प्रतिभा के साथ पैसा अहम
अशोक ध्यानचंद
पूर्व हॉकी खिलाड़ी
हम ओलंपिक में और मेडल जीत सकते हैं, यदि खेलों को निजी क्षेत्र से ज्यादा प्रायोजक मिलें। वैसे इसके लिए बुनियादी चीज तो हमेशा से प्रतिभा ही रही है और आगे भी प्रतिभा ही रहेगी।
अगर किसी खिलाड़ी के पास प्रतिभा है तो फिर उसकी सफलता में कोई बात आड़े नहीं आ सकती। हां, लेकिन इसके बावजूद भी पैसा खासी अहम भूमिका अदा करता है। और पैसा मुख्य रूप से प्रायोजक के जरिये ही आता है। हमारे देश में क्रिकेट ने लगभग दूसरे सभी खेलों को प्रभावित किया है और हमारा राष्ट्रीय खेल हॉकी भी क्रिकेट की मार से बच नहीं पाया है।
क्रिकेट में प्रायोजकों की भरमार है, कॉर्पोरेट जगत इस खेल में जमकर पैसा लगा रहा है। कुल मिलाकर चारों तरफ इस खेल का ही डंका बजा हुआ है। ऐसे में जब इस खेल में पैसा और शोहरत दोनों है, तब नई पीढ़ी का इस खेल के प्रति झुकाव लाजिमी ही है। आज की तारीख में बहुत सारे मां-बाप ऐसे मिल जाएंगे जो अपने बच्चों को क्रिकेटर बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं। दस साल पहले स्थिति ऐसी नहीं थी।
ऐसा केवल प्रायोजकों के जरिये आने वाले पैसे के कारण हो पाया है। क्रिकेट में अगर कोई रणजी स्तर तक भी पहुंच जाता है तो दूसरे खेलों के राष्ट्रीय स्तर के कई खिलाड़ियों से फायदे की स्थिति में रहता है। इसलिए न तो युवाओं को और न ही उनके अभिभावकों को क्रिकेट को एक करियर के रूप में चुनने में कोई दिक्कत पेश आ रही है।
वहीं दूसरे खेल प्रायोजकों के लिए तरस रहे हैं। सुविधाओं के अभाव में कई प्रतिभाएं दम तोड़ देती हैं। यदि प्रतिभाओं को निखारा नहीं जाएगा तो देश में मेडल कैसे आएंगे? अभिनव बिंद्रा जैसे लोग तो बिरले ही पैदा होते हैं। और अगर उनकी भी बात की जाए तो वे जिस खेल से ताल्लुक रखते हैं, उसमें काफी खर्चा आता है।
यह तो शुक्र है कि अभिनव के पास संसाधनों की कमी नहीं थी और उन्हें अपने खेल को जारी रखने में दिक्कत नहीं आई। लेकिन हर किसी की किस्मत तो अभिनव बिंद्रा जैसी नहीं होती। मेरा ऐसा कहने का यह अर्थ यह कतई नहीं है कि केवल संसाधनों के जरिये ही उनको सफलता मिली है।
उनकी क्षमताओं के बारे में किसी को भी संदेह नहीं होगा और केवल ओलंपिक ही नहीं बल्कि इससे पहले कई बार वह अपने आप को साबित कर चुके हैं। कई खेल ऐसे हैं जिसमें देसी खिलाड़ी बहुत अच्छा कर सकते हैं, जरूरत है तो बस उनको हौसला देने की। जब प्रायोजक आएंगे तो जाहिर है इससे खिलाड़ियों का हौसला भी बढ़ेगा, उनके लिए सपोर्ट भी बढ़ेगा।
पैसा आने से उनकी तैयारियां भी बढ़िया होंगी, वे विदेशों में भी जरूरी चीजें सीखने के लिए जा सकेंगे। जब तैयारी बहुत ही बढ़िया होगी तो जाहिर है परिणाम भी मन मुताबिक ही आएंगे। अभिनव बिंद्रा का उदाहरण हमारे सामने है। दूसरे खेलों में प्रायोजक आने से उनका पूरा ढांचा सुधारने में मदद मिलेगी।
पैसा और प्रसिद्धि मिलने से नई पीढ़ी भी इन खेलों की ओर आकर्षित होगी। अच्छा नाम और दाम मिलने से उनके मां-बाप को भी इसमें कोई समस्या नजर नहीं आएगी। कुछ खेलों की प्रकृति और स्वरूप अलग-अलग होता है।
मसलन फुटबाल जैसे खेल में आपके दम-खम की परीक्षा होती है तो निशानेबाजी जैसे खेल में आपके स्नायु तंत्र का इम्तिहान लिया जाता है। मैं फिर से वही बात दोहराउंगा कि इन सबके लिए प्रतिभा की दरकार है लेकिन अगर प्रायोजकों का साथ मिले तो मेडल पर निशाना लगाने में कुछ आसानी जरूर होगी और कई बिंद्रा सामने आएंगे।
बातचीत: प्रणव सिरोही
बेहतर प्रबंधन की जरूरत
निरंजन शाह
सेक्रेटरी, बीसीसीआई
मुझे ऐसा लगता है कि किसी खेल और खिलाड़ियों के लिए जितना पैसा महत्वपूर्ण है उतनी ही जरूरत इन पैसों के बेहतर प्रबंधन की भी है। उद्योग जगत खिलाड़ियों को सहयोग देने के लिए प्रायोजक की भूमिका निभाने के लिए तैयार होंगे तो यह बहुत अच्छा होगा।
हालांकि सिर्फ पैसों के जरिए ही खिलाड़ियों के प्रदर्शन में सुधार नहीं हो सकता। इसके लिए जरूरत इस बात की है कि अलग-अलग खेलों के फेडरेशन पैसों के सही प्रबंधन के साथ ही बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए प्रयासरत रहें।
क्रिकेट को छोड़कर दूसरे खेलों के फेडरेशन को राज्य सरकार की सहायता मिलती है, अब उन्हें अपने खेल का विकास करने की चुनौती है। सरकार कुछ हद तक ही सहायता कर सकती है। खिलाड़ी अगर ज्यादा खेलेंगे तो उसमें से ही बेहतर प्रतिभा निकल कर बाहर आएगी।
यह तो सच है कि खेलों के बेहतर विकास के लिए पैसा तो चाहिए तभी किसी खेल के लिए खिलाड़ियों के मन में हौसला पैदा होगा। आर्थिक दिक्कतों से जूझते हुए खिलाड़ी कभी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर सकते चाहे उनमें किसी खेल के जन्मजात प्रतिभा ही क्यों न हों।
प्रतिभावान खिलाड़ी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली प्रतियोगिताओं में अच्छे प्रदर्शन के लिए बेहतर ट्रेनिंग और कोच की जरूरत तो होती ही है। कई बार इन सब सुविधाओं के लिए पैसे हो भी तो भी बेहतर प्रबंधन के अभाव में सारी कोशिशों पर पानी फिर जाता है। हमारे देश में फुटबॉल और हॉकी जैसे खेलों का विकास होना चाहिए और हर चरण में प्रतिस्पर्धा का आयोजन होना चाहिए।
मसलन क्रिकेट में अंडर 15, अंडर 19 और रणजी ट्राफी जैसे आयोजन कराया जाता है। किसी खेल को लोकप्रिय बनाने की कोशिश होनी चाहिए और नए-नए खिलाड़ी आने चाहिए। अब अगर आप बीसीसीआई की बात करें तो हमने कॉरपोरेट जगत के पैसे का सही प्रबंधन करके खिलाड़ियों को बेहतर बुनियादी सुविधाएं दी हैं। खिलाड़ियों के विकास के लिए बेहतर ट्रेनिंग और कोच का इंतजाम भी हमने किया है।
ये अलग बात है कि हर बार खेल में आपकी जीत नहीं हो सकती क्योंकि खेल में कभी हार होती है, कभी जीत। हमने जिस तरह क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने की सफल कोशिश की उसी तरह दूसरे खेलों को भी लोकप्रिय बनाने की कोशिश होनी चाहिए। यह कोशिश केवल उद्योग जगत से मिलने वाले पैसे के बलबूते ही सफल नहीं हो सकता बल्कि इसके लिए सही प्रबंधन और ईमानदार जज्बे की जरूरत है।
आज के युवा खिलाड़ियों का रुझान केवल क्रिकेट के लिए ही क्यों है। इसका जवाब तो दूसरे खेलों के फेडरेशन को टटोलना ही पड़ेगा। क्रिकेट के लिए खिलाड़ियों और लोगों की दीवानगी की वजह यही है कि यहां लोगों का बेहतर भविष्य दिखता है। इसकी वजह केवल मजबूत प्रबंधन और व्यवस्था ही है।
अगर किसी खेल व्यवस्था में अपने स्वार्थ की बात आएगी तो अच्छा पैसा होने के बावजूद वह संस्था काम नहीं कर सकती और न ही सफल हो सकती है। जहां तक ओलंपिक खेलों में मेडल जीतने की बात है उसके लिए अच्छी तैयारी की सख्त जरूरत होती ही है। उसके लिए खिलाड़ियों के लिए अभ्यास, ग्राउंड और हर तरह की आधुनिक सुविधाएं मिलनी चाहिए। यह सारी सुविधाएं गांव और छोटे शहरों तक पहुंचाए जाएं ताकि बेहतर ट्रेनिंग मिले तो प्रतिभाएं भी उभर कर आएंगी।
बातचीत: शिखा शालिनी