफारिश की है, बहुत ज्यादा गणितीय है और सामान्य आदमी की समझ से परे है।

इसलिए किरायेदारी और खरीद के  शुल्क और ब्याज की दरें बाजार की हालत और उस समय की आर्थिक परिदृश्य पर ही छोड़ देना ज्यादा उचित होगा। ‘ लेकिन न्यायालयों की फटकार की बढ़ती संख्या को देखते हुए कुछ उम्मीद जगी है। राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के खिलाफ टाटा फाइनैंस की अपील के अलावा उच्च न्यायालय के हाल के फैसलों में भी खरीदारों और वित्तीय सेवा प्रदाताओं के बीच तनाव के उदाहण मिलते हैं। घनश्याम शर्मा बनाम असम राज्य मामले में गौहाटी उच्च न्यायालय ने हाल ही में खेद व्यक्त करते हुए कहा, ‘इस समय किरायेदारी और खरीद के सौदों में कोई विशेष कानून नहीं है, जिसके आधार पर संविदा से  संबंधित पार्टियों के अधिकारों और दायित्वों की रक्षा की जा सके।

कानून इन मामलों को दोनो पक्षों के बीच हुए निजी समझौते पर छोड़ देता है।’ उच्च न्यायालय के मुताबिक, वित्तीय सेवा प्रदान करने वाले के पास संपत्ति पर कब्जा करने का अधिकार है, लेकिन वह इस प्रक्रिया में कोई जोर जबरदस्ती नहीं कर सकता है जिससे खरीदार प्रताड़ित हो। अन्य उच्च न्यायालयों और उपभोक्ता आयोग के निर्णयों में भी इसे स्वीकार किया गया है। इस तरह से खरीदार की संपत्ति पर फिर से कब्जा करने की प्रक्रिया में खरीदार को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए, उसका वाहन या सामान वापस लिया जा सकता है। यह बहुत ही अस्पष्ट न्याय है। इस हालत के लिए निश्चित रूप से कानून बनाने वालों को अपना दोष स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने चार दशकों से इस मामले की गंभीरता पर ध्यान नहीं दिया।

First Published : July 25, 2008 | 12:02 AM IST