नारायण राणे अब कगार पर खड़े हैं। महाराष्ट्र मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने की धमकी दी है, और इतना छटपटा रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी से भी इस्तीफा दे सकते हैं- ऐसा सुनने में आ रहा है।
महाराष्ट्र की शिवसेना के धड़ों में एक और नाम जुड़ सकता है। शरद पवार और कांग्रेस दोनों खड़े-खड़े तमाशा देख रहे हैं और दिन गिन रहे हैं कि राणे कब पार्टी से निकाले जाएं या स्वयं छोड़कर चले जाएं। बात यहां तक कैसे आ गई? दरअसल 2005 में जब राणे कांग्रेस में आए तब दिल्ली में उम्मीदों की लहर दौड़ गई।
सिंधुदुर्ग महाराष्ट्र का वह इलाका है जो शिवाजी की जन्मभूमि माना जाता है और मराठी अस्मिता और संस्कार का स्रोत है। यदि शिवसेना बार-बार सिंधुदुर्ग से विजयी होकर आती थी तो इसलिए कि नारायण राणे का कार्यक्षेत्र मालवान, रत्नागिरि और सागर तट से सटा कोंकण इलाका था।
यहां की अर्थव्यवस्था आम और मनीआर्डर पर चलती है। इस क्षेत्र के सारे नवयुवक मुंबई में काम करते हैं और घर पर मनीआर्डर भेजते हैं, जिससे गांव में रह रहे उनके परिवार का भरण पोषण हो सके। इलाका विकसित नहीं है, लेकिन राणे यहां के एक नेता हैं। 30 साल तक शिवसेना में रह चुके हैं। शिव सेना द्वारा मराठी लोगों पर आधिपत्य स्थापित करने वाला सेना का अवतार भी देखा है- और फिर उसका उग्र हिंदू रूप भी।
जब बिजली, सड़क, पानी और नाला-सीवर के मामलों में तल्लीन शिवसेना ने अपने आप को नया रूप दिया तो पार्टी तो बदल गई लेकिन कार्यशैली वही रही। दो-तीन हत्या की वारदात पर सुनवाई चल रही है लेकिन यह तो सब चलता रहता है। शिवशाही साफ-पाक हाथों से स्थापित थोड़े ही हो जाती है।
नारायण राणे को शिवसेना और शिवशाही के बारे में पुन: सोचना पड़ा जब बाला साहब ठाकरे, सेना के कर्ताधर्ता- पृष्ठभूमि में सरकने लगे और शिवसेना की बागडोर उन्होंने बेटे उध्दव को पकड़ा दी। भतीजे राज भी शिवसेना से तटस्थ होने लगे और राणे भी। दोनों में क्या समझौता हुआ, यह सार्वजनिक नहीं है, लेकिन दोनों ने ही पार्टी छोड़ दी।
राज ने महाराष्ट्र नवनिर्माण समिति का गठन किया, जिसकी विधानसभा में संख्या नगण्य थी लेकिन बाहर आंदोलन करने की शक्ति जरूर थी। लेकिन नारायण राणे के सामने आंदोलन करके एक नई चीज खड़ी करने का विकल्प था ही नहीं। यदि वे अपने समर्थकों को बाला साहब से अलग कर बाहर ले जाते तो उन्हें अपनी सीटों से इस्तीफा देना पड़ता। उनका रास्ता दूसरा था, वे कांग्रेस में शामिल हो गए।
कांग्रेस की तरफ जाने वाली गली सिकुड़ी और संकरी होती है। चलने के लिए जगह बहुत कम होती है। औरों की तरह राणे ने भी यही पाया। उनके लिए जगह बनाने वाले भी कम थे। लेकिन वे भी खाली हाथ नहीं आए थे। नवंबर 2004 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की 70 सीटें आईं थीं। पूर्ण बहुमत के लिए 144 की जरूरत थी। मजबूरी में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस से हाथ मिलाना पड़ा था।
अब दिल्ली में कांग्रेस के मठाधीशों को लगा कि पवार से छुटकारा पाने का मौका है। राष्ट्रवादी कांग्रेस की 71 सीटों के बावजूद मुख्यमंत्री कांग्रेस का ही हुआ। बिना समय गंवाए राणे को कांग्रेस में ले लिया गया और उनके साथ उनके 7 विधायक भी आ गए। अर्थात कोंकण इलाके में कांग्रेस की लामबंदी पूरी हो गई।
राणे को राजस्व मंत्री बनाया गया। लेकिन वह कहां खुश होने वाले थे। उनको तो मुख्यमंत्री पद चाहिए था। विलासराव देशमुख कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे- जाति से मराठा हैं। शरद राव पवार तो मराठा हैं ही। अब एक और मराठा सरदार उनके समक्ष, उन्हीं की पार्टी में आ गया।
वही हुआ, जो आमतौर पर राजनीति में होता है। दुश्मन का दुश्मन दोस्त हो जाता है। विलास राव देशमुख के सिर पर शरद पवार ने हाथ रख दिया। जब शिवाजी के बाद महाराष्ट्र के सबसे बडे मराठा नेता का वरदहस्त देशमुख पर हो तो किसकी मजाल कि उनको हटाए?
कांग्रेस दल में वे लोग जो यह कहते थे कि महाराष्ट्र में कांग्रेस को अपना अस्तित्व बनाए रखना चाहिए और भविष्यवाणी करते थे कि शरद पवार कांग्रेस के लिए ऐसे बरगद का वृक्ष साबित होंगे जिसके नीचे कुछ उग नहीं पाता, उनकी उक्तियों को दरकिनार कर दिया गया।
वार करते थे पवार, लेकिन कंधा होता था देशमुख का। नारायण राणे को भी लगा कि कहां फंस गए। लेकिन अब न उगलते बनता था न निगलते। कांग्रेस छोड़कर जाने का मतलब था, बचे खुचे विधायकों का समर्थन खोना। पार्टी में रहने का मतलब था अपने आपको देशमुख-पवार के तंत्र में फना कर देना।
पिछले एक साल में राणे ने तीन बार इस्तीफा देने की धमकी दी है। देशमुख के साथ खटपट अब सार्वजनिक हो चुकी है। दोनो एक दूसरे पर खुला आक्रमण करने से नहीं चूकते हैं। इसका सबसे उग्र प्रदर्शन अभी एक माह पहले कांग्रेस की रैली में हुआ था जहां राणे और देशमुख के समर्थकों के बीच झड़प की वजह से रैली बेकार हो गई थी। सोनिया गांधी रैली में मुख्य अतिथि थीं और अवाक रहकर नजारा देखती रहीं।
अब जो स्थिति बन रही है उसमें राणे आर-पार की लड़ाई लड़कर शायद कांग्रेस छोड़ दें। वह लोकसभा चुनाव को देख रहे हैं और आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव पर इनका असर भी। कोंकण में अगर कांग्रेस फिर हारती है तो उसे अगली विधानसभा में शरद पवार के कंधे पर बैठकर फिर सवारी करनी पड़ेगी। दिल्ली में बैठे कांग्रेस के प्रभारियों को लगता है कि स्वाभिमान के साथ इतना बड़ा समझौता नहीं करना चाहिए। लेकिन राणे एक ऐसी दवा हैं जो मर्ज से अधिक घातक हो सकती है। सवाल यह है, राणे के बाजुए-कातिल में कितना दम है।