भारत अप्रैल 2020 में पूर्वी लद्दाख के कम से कम सात स्थानों पर चीन की सेना के जमीन कब्जाने की बात स्वीकार करने से इनकार कर चुका है। सरकार इस बात पर जोर देती रही है कि चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सब कुछ ठीक-ठाक है। लेकिन लद्दाख के स्थानीय लोगों के एक भरोसेमंद वर्ग ने सार्वजनिक रूप से इस बात पर अफसोस जाहिर किया है कि चीनी सैनिक और सीमा पर तैनात बॉर्डर गार्ड उन्हें अपने पारंपरिक चरागाहों की ओर जाने से रोक रहे हैं। इससे भी बदतर बात यह है कि उन्हें भारत सरकार की ओर से मदद नहीं मिल रही है। सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) भी उनकी रक्षा के लिए कुछ नहीं कर रही है।
स्थानीय निकाय के एक निर्वाचित प्रतिनिधि ने सार्वजनिक रूप से भारत सरकार की इस बात का प्रतिवाद किया है कि चीन और भारत की सेना के कमांडरों के बीच दोनों सेनाओं को समान संख्या में संबंधित क्षेत्र से पीछे हटाने के बारे में बात हो गई है और सीमा के दोनों ओर ‘बफर जोन’ बनाया गया है। लद्दाख की स्वायत्तशासी हिल डेवलपमेंट काउंसिल (एलएएचजीसी) के दो बार निर्वाचित सदस्य कोंचोक स्टेनजिन ने दिल्ली के एक प्रतिष्ठित टेलीविजन चैनल पर लद्दाख के निहत्थे चरवाहों की दुर्दशा उजागर की। स्टेनजिन जिस क्षेत्र से चुने गए हैं, वह ‘हॉट स्प्रिंग्स’ और ‘चुशूल’ के बीच का इलाका है।
स्टेनजिन एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं। वह ऐसा पहले भी कह चुके हैं। स्टेनजिन ने 2019 में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि चीनी सैनिकों के आक्रामक व्यवहार के कारण लद्दाख के चरवाहों को अपने जानवर पारंपरिक चरागाहों तक लेकर जाने में डर लग रहा है। उन्होंने कहा था कि यह केवल चरवाहों की नहीं बल्कि भारत की समस्या है। सीमा से लगे चरागाहों की पुष्टि गांवों के रिकॉर्ड से होती है।
स्टेनजिन ने करीब तीन साल पहले प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा था। उन्हें अपने पत्र का जवाब कुछ सप्ताह पहले मिलने पर आश्चर्य हुआ। इस पत्र पर लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चौहान के हस्ताक्षर थे। पत्र में स्टेनजिन से लेह में मुलाकात करने के बारे में लिखा था। जब जनरल चौहान (उन्हें हाल ही में चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ बनाया गया) पिछले महीने लेह आए थे तो उन्होंने स्टेनजिन से बातचीत की थी। जनरल चौहान ने स्टेनजिन को स्पष्ट रूप से बताया कि चीनी सैनिक चाबजी गांव जैसे जिन इलाकों में लद्दाख के चरवाहों को जाने से रोक रहे हैं वे चीनी क्षेत्र हैं।
स्टेनजिन ने कहा कि जो इलाका बफर जोन क्षेत्र घोषित किया गया है, वहां लद्दाखी चरवाहे और उनके मवेशी हर साल गर्मी में जाते थे। इसी तरह ‘पैंगोंग त्सो’ के दक्षिण में, ‘ब्लैक टॉप’, ‘गुरुंग हिल’ और ‘हेलमेट टॉप’ के चरागाह वाले इलाकों में नहीं जाने दिया जा रहा है। ‘पैंगोंग त्सो’ के उत्तर में और कुगरांग घाटी, धन सिंह चौकी और मार्सामिक व हॉट स्प्रिंग के बड़े क्षेत्र में लद्दाख के चरवाहों को जाने से रोका जा रहा है।
लद्दाख के चरवाहा समुदाय ने कहा कि भारत और चीन ने जिस तरह से क्षेत्रों पर दावा किया है, उससे स्थानीय निवासियों की पहचान मिट गई है। पीएलए की 2020 में घुसपैठ से पहले स्थानीय लोग इन स्थानों को लद्दाखी भाषा में लिए जाने वाले नाम से पुकारते थे। लेकिन सीमा पर पीएलए और भारतीय सीमा के भारी जमावड़े के बाद इन स्थानों को सैनिक शब्दावली जैसे – ‘पीपी-1’, ‘पीपी-2’, ‘एडम बेस’, ‘धन सिंह पोस्ट’ और पैंगोंग झील के आसपास के क्षेत्रों को ‘फिंगर’ के नाम से जानते हैं। जगहों के पारंपरिक नामों की जगह सैनिक नामावली का उपयोग करने पर सिद्दीक वाहिद जैसे लद्दाख के विद्वानों ने कहा कि इससे स्थानीय लोगों की पहचान का संकट पैदा होगा और क्षेत्र पर लंबे समय से चला आ रहा दावा हल्का पड़ जाएगा।
भारत सरकार का सीमावर्ती क्षेत्रों और वहां के लोगों से जिस तरह का बरताव है वह चीन द्वारा सीमा क्षेत्र में किए जा रहे रणनीतिक बरताव से बिल्कुल अलग है। अरुणाचल से लगते तिब्बत के क्षेत्रों में अध्ययन कर रहा ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्ल्यू) ने खुलासा किया कि गांवों को विवादित सीमावर्ती क्षेत्र में शामिल करने के मामले को व्यक्तिगत रूप से चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग साल 2017 से देख रहे हैं। पत्रिका ‘पॉलिसी मैग्जीन’ के मई 2021 के अंक में तिब्बत के विज्ञानी रॉबर्ट बार्नेट ने अपने लेख में खुलासा किया कि इस नीति के तहत कार्य को किस तरह अंजाम दिया जा रहा है।
बार्नेट के लेख में विस्तार से तिब्बत के चार घुमंतु चरवाहों के मामले से लेकर दूरदराज के भूटान व चीन के विवाद वाले क्षेत्र बेयुल खेनपाजोंग का जिक्र किया गया है। साल 1995 तक अन्य याक चराने वालों की तरह ये चार चरवाहे अपने जानवरों को बेयुल में चराते थे और फिर सर्दियां शुरू होने पर तिब्बत स्थित अपने गांव में लौट आते थे। हालांकि साल 1995 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) ने आधिकारिक रूप से घोषणा कर दी कि बेयुल चीनी क्षेत्र है।
यह चीन का दायित्व है कि सर्दियों में भी अपने क्षेत्र बेयुल की रक्षा करे। लिहाजा अगले 20 साल तक बेयुल के चार चरवाहों को सर्दियों में इस इलाके में रहना पड़ा। उन्हें प्राचीन काल की तरह इस क्षेत्र में अपना जीवन व्यतीत करना पड़ा और उनका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क भी नहीं था।
गर्मियों के हर मौसम में सीसीपी के अधिकारीगण चीनी दावे की पुष्टि के लिए चरवाहों से कुछ काम कराते थे। बार्नेट ने चरवाहों से कराए जाने वाले इन कामों के बारे में लिखा, ‘बेयुल में जहां भूटान के चरवाहे अपने याक चराते हैं, उस इलाके में चरवाहों को अपने याक लेकर जाना होता है और ये चरवाहे भूटान के चरवाहों से कर की मांग करते हैं।
चोटियों पर चीन के राष्ट्रीय ध्वज लगाने होते हैं। इस क्षेत्र में जगह जगह पेंट से लिखना होता है कि यह ‘चीनी’ क्षेत्र है।’ इस तरह परेशान किए जाने पर भूटान के चरवाहे क्षेत्र से हट गए। इन चरवाहों को अपनी सरकार या सेना से कोई समर्थन नहीं मिला। ऐसे में भूटान के चरवाहों ने अपने पारंपरिक चरागाह में जाना ही छोड़ दिया।
तिब्बत की कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव वू यिंगजी अप्रैल 2020 में इस गांव तक पैदल आए थे। उन्होंने इन चरवाहों को चीन के नायक बताते हुए उनकी प्रशंसा की थी। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने जुलाई 2021 में तिब्बत का तीन दिन का दौरा किया। इस दौरे के दौरान उन्होंने मुख्यतौर पर तिब्बती कस्बे निंगत्री (चीनी में निंगची या लिंझी) पर ध्यान दिया। भारत के लिए रणनीतिक रूप से निंगत्री कस्बा महत्त्वपूर्ण है। चीन यह दावा कर रहा है कि निंगत्री का दक्षिण तक विस्तार अरुणाचल प्रदेश तक है।
बीते कुछ सालों में चीन ने ढाई लाख तिब्बतियों को सीमा से सटे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में बसा दिया है। बर्नेट ने कहा कि इसी तरह से चीन सीमा पर कई क्षेत्रों में विवाद पैदा कर रहा है। चीन ऐसे कामों को दूसरे देश की सीमा में अंजाम दे रहा है। इसे शीर्ष स्तर पर समर्थन मिल रहा है।
तिब्बत में सीसीपी के अधिकारी ‘स्थानीय तिब्बत के इतिहास के विवादित दूसरे देश की सीमा में चरागाहों, मठों के दावे और परिवार के परंपराओं के जरिए राज्य स्तर पर दावा कर रहे हैं। इन्हें चीन का समर्थन प्राप्त है।’ ऐसी कई पहलें चीन सीमा पार के क्षेत्र में कर रहा है और इन्हें चीन के शीर्ष नेतृत्व का वरदहस्त मिला हुआ है।
भारत की सेना यह प्रदर्शित कर चुकी है कि वह अपने शौर्य की बदौलत चीन का मुकाबला कर सकती है लेकिन अक्सर ऐसा कोई राजनीतिक नेतृत्व आड़े आ जाता है जिसमें साहस की कमी है। हमें यह हर हालत में सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी सीमाओं के प्रहरी चाहे वे सैनिक हों या नागरिक, उन्हें प्रतिकूल स्थिति में चीन का सामना नहीं करना पड़े।