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काटे नहीं कटते दिन और रात

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 4:45 AM IST

हेलिकॉप्टर से चारों ओर पानी ही पानी नजर आता है। उसकी कानफाड़ू आवाज के बीच 40 मिनट तक सीट बेल्ट से बंधे रहने के बाद दूर कहीं स्टील का एक टापू नजर आता है।


जैसे यह टापू नजदीक आते जाता है, एक खतरनाक और दिल दहलाने वाला दृश्य नजर आता है। दूसरे छोर पर तेज लौ के साथ जलती हुई कोई चीज मालूम पड़ती है। यह धधकने वाली आग की लौ, जो दूसरे छोर पर जल रही है, उससे पूरे देश के कुल कच्चे तेल का 7 प्रतिशत उत्पादन किया जाता है और यहीं से गैस व घरेलू तेल की कुल क्षमता का 16 प्रतिशत उत्पादन किया जाता है।

यह नजारा देश के सबसे बड़े ऑयल फील्ड बॉम्बे हाई साउथ का है। इसके संचालन की बागडोर तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) के हाथों में है। यह ऑयल फील्ड 30 साल पुराना है। हल्के से झटके के साथ जब यूनाइटिड हेलीचार्टर्स का 13 सीटों वाला हेलीकॉप्टर यहां उतरता है तो ऐसा लगता है कि यह टारपॉलिन की शीट पा उतर गया है।

मैंने जब एक आदमी को ऊपर से लेकर नीचे तक नारंगी रंग के कपड़े पहने सावधान की मुद्रा में देखा, तब जाकर मुझे यह एहसास हुआ कि यहां जिंदगी है। वह आदमी हेलीकॉप्टर को जमीन पर उतरता हुआ देख रहा था। बॉम्बे हाई साउथ प्लेटफॉर्म उत्तरी प्लेटफॉर्म से भी जुड़ा है। कुल मिलाकर यहां पांच प्लेटफॉर्म हैं। हरेक प्लेटफॉर्म से तेल और गैस का उत्पादन किया जाता है।

समुद्र के नीचे मिट्टी और चट्टानों के बीच सी बेड और ईंधन के खजानों से तेल और गैस निकाली जाती है और इस तरह देश को इस क्षेत्र में समृद्ध बनाने की एक जोखिम भरी कोशिश की जाती है। प्रत्येक प्लेटफॉर्म का क्षेत्रफल लगभग 3 वर्ग किलोमीटर है और इसमें से हरेक का इस्तेमाल अलग अलग उद्देश्यों के लिए किया जाता है। इनमें से जो सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है, उससे गैस का प्रसंस्करण और उसका दाबन किया जाता है। इससे थोड़ी मात्रा में तेल का भी उत्पादन किया जाता है।

दूसरे प्लेटफॉर्म से ज्यादा क्षमता में तेल का प्रसंस्करण किया जाता है और तीसरे प्लेटफॉर्म में तेल और गैस उत्पादन करने वाले 6 कुएं हैं। चौथे प्लेटफॉर्म पर रहने के लिए क्वार्टर्स की व्यवस्था की गई है और पांचवें प्लेटफॉर्म से पानी को इंजेक्ट कर बॉम्बे हाई के दक्षिण फील्ड में भेजा जाता है ताकि ऑयल रिजर्वायर के दबाव को संतुलित किया जा सके।

इस इंस्टॉलेशन के जरिये, जो मुंबई के तटीय इलाके से 160 किलोमीटर की दूरी पर है, सी बेड के अंदर 200 कुएं खोदे गए हैं जिससे सारी अशुद्धियों समेत पानी, हाइड्रोकार्बन आदि को बाहर निकाला जाता है। यहां के पानी में बड़ी मात्रा में गंदापन रहता है। अगर इसे दूर न किया जाए तो समुद्र तल के 70 मीटर की गहराई में जो तेल को बाहर ले जाने वाली पाइप बिछी हुई है, उसमें इसका क्रिस्टलाइजेशन हो जाएगा।

एक इंजीनियर ने कहा कि इतनी गहराई में तापमान काफी कम होता है और दाब काफी ज्यादा होता है। अगर गंदेपन को दूर नहीं किया जाएगा तो इससे तेल को पाइप से ले जाने में बाधा आती है। बॉम्बे हाई दक्षिण प्लेटफॉर्म को टीबी, लाइब्रेरी, कुछ इंडोर गेम्स आदि से सुसज्जित किया गया है। सी बेड से लेकर प्लेटफॉर्म तक पाइपलाइनों का जाल बिछा हुआ रहता है और अगर रिग के किसी पाइप में कोई सुराख हो जाए तो गंभीर विपदा आ सकती है।

मंडल कहते हैं कि अगर एक भी पंक्चर हुआ तो दूसरा उत्तरी बॉम्बे हाई बनने में देर नहीं लगेगी। उत्तरी बॉम्बे हाई की यादें तो अब भी लोगों के मन में ताजा ही है। 27 जुलाई 2007, मौसम खराब था और अरब के समुद्र से हवा मुंबई तट की ओर चली थी। एक जहाज उत्तरी प्लेटफॉर्म से टकरा गया था और इतनी भयानक आग लगी कि 11 लोगों की तो जानें गई, साथ ही 110,000 बैरल तेल की प्रतिदिन बर्बादी भी हुई।

वैसे इस घटना के बाद ओएनजीसी ने अपने सभी ऑफशोर प्लेटफॉर्म पर सुरक्षा के इंतजामात को और कडा कर दिया। सागर सम्राट रिग में 100 से ज्यादा लोग रहते हैं, जो कि सिंगापुर में बनाया गया था और पहली बार इससे खुदाई 31 जनवरी 1974 को की गई थी। इस रिग के सारे इंजनों को हाल में ओवरहॉल किया गया है। छह महीने के अंतराल में पांच इंजन तो पूरी तरह से बदल दिए गए। इससे फायदा यह हुआ कि प्रतिदिन 1 लाख रुपये के डीजल की बचत होने लगी।

एक इंजीनियर ने बड़े उत्साह में बताया कि अब हम उम्मीद करते हैं कि यह रिग अगले 25 साल तक बिना किसी खराबी का काम करता रहेगा। एक इंजीनियर ने बताया कि जब 25 साल पहले उसने बॉम्बे हाई ज्वाइन किया था तो उन्हें लग रहा था कि यह 2009 तक सूख जाएगा। लेकिन अब उन्हें लगता है कि यह 2030 तक जरुर चलेगा। यह वैसे बहुत अच्छी बात है लेकिन ओएनजीसी के साथ समस्या कुछ अलग तरीके की है।

हालांकि यहां से निकलने वाला तेल उच्च क्वालिटी का है लेकिन उस हिसाब से उसे कीमत नहीं मिल पाती है। ओएनजीसी के ऑफशोर बेसिन में पिछले 25 सालों से काम कर रहे एक इंजीनियर ने बताया कि यहां पर शिफ्ट में काम करना काफी महत्वपूर्ण है। हमें तेल के बहाव को समय समय पर देखते रहने की जरुरत होती है। इन इंजीनियरों को इस ऑफशोर बेसिन में काम करने के लिए प्रतिमाह 15,000 रुपये अतिरिक्त मिलते हैं।

लेकिन उनका कहना है कि इसके बावजूद उन्हें अपने घर की बहुत याद आती है, जो उनसे मीलों दूर हैं। मानसून के समय तो यहां पर काम करना काफी दुरूह होता है। वे कहते हैं कि लोग इस बात को जानें कि वे क्या करते हैं और कैसे करते हैं। हम लोगों के लिए इतनी गहराई से तेल निकालते हैं और कोई भी हमारे बारे में नहीं लिखता है।

First Published : June 10, 2008 | 11:34 PM IST