केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अधीन आने वाले राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने चालू वित्त वर्ष यानी 2022-23 की पहली तिमाही के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अपने अनुमान जारी कर दिए हैं। सबसे प्रमुख आंकड़ा यही है कि पहली तिमाही में स्थिर मूल्य पर जीडीपी में सालाना आधार पर 13.5 फीसदी की दर से वृद्धि दर्ज की गई। आधार प्रभाव के हिसाब से देखें तो यह भ्रामक रूप से ऊंचा स्तर है। यह याद रखने की आवश्यकता है कि पिछले वर्ष की समान तिमाही यानी अप्रैल-जून 2021 में ही कोरोना वायरस की दूसरी लहर आई थी जिसने पूरे देश में तबाही मचा दी थी।
हालांकि दूसरी लहर के दौरान पहली लहर जैसा कड़ा देशव्यापी लॉकडाउन नहीं लगाया गया था लेकिन लोगों के बीमार होने और मौत के मामले अधिक होने के कारण गतिविधियों में काफी धीमापन आया था। आधार प्रभाव को देखते हुए 13.5 फीसदी की वृद्धि दर स्पष्ट रूप से निराश करने वाली है। ज्यादातर अनुमान यही थे कि सालाना आधार पर जीडीपी में 15 से 16 फीसदी की वृद्धि दर्ज की जाएगी।
भारतीय रिजर्व बैंक ने पहली तिमाही में 16.2 फीसदी वृद्धि का अनुमान जताया था। ऐसे में अर्थव्यवस्था में वृद्धि की गति अनुमान से काफी कम है। यह निवेशकों और सरकार दोनों के लिए बहुत चिंतित करने वाली बात है। हालात में सुधार के साथ वृद्धि के आंकड़ों पर नजर डालने का एक तरीका यह भी है कि चालू वर्ष के जीडीपी के स्तर तथा महामारी के पहले के जीडीपी के आंकड़ों पर नजर डाली जाए। अगर महामारी वाले वर्षों यानी 2020 और 2021 को हटा भी दिया जाए तो भी 2022-23 की पहली तिमाही में जीडीपी की वृद्धि 2019-20 के स्तर से केवल 3.8 फीसदी अधिक है। इससे यह संकेत निकल सकता है कि या तो सुधार की प्रक्रिया व्यापक नहीं है या फिर महामारी के प्रभाव के अलावा भी भारत की वृद्धि को लेकर कुछ समस्या है। ज्यादा संभावना यही है कि यह दो समस्याओं का मिश्रण हो।
इन निराश करने वाले आंकड़ों के मद्देनजर वास्तविक चिंता क्या होनी चाहिए और भारत की वृद्धि की गति के बारे में इनसे यही बात निकलकर आती है कि वित्त वर्ष के बाकी हिस्से में सुधार की कोई खास गुंजाइश नहीं है। पहली बात तो यह कि आधार प्रभाव वर्ष के आगे बढ़ने के साथ ही नदारद हो जाएगा। उदाहरण के लिए आरबीआई को उम्मीद है कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में तिमाही वृद्धि का आंकड़ा घटकर 4 फीसदी रह जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो पूरे वर्ष के दौरान जीडीपी वृद्धि 7 फीसदी से अधिक रहने की आशा नहीं की जा सकती है।
आरबीआई द्वारा अनुमानित 7.2 फीसदी का स्तर तो दूर ही रह जाएगा। जुलाई माह के प्रमुख क्षेत्रों के आंकड़े भी जारी किए गए हैं और ये भी 4.5 फीसदी की मामूली वृद्धि दिखाते हैं। यह काफी हद तक पहली तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र के 4.8 फीसदी वृद्धि के आंकड़े के आसपास ही है। ध्यान रहे यह आंकड़ा भी बहुत कमजोर आधार प्रभाव के बीच आया है। अर्थव्यवस्था की वृद्धि की गति को लेकर यह महत्त्वपूर्ण चिंता है और इससे संकेत निकलता है कि चालू वित्त वर्ष के मध्य में तेज गिरावट देखने को मिल सकती है।
अंतिम चिंता यह है कि बीते कुछ महीनों में वैश्विक हालात कुछ ज्यादा ही प्रतिकूल हुए हैं। जैकसन होल में केंद्रीय बैंकरों के हालिया सम्मेलन से यह स्पष्ट हो गया कि ब्याज दरों की स्थिति सख्त बनी रह सकती है और इस वजह से भारत में पूंजी की आवक भी कठिन बनी रहेगी। आपूर्ति क्षेत्र की दिक्कतों, लंबी अवधि को ध्यान में रखकर किया गया पुनर्गठन और भूराजनीतिक तनाव के कारण ईंधन सहित जिंस कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहेंगी। ऐसे हालात में वृद्धि को बढ़ावा देने वाली नीति और मौद्रिक कदम दोनों काफी जटिल बने रहेंगे। सरकार को अर्थव्यवस्था में वृद्धि की गति वापस लाने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए व्यापक सुधारों का सहारा लिया जाना चाहिए।