Categories: लेख

लिप्टॉर मामले के खतरनाक इशारे

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:01 AM IST

पिछले हफ्ते रैनबैक्सी के शेयर होल्डरों को उस वक्त जबरदस्त झटका लगा था, जब उन्हें यह पता लगा कि रैनबैक्सी ने कोलेस्ट्रॉल की दवा, लिप्टॉर के मुद्दे पर बहुराष्ट्रीय कंपनी फाइजर के साथ समझौता कर लिया।


रैनबैक्सी ने फैसला किया था कि वह लिप्टॉर के मुद्दे पर ज्यादा मुकदमेबाजी नहीं करना चाहती। बदले में फाइजर ने उसे इस दवा के जेनरिक वर्जन को 2011 के अंत तक अमेरिकी बाजार में उतारने की भी इजाजत दे दी। कंपनी के इस फैसले से कई लोग भौचक्के रह गए थे।

दरअसल, इस मामले में रैनबैक्सी का केस काफी मजबूत था। ऊपर से, इस समझौते से रैनबैक्सी की जेनरिक लिप्टॉर अब कम से कम साल भर की देरी से लॉन्च हो पाएगी। कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि फाइजर के लिए रैनबैक्सी में कुछ भी नहीं बचा है, जिस वजह से वह दायची-सांक्यो के रैनबैक्सी के हालिया अधिग्रहण के खिलाफ बोली लगाए। कंपनी के इस फैसले से रैनबैक्सी के अधिग्रहण पर से खतरे के बादल छंट गए हैं, लेकिन इससे मिले संकेत परेशान करने वाले हैं।

यह बात छुपी हुई नहीं है कि बड़ी दवा कंपनियां अपने सबसे ज्यादा बिकने वाली दवाओं को ‘सदाबहार’ पेटेंटों के जरिये अपनी मुट्ठी में ही रखना चाहती हैं। पिछले कुछ सालों के दौरान यह काफी जरूरी भी हो गया है। नई दवाओं की आमद कमोबेश खत्म ही हो गई है। आज की कमोबेश सभी सुपर-डुपर हिट दवाओं की खोज कई साल पहले हुई थी। इस ट्रेंड को बदलने की जिम्मेदारी रैनबैक्सी ने उठाई थी। इस मामले में उन्हें स्वास्थ्य समूहों का भी पूरा साथ मिला हुआ था।

पिछले कुछ सालों में सभी विकसित देशों में इलाज की कीमत में हद से ज्यादा इजाफा हुआ है। इसलिए इन स्वास्थ्य समूहों के मुताबिक इस बीमारी का एक ही इलाज है- जेनरिक दवाएं। असल में दायची द्वारा अधिग्रहण से पहले रैनबैक्सी ने पिछले एक साल में पेटेंट मामलों से जुड़े हुए काफी मामलों अदालत से बाहर निपटारा किया है। यह भी चिंता की बड़ी वजह है।

भारत की जेनरिक दवा कंपनियां अपनी कम लागत की वजह से बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की विस्तार की हसरतों के लिए पसंदीदा शिकार बन चुकी हैं। रैनबैक्सी और मैट्रिक्स जैसी दो बड़ी हिन्दुस्तानी दवा कंपनियों का विकेट तो गिर चुका है। अब लगता है कि इनके परदेसी मालिक भी पेटेंट कानूनों से जुडे हुए मामलों का जल्द निपटारा चाहते हैं। अगर इसने एक ट्रेंड की शक्ल अख्तियार कर ली तो जल्द ही भारतीय फार्मा कंपनियों के सामने इात का सवाल खड़ा हो जाएगा।

किसी भी नई दवा को ईजाद करने पर करोड़ों-अरबों डॉलर खर्च करने होते हैं। इसलिए ज्यादातर भारतीय कंपनियां यह खर्च नहीं उठा सकतीं । लेकिन वे पैसों की भूखी बड़ी दवा कंपनियों के पेटेंटों को चुनौती देकर वे मोटी रकम जरूर कमा सकती हैं। यह खिड़की भी बंद हो गई तो देसी दवा कंपनियां छोटी-मोटी दवाओं के अलावा और कुछ भी नहीं बना पाएंगी, जिनके पेटेंट सालों पहले खत्म हो चुके हैं। तब बौध्दिक संपदा बड़ी दवा कंपनियों की बपौती बन जाएगी।

First Published : June 23, 2008 | 1:05 AM IST