अब यह स्पष्ट हो चुका है कि कांग्रेस नेताओं को संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार द्वारा पिछले महीने पेट्रोल, डीजल, और रसोई गैस (एलपीजी) के दाम बढ़ाए जाने पर जितने विरोध की उम्मीद की थी, उतना विरोध विपक्षी राजनीतिक दलों ने नहीं किया।
कांग्रेस नेताओं ने जरूरत से ज्यादा ही विरोध का अनुमान लगा लिया था। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ाने के विरोध में पश्चिम बंगाल में दो दिन की हड़ताल रही और इसके अलावा कुछ अन्य राज्यों में भी राजनीतिक दलों ने विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया।
लेकिन पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में 10-17 प्रतिशत की बढ़ोतरी का मामला आसानी से निपट गया। न तो विपक्षी दल मिलकर कांग्रेस पर हमला बोलने की कोई ठोस रणनीति बना पाए और न ही वे सरकार पर ऐसा दबाव बना सके कि मूल्य वृध्दि का फैसला वापस ले लिया जाए।
यह सही है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मामले को हल्का करने की कोशिश की। उन्होंने राज्यों से अनुरोध किया कि पेट्रोलियम पर लगने वाले विभिन्न करों में कमी की जाए और कुछ राज्यों ने इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया भी दी। इससे कीमतों में बढ़ोतरी का कुछ प्रभाव कम हुआ। लेकिन अगर पीछे मुड़कर देखें तो ऐसा लगता है कि इस तरह की राहत की जरूरत को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया था।
इसका सबसे बुरा पहलू यह है कि राज्य सरकारों द्वारा करों में कटौती और सब्सिडी दिए जाने से उनकी पहले से ही खराब वित्तीय सेहत पर बुरा असर पडेग़ा। इससे उनका वित्तीय घाटा और ज्यादा बढ़ने का खतरा है। और इसका असर यह होता है कि अगर वित्तीय घाटा बढ़ता ही गया तो राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे जनहित के अन्य जरूरी कार्यों पर बुरा असर पड़ेगा।
यह तो आम जनता और अधिकतर राजनीतिक दलों को अहसास था कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ना लाजिमी है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले एक साल से कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। इस बात की संभावना ज्यादा है कि लोग इसलिए परेशान रहे हों कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें दोगुने से अधिक हो गई थीं और इस पर संप्रग सरकार कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी।
राज्य नियंत्रित तेल विपणन कंपनियों का घाटा, खतरे के निशान पर पहुंच गया था और सरकार ने उन्हें इस दौरान एक बार भी पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ाने की अनुमति नहीं दी। स्पष्ट रूप से यह कांग्रेस नेतृत्व की राजनीतिक विफलता थी कि वे तेल की कीमतों के मोर्चे पर आम आदमी की मनोदशा को सही तरीके से नहीं भांप सके। इस मसले पर विपक्ष और आम लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में समझ पाने की सत्तासीन राजनीतिक दलों की विफलता और सरकार द्वारा लिए गए फैसले पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।
क्या कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने इस मुद्दे पर जमीनी स्तर पर काम करने वाले पार्टी के सदस्यों से कोई प्रतिक्रिया या राय ली? अगर उनकी प्रतिक्रिया ली गई तो वह क्या थी? ऐसा क्यों हुआ कि कुछ मंत्री और प्रधानमंत्री ही तेल की कीमतें बढ़ाए जाने के मुद्दे पर तुरंत फैसला लिए जाने के पक्ष में थे? ऐसा क्यों हुआ कि कीमतों में बढ़ोतरी किए जाने के बाद प्रधानमंत्री को राष्ट्र के नाम संदेश देना पड़ा?
शायद यह पहला अवसर था, जब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी पर प्रधानमंत्री को राष्ट्र के नाम संदेश देना पड़ा। अंतिम सवाल यह है कि ऐसा क्यों हुआ कि कांग्रेस के कुछ नेता ही सरकार के इस फैसले का बचाव कर रहे थे? ये कुछ ज्वलंत सवाल हैं जिन पर कांग्रेस पार्टी के थिंक टैंक को आने वाले दिनों में चुनावों को ध्यान में रखते हुए जरूर विचार करना चाहिए।
यह कांग्रेस के लिए आगामी चुनावों में जनता का रुख जानने के लिए जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी इस बात के लिए है कि पार्टी के अन्य मंत्री भी सरकार के इस फैसले की सामूहिक जिम्मेदारी स्वीकार करें। दुर्भाग्य की बात यह है कि संप्रग सरकार के पिछले चार साल के कार्यकाल के दौरान इस तरह के मसलों पर विचार नहीं किया गया।
एक बार अगर उच्च स्तर पर फैसला ले लिया गया, तो सभी मंत्रियों और सत्तासीन पार्टी के लिए काम कर रहे राजनीतिज्ञों को एक स्वर में उस निर्णय का बचाव करना चाहिए, चाहे वह तेल कीमतों में मूल्य वृध्दि का मसला हो या भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित न्यूक्लियर डील का मामला हो। सन 2002 में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने फैसला किया कि बिजली के वितरण का जिम्मा निजी हाथों को सौंप दिया जाए।
दिल्ली विद्युत बोर्ड को भंग करते हुई उन्होंने तीन निजी नियंत्रण वाले विद्युत पारेषण कंपनियों का गठन किया। भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने शीला दीक्षित सरकार पर हमला बोल दिया। लेकिन वह अपने फैसले पर अडिग रहीं और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी उनका अनुसरण किया। समस्या उठी, लेकिन उसका समधान भी उनकी सरकार में काम कर रहे नौकरशाहों ने निकाल लिया।
शीला दीक्षित ने जनता के रुख को भली भांति समझ लिया। दिल्ली के लोग बिजली की खराब वितरण व्यवस्था से नाखुश थे। वे चाहते थे कि वितरण प्रणाली में सुधार आए, भले ही उन्हें कुछ ज्यादा पैसा देना पड़े। शीला दीक्षित का फैसला सही साबित हुआ और उनके पांच साल के कार्यकाल में कीमतों में बगैर किसी बढ़ोतरी के पारेषण व्यवस्था में सुधार हुआ। वह सौभाग्यशाली थीं कि उनके सहयोगी कांग्रेस नेताओं का उन्हें पूरा समर्थन मिला।
आज दिल्ली में बिजली वितरण व्यवस्था के निजीकरण को छह साल हो चुके हैं, लेकिन किसी भी राजनीतिक दल में साहस नहीं है कि शीला दीक्षित के उस फैसले पर उंगली उठाए। वास्तव में, यह ऐसा फैसला है, जिसका उन्हें बेहतर राजनीतिक लाभ मिला है।
संप्रग सरकार की तेल की कीमतों पर दीर्घकालिक रणनीति के बारे में उच्चाधिकार प्राप्त समिति विचार कर रही है। इस नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह समिति जमीनी हकीकत को कितने बेहतर ढंग से समझ लेती है और संप्रग के राजनीतिक नेतृत्व का उसे कितना समर्थन मिलता है।