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क्या पेइचिंग ओलंपिक की तरह भारत की भी छवि बदल सकते हैं 2010 के राष्ट्रमंडल खेल?

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:45 PM IST

खेल के बहाने राजनीति
पुष्पेश पंत
प्रोफेसर, जेएनयू


पुरानी कहावत है ‘देख पराई चुपरी, मत ललचावे जी’। ओलंपिक खेलों के आयोजन में चीन की अद्भुत सफलता को देखकर कु छ हिंदुस्तानियों को यह लगने लगा है कि वह अपने देश की छवि को भी 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों के जरिए चमकती दुनिया के सामने पेश करने में सफल होंगे।

हमें एक और मुहावरा बरबस याद आ रहा है, ‘कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली’। जाहिर है कि सुरेश कलमाडी जैसे लोगों को यह सब बातें देशद्रोह लगेंगी इसलिए दो-चार बातों को शुरू में ही साफ करने की तत्काल जरूरत है। चीन की छवि सिर्फ ओलंपिक खेलों के दौरान नहीं सुधरी, सजाई-संवारी गई। यातायात और नागरिक सुविधाओं में चमत्कारी कायाकल्प चीन ने कम समय में कर दिखाया।

काम करने का अनुशासन हो या फिर उपलब्ध संसाधनों का बेहतरीन उपयोग, हर तरह से चीन ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई। इसकी तुलना में भारत का प्रदर्शन निहायत नाकाबिले तारीफ रहा। हमारे खेल प्रशासकों और खेल प्रबंधन को अपनी जागीर समझने वाले राजनेताओं की साजिश यह है कि पहले काम में ढील बरती जाए।

उसके बाद युद्धस्तर पर समय सीमा के भीतर निपटाने के लिए आवंटित धनराशि के खर्च के लेखे जोखे की पड़ताल से छुटकारा पाया जा सके। ऐसा पहले भी देखने को मिला है और इस बार भी यहीं होता नजर आ रहा है। खेलों के बहाने राजधानी को खूबसूरत बनाने के लिए पहले तो यमुना के किनारे बसे लोगों को बेघर शरणार्थी बनाया गया है और फिर नए खेलगांव के नाम पर यमुना के साथ अत्याचारी छेड़छाड़ शुरू हुई।

खेलों के बहाने शहर में सक्रिय भूमि विकास करने वाले उद्यमियों और सरकार के चहेते ठेकेदारों की बन आई है। इस बात की अनदेखी करना कठिन है कि पिछली बार एशियाई खेलों के लिए जिस एशियाई खेलगांव का निर्माण हुआ था या जिन सुविधाओं के लिए बेशुमार पैसा खर्च किया गया था, उसका आखिरकार क्या हश्र हुआ।

सरकार की ये दलील है कि यमुना तट का सर्वनाश तो अक्षरधाम मंदिर के निर्माण के साथ ही आरंभ हो गया था। हमारी पूरी सहानुभूति दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला जी के साथ है। दिल्ली को मुस्कान भरी नगरी बनाने के लिए नागरिकों के साथ जिस तरह की भागीदारी उन्होंने शुरू की थी, वह उन्हीं के पार्टी के मौकापरस्त सहयोगियों ने हाशिये पर पहुंचा दी है।

भारतीय ओलंपिक संगठन या राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन की समिति या मंत्रियों का समूह हो जिसके सदस्य बिना मंत्री हुए कलमाडी साहब है, यह सभी लोग दिल्ली सरकार को बहुत पहले ही किनारे कर चुके है। शीला जी विवश है- चुनाव उनकी पार्टी को उनके नेतृत्व में लड़ने हैं, पर खेलों के आयोजन के बारे में उनकी भूमिका सहयोगी और सहायक ही हो सकती है, निर्णायक नहीं। 

खेलों के बहाने आज बड़े पैमाने पर मेट्रो रेललाइन का विस्तार किया जा रहा है। जगह-जगह फ्लाई ओवर बनाने के लिए मोहनजोदड़ो की याद दिलाने वाली खुदाई की जा रही है। मगर इस सबसे आश्वस्त हो पाना कठिन है कि बिना किसी दिक्कत के आयोजन पूरा होगा।

चीन ने फुटबाल को किक मारकर गोल किया। हम टेबिल टेनिस की गेंद को ही ठोकर मारकर आकाश को मंसूबे पाल रहे हैं। इस आशा से भी हुलसने की जरुरत नहीं है कि हमें कितने सारे स्वर्ण, रजत पदक यहां मिलेंगे। अगर राष्ट्रमंडल नहीं तो, सार्क खेलों का आयोजन होता तो सफलता और भी प्रभावशाली होती ।

बदलेगी भारत की तस्वीर
ललित भनोत
महासचिव, राष्ट्रमंडल खेल

पेइचिंग ओलंपिक के बाद अब दुनिया की निगाहें साल 2010 में भारत में आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की ओर हैं। मैं इस बात से सहमत हूं कि इसके जरिए निश्चित तौर पर भारत की छवि में सुधार आएगा।

उम्मीद है कि राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन में लगभग 8000 खिलाड़ी और अधिकारी जुटेंगे। इसके अलावा कई पर्यटक भी हमारे देश में आएंगे। हमारी कोशिश यह है कि हम अब तक के राष्ट्रमंडल खेलों के मुकाबले सबसे बेहतर आयोजन करें।

राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के जरिए लोगों को यह अहसास होगा कि भारत दुनिया में अपनी बेहतर अर्थव्यवस्था के विकास के अलावा बेहतर आयोजन के लिए भी अपना उल्लेखनीय स्थान बना सकता है। जिस तरह से एफ्रो-एशियन गेम्स के दौरान हैदराबाद की बेहतर छवि उभर कर आई थी, उससे भी ज्यादा उल्लेखनीय छवि 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान दिल्ली या यूं कहें की भारत की छवि उभर कर आएगी।

इस खेल के मद्देनजर हम फ्लाईओवर, मेट्रो के निर्माण के  अलावा दिल्ली शहर को एक नए सिरे से बेहद खूबसूरत बनाने के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं। जहां ओलंपिक की बात है उसमें 200 के करीब देश शामिल थे, उसके मुकाबले राष्ट्रमंडल खेल तो काफी छोटा आयोजन माना जा सकता है क्योंकि इसमें 71 राष्ट्रमंडल देशों के खिलाड़ी हिस्सा लेंगे।

हमारे यहां दिल्ली में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए काम जोर शोर से चल रहा है और हमने हर काम के लिए डेडलाइन निर्धारित की है। राज्य सरकार के अलावा राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति भी पूरी निगरानी कर रही है। हमारे विशेषज्ञों और सलाहकार भी दिल्ली में इन्फ्रास्ट्रक्चर के काम की साप्ताहिक रिपोर्ट दे रहे हैं।

हमलोग कॉमनवेल्थ विलेज बना रहे हैं जो पेइचिंग के ओलंपिक विलेज और मेलबोर्न के कॉमनवेल्थ विलेज से भी कम नहीं होगी। इस कॉमनवेल्थ विलेज में खिलाड़ियों के बेहतर स्टेडियम, ट्रैक, स्वीमिंग पूल और इंटरनेशनल जोन बनाए जाएंगे। विकास का जिम्मा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत डीडीए संभाल रही है। डीडीए अपनी शर्र्तों के तहत काम करा रही है।

जहां तक यमुना के किनारे के बांशिदों के साथ छेड़छाड़ का मामला है यह मामला अभी अदालत में है तो मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकता। पहले एशियाई या एफ्रोएशियाई गेम्स के दौरान जो भी विलेज बनाए गए वे हर गेम्स के लिए नहीं इस्तेमाल किए जा सकते क्योंकि उनका स्तर उस समय के हिसाब से बेहतर था लेकिन आज हमें उस दौर से बेहतर सुविधाएं मुहैया कराने की जरूरत होती है।

जहां तक खिलाड़ियों की तैयारी की बात है इसके लिए ओलंपिक फेडरेशन और दूसरे खेल के फेडरेशन को भी सरकार की मदद से पूरी तैयारी का निर्देश दिया गया है। हमारी कोशिश केवल बेहतर आयोजन करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि हम खेलों में भी अपना बेहतर प्रदर्शन कर मेडल जीतना चाहते हैं।

हमें पूरा यकीन है कि मेलबोर्न गेम्स के मुकाबले इस बार हमारा प्रदर्शन बेहतर होगा और पदक तालिका में भी हम एक से तीसरे स्थान के अंदर ही शामिल होंगे। सरकार ने खिलाड़ियों के बेहतर प्रशिक्षण के लिए 700 करोड़ रुपये दिए हैं। हम खिलाड़ियों को बेहतर कोच, मेडिकल एक्सपर्ट मुहैया करा रहे हैं और साथ ही खिलाड़ियों को प्रशिक्षण के लिए विदेश भी भेजा जा रहा है।

First Published : September 3, 2008 | 11:25 PM IST