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नेतृत्व क्षमता के अभाव से जूझते क्रिकेट कप्तान

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 3:43 AM IST

डीएलएफ इंडियन प्रीमियर लीग खेल के मैदान के बाहर कुछ ज्यादा ही चर्चा में रहा। सबसे अधिक चर्चा विजय माल्या की रॉयल चैलेंजर्स की हुई।


सीईओ चारू शर्मा को निकाला जाना एक महीने में हुई विभिन्न प्रमुख घटनाओं में से एक है। खेले गए ज्यादातर आईपीएल मैचों का बारीकी से अध्ययन करने पर नेतृत्व क्षमता को लेकर दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। एक उदाहरण लें।

कोलकाता नाइट राइडर्स के कप्तान सौरभ गांगुली और उनकी प्रतिस्पर्धी टीम चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी टॉस होने के बाद कमेंटेटर से बातचीत कर रहे थे। अपनी टीम में हुए परिवर्तनों के बारे में बात करते हुए सौरभ गांगुली ने कहा कि उन्होंने देवब्रत घोष को शामिल किया है, बाद में उन्होंने सुधार करते हुए कहा कि घोष नहीं दास। उन्होंने कहा, ‘लेकिन इस बारे में मैं पूरी तरह से निश्चिंत नहीं हूं।’

गांगुली के 11 खिलाड़ियों की टीम में उपनाम के बारे में इस तरह के भ्रम की शायद कोई दर्शक अनदेखी भी कर दे लेकिन धोनी तो इससे भी एक कदम आगे बढ़ गए। उन्होंने बगैर किसी शर्म संकोच के कहा, ‘मैंने भी अपनी टीम में एक परिवर्तन किया है। लेकिन मुझे खिलाड़ी का नाम नहीं याद है। वह एक स्थानीय खिलाड़ी है।’

अगर शेन वार्न को अपवाद के रूप में छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर कप्तानों की यही हालत थी। यह सीधे नेतृत्व से जुड़ा मसला है। अपनी ही टीम के केवल 11 खिलाड़ियों के नाम भूल जाना तमाम उदाहरणों में से एक है।

अगर राहुल द्रविड़ को एक निष्क्रिय कप्तान के खिताब से नवाजा जाता है तो कुछ अन्य कप्तानों को भी थियरी एक्स मैनेजर्स की श्रेणी में रखा जा सकता है जिनका प्रेरणा के मामले में दबाव बनाने, धमकियां देने और कड़े नियंत्रण का मामला सामने आता है- निश्चित रूप से आधिपत्य और नियंत्रण का वातावरण होता है। ज्यादातर कप्तानों को इस रूप में देखा गया कि वे दूसरे साथी खिलाड़ियों से आगे नजर आने की कोशिश करते हैं, जो कि नेतृत्व की दूसरी कमजोरी है।

उदाहरण के लिए राजस्थान रॉयल्स के साथ एक मैच के दौरान सौरभ गांगुली एक कैच लेने के लिए दौड़े, जो वास्तव में बाउंड्री के पास खड़े साथी खिलाड़ी आकाश चोपड़ा का कैच था। गांगुली ने ऐसा दिखाने की कोशिश की कि चोपड़ा की वजह से कैच छूटा, लेकिन गलती उन्होंने खुद की थी।  या धोनी की उस प्रेस वार्ता पर गौर करें, जो उन्होंने रॉयल चैलेंजर्स के साथ मैच के पहले की थी। उनकी टीम सेमीफाइनल में पहुंच गई थी।

धोनी इस सिलसिले में बात कर रहे थे कि टीम में मैथ्यू हेडेन नही हैं (क्योंकि वे टेस्ट मैच में खेलने के लिए वापस जा चुके थे) और मुख्य चिंता यह है कि ओपनिंग कौन करेगा। इस बात के लिए कैमरा टीम को धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने स्टीफन फ्लेमिंग और पार्थिव पटेल का चेहरा उस समय नहीं दिखाया, जिन्हें हेडेन के जाने के बाद टीम की ओपनिंग करनी थी।

यह ठीक उसी तरह से है जैसे एक कंपनी के प्रमोटर को अपने सीईओ पर भरोसा न हो। इससे भी बुरी बात यह होगी कि कंपनी का प्रमोटर यह कहे कि पहले के सीईओ पर उसे ज्यादा भरोसा था।  अगर क्रिकेट का व्यवसायीकरण हो रहा है तो शायद यह गलत विचार नहीं होगा कि अलग से एक प्रशिक्षण देकर कप्तान को नेतृत्व का पाठ भी पढ़ाया जाए। उदाहरण के लिए गांगुली और धोनी को इस बात की सीख देनी चाहिए कि उन्हें अपने लोगों का सम्मान करना चाहिए।

इसके पीछे यह विचार है कि आप अपने लोगों का इसलिए सम्मान कर रहे हैं कि वे बेहतर परिणाम दे सकें। भारत के मौजूदा और पूर्व कप्तानों को यह भी बताया जाना चाहिए कि एक अच्छे कप्तान के लिए कड़क छवि वाला दिखना एक बड़ा मिथक है। एक अच्छे सीईओ के लिए जरूरी है कि वह कड़क भी हो और बेहतरीन रिश्ते रखने वाला भी हो।

इतिहास गवाह है कि आमतौर पर इस तरह की कंपनियों का पतन हो जाता है, जहां क्रोध की ज्वाला बलवती होती है। नेतृत्व के गुण विकसित करने वाले प्रशिक्षण संस्थानों में अब यही सिखाया जाता है कि परम्परागत नेतृत्व के तरीकों को भूलकर टीम भावना से काम किया जाना ज्यादा लाभदायक है। सफल सीईओ वे होते हैं तो आईना देखकर फैसले नहीं करते, बल्कि अपने आस-पास काम कर उन लोगों की बातों को ध्यान से सुनते हैं जो सच बोलते हैं।

‘हाऊ टु रन ए कंपनी’ नामक पुस्तक में डेनिस सी केयरी और मैरी कैरोलाइन ने नार्थवेस्ट एयरलाइंस के पूर्व सीईओ जॉन डैशबर्ग का एक उदाहरण दिया है। जब डैशबर्ग कंपनी के सीईओ बने तो घर पर उनके एक जूनियर एग्जीक्यूटिव का फोन आया। उसने कहा कि कंपनी को घाटे से उबारने के लिए उसके पास एक रणनीति है। डैशबर्ग ने न केवल उसकी बात सुनी, बल्कि नॉर्थवेस्ट की रणनीति में उसके सुझावों को शामिल करने के लिए तैयार भी हो गए।

इस प्रस्ताव में कहा गया था कि कंपनी को कई हबों का अधिग्रहण करने या विकसित करने का विचार त्यागकर केवल तीन हबों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जब नॉर्थवेस्ट ने तीन हबों की परियोजना पर काम करना शुरू किया तो न केवल कंपनी को फायदा हुआ, बल्कि वह घाटे से उबरने में भी सफल हुई।

इस तरह के उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत रूप से सफल लोगों में यह गुण होता है कि वे प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित और उन्हें काम करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। आईपीएल मैच खेल रहे ज्यादातर कप्तानों में निश्चित रूप से इस बात की कमी नजर आ रही थी।

First Published : June 5, 2008 | 1:27 AM IST