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स्वचालित ड्रोन हमलों से उपजते मु​श्किल सवाल

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 4:07 PM IST

लीथल ऑटोनॉमस वीपंस सिस्टम्स (एलएडब्ल्यूएस या लॉज) पूरी तरह मशीन आधारित और सिस्टम नियंत्रित ह​थियार प्रणाली है जो चेहरे की पहचान और कृत्रिम मेधा पर आधारित होती है। ऐसे ड्रोन केवल लक्ष्य के बारे में अनुमानित जानकारी के आधार पर काम करते हैं और उनके हमले में कोई मानव हस्तक्षेप नहीं होता। इस विषय में मीडिया की अटकल है कि ऐसा पहला हमला लीबिया में मार्च 2020 में किया गया। यह विडंबना ही है कि इस हथियार प्रणाली का सं​क्षिप्त नाम लॉज है क्योंकि ऐसा कोई अंतरराष्ट्रीय समझौता नहीं है जो ऐसे ह​थियारों के इस्तेमाल को सीमित करता हो या उसकी वजह देता हो। फिलहाल इन ह​थियारों की विश्वसनीयता के बारे में भी कोई सार्वजनिक जानकारी नहीं है।

हाल के दिनों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहां सीमाओं के पार ड्रोन का इस्तेमाल किया गया, हालांकि वह स्वचालित इस्तेमाल नहीं था। अमेरिकी सरकार ने 1 अगस्त को कहा कि मिस्र के सर्जन और अल कायदा के नेता अयमान अल जवाहिरी को काबुल में एक ड्रोन हमले में मार दिया गया। कहा गया कि इसके लिए एक ड्रोन से हेलफायर आर9एक्स मिसाइल दागी गई और इस हमले में कोई और जान नहीं गई। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस हमले के बारे में कहा, ‘इससे फर्क नहीं पड़ता कि कितना समय लगता है, इससे भी कि आप कहां छिपे हैं, अगर आप हमारे लोगों के लिए खतरा हैं तो अमेरिका आपको खोज कर खत्म कर देगा।’ जवाहिरी अगस्त 1998 में केन्या और तंजानिया के अमेरिकी दूतावासों में हमले के लिए कुख्यात था जिनमें 224 लोग मारे गए थे। वह 11 सितंबर, 2001 के न्यूयॉर्क हमलों में भी शामिल था जिसमें करीब 3,000 लोगों की जान गई थी। मीडिया में अटकलें हैं कि काबुल में जवाहिरी जिस ठिकाने पर रुका था उसकी जानकारी पाकिस्तान ने इस आशा में मुहैया कराई कि वह बदले में पाकिस्तान को भुगतान संकट से निपटने में मदद करेगा।

करीब दो वर्ष से कुछ अ​धिक पहले 3 जनवरी, 2020 को ईरान के मेजर जनरल कासिम सुलेमानी बगदाद हवाई अड्डे पर अमेरिका के रीपर ड्रोन हमले में मारे गए थे। सऊदी अरब के अरब न्यूज ने बताया था कि सुलेमानी के काफिले पर हमले में इस्तेमाल ड्रोन को कतर के अल उदीद एयर बेस से छोड़ा गया था जबकि इसके रिमोट कंट्रोल का संचालन अमेरिका के नेवाडा ​स्थित क्रीच एयरफोर्स बेस से किया गया था। सुलेमानी तत्कालीन इराकी प्रधानमंत्री आदिल अब्दुल-माहदी से मिलने बगदाद आए थे। सुलेमानी के अलावा उस हमले में कम से कम चार अन्य ईरानी तथा पांच इराकी मारे गए थे। न्यायिक फैसले के बगैर इन हत्याओं पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिवेदक ने कहा था कि यह हत्याकांड अंतरराष्ट्रीय कानूनों का संभावित उल्लंघन था। असहाय इराकी सरकार का कहना था कि हमले ने उसकी राष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन किया है। तकरीबन एक वर्ष पहले 29 अगस्त, 2021 को काबुल में हुए एक ड्रोन हमले में 10 अफगान नागरिक मारे गए थे जिनमें सात बच्चे शामिल थे। मरने वालों में सबसे छोटा बच्चा महज दो वर्ष का था। अमेरिकी जनरल केनेथ मैकिंजी जो अमेरिकी केंद्रीय कमान के मु​खिया थे, ने आधिकारिक रूप से कहा था कि यह हमला एक गलती था। आज तक यह पता नहीं है कि इस ड्रोन हमले को मंजूरी देने वालों को कोई सजा सुनायी गई या नहीं।

27 नवंबर, 2020 को तेहरान से 70 किलोमीटर दूर अबसर्द में एक और सीमा पार हमले में ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े भौतिकीविद मोहसिन फखरीजादेह महाबादी को मार दिया गया। मीडिया में आई खबरों में कहा गया कि यह हत्या इजरायल सरकार द्वारा स्वचालित सैटेलाइट संचालित गन के माध्यम से अंजाम दी गई। 2018 में तत्कालीन इजरायली प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू ने दावा किया था कि महाबादी एएमएडी नामक एक परियोजना के प्रमुख थे जो परमाणु ह​थियार विकसित करने के लिए बनी थी। उधर भारतीय मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने गत 18 अगस्त को जम्मू सीमा के निकट ड्रोन के माध्यम से ह​थियारों का जखीरा गिराया।

ऐसा नहीं है कि केवल अमेरिका ने ही ऐसे ड्रोन विकसित किए हैं। तुर्की की सरकार द्वारा प्रवर्तित कंपनी सवुन्मा टेक्नोलॉजिलेरी मुहेंदिसिल्क (एसटीएम) ने कार्गू-2 नामक एक ड्रोन तैयार किया है जिसे सामान्य तरीके से भी चलाया जा सकता है और स्वचालित ढंग से भी। ड्रोन तैयार करने के मामले में भारत तुर्की और ईरान से भी पीछे है। आने वाले दिनों में ड्रोन का इस्तेमाल सीमा पार से भारत के ठिकानों पर भी किया जा सकता है ऐसे में अनुमान के आधार पर बचाव करना मु​श्किल है। 

ड्रोन का इस्तेमाल दशकों से हो रहा है लेकिन इसका दायरा बढ़ रहा है। ये स्वचालित हो रहे हैं और इनके स्रोत का पता लगाना मु​श्किल हो रहा है जो विश्व स्तर पर​ चिंता का विषय होना चाहिए। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र तथा रेड​क्रॉस एवं प्रमुख स्वयंसेवी संगठनों ने बीते 10 वर्ष में लॉज से उत्पन्न खतरों को लेकर चर्चा की है और इनके इस्तेमाल पर रोक चाही है। खासतौर पर 13 दिसंबर, 2021 को संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने इन ह​थियारों के इस्तेमाल को सीमित और विनियमित करने के लिए नियमों का आह्वान किया। हालांकि लगता नहीं कि निकट भविष्य में इस दिशा में कोई खास प्रगति हो पाएगी। ऐसा तभी होगा जब दुनिया की प्रमुख सैन्य श​क्तियां इस विषय पर सहमत हों।

ऐसा नहीं है कि वि​भिन्न देशों ने अतीत में कभी किसी ह​थियार को गैर कानूनी नहीं बनाया। उदाहरण के लिए बायोलॉजिकल ऐंड टॉ​क्सिन वीपंस कन्वेंशन मार्च 1975 में हुआ था। 2022 के आरंभ तक 184 देश इस सं​धि का हिस्सा थे। जहां तक रासाय​निक शस्त्र सं​धि की बात है तो यह अप्रैल 1997 में अ​स्तित्व में आया और 193 देशों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं।

विरोधाभासी बात यह है कि फिलहाल ऐसी कोई अंतरराष्ट्रीय बाध्यकारी सं​धि नहीं है जो पारंपरिक ड्रोन तथा लॉज के घातक संस्करणों के इस्तेमाल का नियमन कर सके। 2023 में अगली जी 20 ​शिखर बैठक भारत में होनी है। अभी इसकी तारीख और जगह तय नहीं हुई है तथा यह भी स्पष्ट नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य देशों में से किन देशों के प्रमुख इसमें आएंगे। अगर जी20 के सहमति दस्तावेज में सीमा पार से ड्रोन/लॉज के इस्तेमाल को सीमित करने या गैर कानूनी बनाने को लेकर कोई दस्तावेज हस्ताक्षरित होता है तो यह शेष विश्व पर भारत का उपकार ही होगा। अगर इस दौरान मानवरति बमवर्षक या लड़ाकू विमानों के विकास को सीमित करने की बात होती है तो और भी अच्छा होगा। 

(लेखक भारत के पूर्व राजदूत एवं वर्तमान में सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के फेलो हैं)

First Published : August 30, 2022 | 10:10 PM IST