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कानूनों की उलटबांसी से अदालतें भी हैं हैरान

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:45 PM IST

एक पुराने हथियार सौदागर ने एक बार दावा किया कि उसका तीर किसी भी ढाल को छेद देगा और उसी सांस में उसने यह भी दावा किया कि उसकी ढाल किसी भी तीर को रोक देगी।


विधि निर्माता कुछ इसी अंदाज में विशेष कानूनों को बनाने का दावा करते हैं। वे इस बात की कोशिश करते हैं कि नए कानून की शक्तियां पुराने नियमों में मौजूद खामियों को खत्म कर देगी।

समस्या यह है कि अन्य कानून जो पहले से ही मौजूद हैं, उनसे भी इनका टकराव होता है। इसका परिणाम यह होता है कि कानून को लेकर भ्रम और टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे तमाम मामले सर्वोच्च न्यायालय में आए, जिसमें उसने अंतर्विरोधों को दूर करने की कोशिश की।

पिछले पखवाड़े दो न्यायाधीश एक मामले में कोई सर्वमान्य हल निकालने में असफल रहे और उन्होंने यह मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेज दिया, जिससे वे बड़ी खंडपीठ बनाकर मामले का अंतिम समाधान निकाल सकें।

केएसएल ऐंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम अरिहंत थ्रेड्स लिमिटेड मामले में जो दो कानून सामने आए, वे थे-  सिक इंडस्ट्रियल कंपनीज (स्पेशल प्रोविजंस) ऐक्ट 1985 और द रिकवरी आफ डेट डयू टु बैंक्स ऐंड फाइनैंशियल इंस्टीटयूशंस ऐक्ट 1993। सिक इंडस्ट्रीज ऐक्ट की कई मामलों में न्यायालय द्वारा आलोचना की जा चुकी है और सरकार ने कुछ साल पहले फैसला किया था कि इसे वापस ले लिया जाए।

होता यह है कि सदन की भीड़भाड़ और शोरगुल में विद्वान न्यायाधीशों की आवाज अनसुनी रह जाती है। दूसरा कानून तुलनात्मक रूप से नया है। ऋण वसूली न्यायाधिकरण इसी के अधीन बनाए गए हैं। चूंकि दोनों कानून घाटे, कर्ज और ऋण वसूली से संबद्ध हैं इसलिए वे  एक दूसरे की सीमाओं में अतिक्रमण करते हैं।

समस्या यह है कि दोनों विशेष कानून होने का दावा करते हैं और प्रावधान की शुरुआत इससे होती है कि इस कानून में कुछ भी विसंगति होने के बावजूद..। इन दावों के चलते न्यायाधीश एक राय नहीं बना पाते।इस मामले के तथ्य भुगतान से बचने के लिए वैधानिक रणनीति, संपत्ति की बिक्री और ऋणदाताओं के दावों को खारिज करने के तरीकों  तथा अपना पैसा वापस लेने की उनकी कोशिशों से संबद्ध हैं।

सिक इंडस्ट्रीज एक्ट की धारा 22 और 32 में ऐसे प्रावधान हैं जिनसे ऋणदाताओं के दबाव से बचा जा सकता है। होता यह है कि खस्ताहाल इकाई के सभी काम स्थगित कर दिए जाते हैं और उसके आगे की रणनीति वित्तीय संस्थान तैयार करते हैं। वे यह भी घोषणा करते हैं कि यह अधिनियम अन्य कानूनों से ऊपर रहेगा।

इस कानून की आलोचना का प्रमुख कारण यह है कि जो व्यापारी जानबूझकर अपनी कंपनी को मृत घोषित करते हैं, वे इसका दुरुपयोग करते हैं। इसलिए एक विधेयक तैयार किया गया, जिससे कंपनी कानून के तहत न्यायाधिकरण बनाए जा सकें जो सिक इंडस्ट्रीज कानून के तहत स्थापित किए गए संस्थानों की जगह लें। लेकिन यह कानून प्रभाव में नहीं आ सका।

ऋण वसूली न्यायाधिकरण की स्थापना से संबधित कानून में इसी तरह की बातें थीं जिससे अन्य कानूनों पर अमल नहीं हो सका। सर्वोच्च न्यायालय का पाला इस तरह के तमाम मामलों से पड़ा और इस तरह के  भ्रम की स्थिति से बचने के लिए कुछ दिशानिर्देश भी तैयार किए गए।

सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ इस तरह से कहा, ‘न्यायालय कानूनों से संबंधित नीतियों की जांच कर सकती है- जिस भाषा का प्रयोग किया गया है, लक्ष्यों को प्राप्त करने की कोशिश, अगर किसी तरह की धोखाधड़ी हुई है उसका उपचार आदि। सामान्यतया यह कोशिश होगी कि बाद में हुए कानूनी संशोधनों को प्राथमिकता दी जाएगी।

न्यायालय की यह कोशिश होगी कि जो भी फैसला किया जाए उसकी कानूनी व्याख्या, सभी पक्षों को मान्य हो और कानूनों को लागू करने में एक दूसरे के बीच कोई मतभेद न हो। बाद में न्यायालय इस बात की जांच कर सकती है कि दोनों विधानों में से कौन सा विशेष है और अन्य सामान्य। एक या अन्य परीक्षणों के आधार पर न्यायालय, मामले को हल करने की कोशिश करेगा।’

इस मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह प्रावधान किया कि अरिहंत थ्रेड्स बीआईएफआर प्रोटेक्शन के तहत था, इसलिए ऋणदाता बोली लगाकर संपत्तियों की नीलामी नहीं कर सकते। केएसएल, जिसने नीलामी के तहत सबसे ऊंची बोली लगाई थी, ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। उसने कहा कि ऋण वसूली न्यायाधिकरण के संपत्ति को बेचने के फैसले को बरकरार रखा जाना चाहिए।

एक न्यायाधीश ने कहा कि कर्ज वसूली अधिनियम विशेष कानून है, जो सिक इंडस्ट्रीज एक्ट के बाद बना है, यह जनता के राजस्व से संबंधित है जिसे प्राथमिकता दी जानी चाहिए। लेकिन एक अन्य न्यायाधीश ने इससे अलग विचार रखा।

उनके मुताबिक कर्ज वसूली अधिनियम की धारा 34(2) के मुताबिक यह ‘अतिरिक्त नियम है, न कि उसका अनादर करने वाला’। इसमें सिक इंडस्ट्रीज एक्ट भी शामिल है। यह सूक्ति ‘अतिरिक्त नियम है, न कि उसका अनादर करने वाला’ अन्य कई विशेष नियमों में भी लागू होता है जैसे उपभोक्ता संरक्षण कानून में। ऐसी स्थिति में नए सवाल पर सर्वोच्च न्यायालय के जवाब का वित्तीय जगत पर दूरगामी असर पड़ेगा।

First Published : September 11, 2008 | 10:32 PM IST