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मंदी से निपटने के लिए नीतियों में हो बदलाव

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 11:00 AM IST

महंगाई दर बढ़ रही है और इसके साथ ही औद्योगिक उत्पादन कम हो रहा है। वित्तीय घाटे की खाई चौड़ी हो रही है क्योंकि चालू खाते का घाटा बढ़ रहा है।


ब्याज दरें बढ़ रही हैं जबकि शेयरों की कीमतें गिर रही हैं। आर्थिक शब्दावली में कहा जाए तो वृहद अर्थव्यवस्था में हम मर्फी के नियम की स्थिति में हैं, जहां कुछ भी बुरा हो सकता है, पहले से ऐसा है या भविष्य में हो सकता है। ऐसी हालत में या तो हम गिरावट की ओर हैं या भारत की अर्थव्यवस्था उभर रही है, इन स्थितियों में यही सवाल उठता है कि ऐसी हालत पर किस तरह से काबू पाया जाए?

आइये चलते हैं उन सिध्दांतों की ओर, जो हमें ऐसी स्थिति के लिए कुछ उपाय सुझाते हैं। हाल के महीनों में हमने जिस तरह से अर्थव्यवस्था में झटकों के दौर देखे हैं उसके लिए कुछ नियम सुझाए गए हैं, जो अर्थव्यवस्था की हालत में सुधार की दिशा में लाभकारी हो सकते हैं।यहां पर मुख्य शब्द है- रिकवरी।

यह सही है कि हमारे सामने लातिन अमेरिका और जापान जैसे कुछ उदाहरण हैं, जहां लंबे समय तक मंदी का दौर चला, लेकिन ज्यादातर हिस्सों और परिस्थितियों में, जिनमें से हम एक हैं- जहां नीतियों की वजह से ऐसा हुआ और यह जरूरी नहीं है कि यह खतरा लंबे समय तक बना रहे। इसकी समय सीमा और प्रभाव कुछ संस्थात्मक गुणों पर निर्भर करता है।

आइये देखते हैं कुछ किताबी मॉडल्स को, जो इन मुद्दों को सरल बनाते हैं। विपरीत आपूर्ति, जिसकी वजह से तेल और जिंसों की कीमतों में उछाल आया, इस झटके की वजह से विकास की गति मंद पड़ी और और महंगाई दर तेजी से बढ़ी। आइये हम इस बात की कल्पना करें कि इसका नीतियों से कोई लेना-देना नहीं है। क्या अर्थव्यवस्था पुराने स्तर को पा लेगी?  हां, दो कारणों से ऐसा हो सकता है। पहला- कर्मचारी जो बेरोजगार हैं और उत्पादक, जिनकी उत्पादन क्षमता बहुत ज्यादा है, वे अपने वेतन की मांग में कमी कर दें और कीमतें कम कर दी जाएं। इससे आपूर्ति में बढ़ोतरी होगी।

दूसरा- महंगाई के कारकों में बदलाव आए जिससे कर्मचारी और उत्पादक अपने वेतन और दामों में इस उम्मीद से कमी करें कि परिस्थितियां बदल रही हैं। अगर हम मंद होती विकास दर और बढ़ती महंगाई दर के परिप्रेक्ष्य में इस विश्लेषण को लागू करें तो इसका दो प्रभाव हो सकता है। व्यापक प्रभाव यह होगा कि अर्थव्यवस्था के झटकों को समायोजित करने में तेजी से रिकवरी होगी। इसका मतलब यह होगा कि उचित मौद्रिक प्रभाव के चलते आपूर्ति पर विपरीत असर होगा और बढ़ती महंगाई काबू में आएगी, वहीं विकास में कमी आएगी।

अगर अर्थव्यवस्था के झटकों को काबू में करने की नीति प्रभावी है, तो कीमतें कम होंगी और इससे महंगाई दर में कमी आएगी और इसे कम वेतन और कीमतों की मांग में बदला जा सकता है। इस बीच इस बात पर भी गौर करना है कि झटकों पर प्रभाव कम समय के लिए होगा, जबकि वित्तीय हालत अस्पष्ट है। राजस्व की ओर गौर करें तो धीमी विकास दर और उच्च महंगाई दर का हो सकता है कि कर संग्रह पर कम प्रभाव पड़े। जीडीपी की वृध्दि मामूली रहे जो कर पर आधारित है, हो सकता है कि कमोवेश स्थिर रहे।

दूसरी ओर धीमा विकास और उच्च बेरोजगारी सार्वजनिक खर्चों के प्रति अधिक संवेदनशील होती है। उदाहरण के लिए बेरोजगारी सुरक्षा योजना के विस्तार से घाटा बढ़ सकता है। बहरहाल यह अपने आप में अर्थव्यवस्था के झटकों पर असर डालने वाला कारक है। इस योजना को बंद करने से बेरोजगारी बढ़ेगी, खासकर कम आमदनी वाले परिवारों में यह ज्यादा असरकारी होगा। इस प्रक्रिया का वाह्य संबंध यह होगा कि इस हालत में जबकि वैश्विक कीमतें प्रभावी हैं, चालू खाते का घाटा बढ़ेगा जिसकी वजह से मुद्रा का अवमूल्यन होगा और अन्य चीजें यथावत बनी रहेंगी।

अवमूल्यन भी अपने आप में अर्थव्यवस्था के झटकों को कम करने वाला है क्योंकि इसकी वजह से आयात में कमी आएगी और निर्यात में बढ़ोतरी होगी। बहरहाल इस तरह की प्रक्रिया में घाटे में बढ़ोतरी होगी और मुद्रा का लगातार अवमूल्यन होगा। अगर पूंजी प्रवाह को संतुलित किया जाए तो यह स्थिति जटिल हो जाती है, लेकिन देखने में अच्छा नजर आ रही इस प्रक्रिया में खास बात यह है कि इससे विदेशी निवेशकों का आकर्षण बढ़ेगा, जिससे घाटे में कमी आएगी। इससे पहले से ही मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था और बढ़ती महंगाई पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

अर्थव्यवस्था में झटकों को कम करने वाले  दो नुस्खे मौजूद हैं जो वाह्य प्रभाव के लिए असरकारी होंगे। पहला है विदेशी मुद्रा भंडार, जो पहले से ही बहुत बड़ा है। दूसरा है विनिमय दर। यह चालू खाते के घाटे को समायोजित कर सकता है। वास्तव में आयातित जिंसों के बढ़ते दबाव को कम करके, जो स्टॉक पर प्रभाव डालता है, घरेलू खपत को कम किया जा सकता है। यह निश्चित रूप से समायोजन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

अंत में, हमें वित्तीय बाजार की भूमिका पर विचार करने की जरूरत है। यह भी अर्थव्यवस्था के झटकों को कम करने के एक उपाय के रूप में काम कर सकता है। इसके दो तरीके हैं। पहला, नीति नियंताओं द्वारा पूरी तरह से अलग और प्रभावी बाजार होने का संकेत दिया जाए, कीमतों के समायोजन की प्रक्रिया अपनाई जाए। उस हालात में नीति निर्माताओं के लिए कुछ भी नहीं बचता जब उपभोक्ता और निवेशकों को बाजार से भ्रमित करने वाले संकेत मिलें।

दूसरा, वे लोगों को इस बाद की संभावना और उपकरण मुहैया कराएं, जिससे वे विपरीत परिस्थितियों में हेजिंग कर सकें। इसके साथ ही उनके लिए अर्थव्यवस्था में संयोजन और रिकवरी की प्रक्रिया बनी रहे। भारतीय स्थिति में इस किताबी मॉडल को किस तरह से लाभदायक बनाया जा सकता है? पहला, वर्तमान में नजर आ रहे परिणामों को इस तरीके के आधार पर देखा जाए, जो अपने आप में आश्चर्यजनक हैं। दूसरा, भारतीय अर्थव्यवस्था की आने वाले महीनों में रिकवरी पर गौर किया जाए जो अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले झटकों के प्रभाव पर निर्भर करेंगे।

इसके बारे में त्वरित आकलन यह संकेत देता है कि कुछ मामलों में बेहतर होगा, जबकि कुछ मामलों में स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। मुख्य मुद्दा मूल्यों के नियंत्रण का है जैसे ईंधन की कीमतें- जो समायोजन की पूरी प्रक्रिया पर प्रभाव डालता है। इसका पहला प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता है उसके बाद यह वित्तीय और चालू खाते पर दबाव बढ़ाता है।

अंत में अर्थव्यवस्था की विभिन्न समस्याएं इस बात की ओर ध्यान आकर्षित करती हैं कि नीतिगत मामलों में बदलाव किया जाए। कमजोर हो रहे बाजार को बल प्रदान किया जाए। खासकर तेल या मुद्रा की परिवर्तनीय कीमतों को प्रभावी बनाया जाना चाहिए जो भारतीय अर्थव्यवस्था के नुकसान को कम करने का बेहतरीन तरीका है। मैक्रोइकनॉमिक शॉक में किसी तरह का समायोजन दुखदाई है। बहरहाल अन्य के मुकाबले कुछ कम दुखदाई होते हैं।

First Published : July 13, 2008 | 11:27 PM IST