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संप्रग सरकार पर मंडराते संकट के बादल

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 6:44 AM IST

सब कुछ साफ है, और हमारे सामने है। सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने कह दिया है कि 25 जून से पहले सरकार को यह निश्चय करना पड़ेगा कि वह क्या चाहती है।


भारत-अमेरिका परमाणु करार या चुनाव। यदि सरकार अन्तरराष्ट्रीय आणविक ऊर्जा एसेंसी (आईएईए) के पास करार लेकर जाती है और वामदलों को यह कहार नहीं दिखाती है तो वामपंथी दलों के सामने सरकार से समर्थन लेने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता है।

यदि सरकार आईएईए को करार दिखाने से पहले वामदलों को मसौदा दिखा देती है, तो इससे करार की गोपनीयता समाप्त हो जाती है। यदि वामदल सरकार में होते तो यह दिक्कत नहीं आती। लेकिन चूंकि उन्होंने गोपनीयता की शपथ नहीं ली है, इसलिए करार को उन्हें दिखाना, बीबीसी की वेबसाइट पर चढ़ाने के बराबर है।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की, वामपंथी दलों को छोड़कर लोकसभा में संख्या 226 है। पूर्ण बहुमत के लिए संप्रग को 272 की जरूरत है। मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी कठिनाई में संप्रग को सहारा दे सकती है। लेकिन उसके 35 सांसद हैं और तब भी बहुमत से 10 सांसद कम पड़ते हैं।

ऐसे में क्या किया जाए? सरकार जैसी ही वियना स्थित आईएईए के पास जाती है, वामपंथी दल फौरन औपचारिक रूप से अपना समर्थन वापस लेने के लिए तैयार हो जाएंगे और राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर यह बता देंगे। फिर चूंकि सरकार अल्पमत में आ जाएगी, राष्ट्रपति संप्रग से कहेंगी कि वे शक्ति प्रदर्शन करें। संसद फौरन बुलाई जाएगी और सरकार के प्रति विश्वास प्रस्ताव रखा जाएगा।

यदि इसमें वामपंथी सरकार के खिलाफ मत देते हैं तो सरकार को इस्तीफा देना पड़ेगा और नए सिरे से लोकसभा चुनाव होंगे। इस स्थिति से बचा जा सकता है तो केवल दो परिस्थितियों में। एक- वामपंथी दल राष्ट्रपति से यह तो कह दें कि हम संप्रग के समर्थन में नहीं हैं लेकिन विश्वास प्रस्ताव के समय वोट देने की बजाय वॉक आउट कर दें। इससे लोक सभा के सदस्यों की कुल संख्या कम हो जाएगी और सरकार प्रस्ताव जीत जाएगी।

लेकिन वामपंथी दलों की बहुत भद्द पिटेगी। लोग पूछेंगे- यदि आप सरकार को अमेरिका के भाड़े का टट्टू मानते हैं तो उसे गिराने में हिचकिचाहट क्यों? लेकिन हिचकिचाहट है और होनी चाहिए। किसी भी हालत में वामपंथी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का समर्थन नहीं कर सकते, चाहे विश्वास मत की बात हो या सरकार बनाने की। इस स्थिति में भाजपा की किसी भी प्रकार की मदद प्रकारांतर में क्यों न हो- वाम दलों को गवारा नहीं होगा। अत: सरकार अल्पमत में रहकर चल सकती है।

लेकिन वामदलों की साख को कितना धक्का लगेगा, इसका आकलन इन्हें ठंडे दिमाग से करना होगा। एक और कारण है वाम दलों के पसोपेश में पड़ने का। इस समय लोकसभा में उनके 60 सदस्य हैं। लेकिन आने वाले चुनाव में उन्हें 35 सीटों से ज्यादा जीतने की अपेक्षा नहीं है। न खुदा ही मिला, न विसाले सनम वाली स्थिति में कुल मिलाकर अगर उनकी हठधर्मिता भाजपा की सरकार को खुला न्योता बन जाती है तो यह कहां की बुध्दिमत्ता है?

उधर कांग्रेस के पास भी विकल्प कम हैं। करे तो क्या करे? अंटी खाली है- लोकसभा की 145 सीटें हैं। साम दाम दंड भेद से संप्रग को साबुत रखा हुआ है। लेकिन वाम दल तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) सरकार को समर्थन दे रहे हैं। यदि द्रमुक के सामने वाम और कांग्रेस के बीच चुनने की बात आई तो वे अवाक रह जाएंगे- उन्हें दोनों की जरूरत है, नहीं तो तमिलनाडु में सरकार गिर जाएगी (एक अंश पट्टाली मक्कल काची को द्रमुक पहले ही विदा कर चुकी है)।

उधर बिहार में लालू प्रसाद एक के बाद एक चुनावी पराजय से हिल गए हैं। हालांकि बिहार में वाम दल कोई बड़ी शक्ति नहीं है लेकिन जिस संकट में लालू जी अपने आप को पा रहे हैं वहां छोटे से छोटा दोस्त भी अभिन्न मित्र है, उस गिलहरी की तरह जिसने लंका जाते समय सेतु बनाने में राम की मदद की थी। लालू जी को दिख रहा है कि यदि बिहार हाथ से निकल गया तो (आज की तारीख में राष्ट्रीय जनता दल के लोकसभा में 23 सदस्य हैं।

यह घट ही सकता है, बढ़ नहीं सकता) तो सुरक्षा के लिए और सत्ता बरकरार रखने के लिए एक मुकाम की जरूरत है। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस भी दिक्कत में है। महाराष्ट्र की सरकार कांग्रेस की वजह से ही टिकी हुई है। इसीलिए वाम और कांग्रेस के बीच लड़ाई में बंदरबांट करने की गुंजाइश बहुत कम है। यह ज्यादा संभावित है कि पूरी इमारत ही गिर जाए।

इन्हीं कारणों के चलते तीनों दल एड़ी-चोटी का पसीना बहा रहे हैं ताकि संप्रग का अस्तित्व अक्षुण्ण रहे। लालू जी ने तो यहां तक कहा है कि जो हो रहा है वह वाकयुध्द है और दोनों दोस्त जल्दी ही मान जाएंगे। लेकिन शर्तिया ऐसा होगा, यह कोई नहीं कह रहा है।

अत: संकट की स्थिति बरकरार है। सभी यह सोच रहे हैं कि संसद का मानसून सत्र कितने दिन तक स्थगित किया जाए ताकि खींचकर सरकार की बर्खास्तगी किसी तरह 2009 तक धकेल दी जाए। शायद ऐसा न हो और चुनाव, राज्य चुनावों के साथ ही हो जाएं। कुल मिलाकर भारत, राजनीतिक और आर्थिक संकट से गुजर रहा है और जल्दी इससे उबरने वाला नहीं है।

First Published : June 20, 2008 | 11:15 PM IST