Categories: लेख

कहीं चीन के हाथों हार न जाएं श्रम शक्ति की जंग

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 6:04 AM IST

विदेशों में जाने वाले दक्ष कामगारों में बड़ी संख्या भारतीय कामगारों की रही है। मैनपावर उपलब्ध कराने के मामले में भारत पिछले काफी समय से चोटी पर रहा है, पर लगता है चीन उसके इस वर्चस्व को बहुत जल्द तोड़ने में सफल हो जाएगा।


प्रमुख मैनपावर परामर्शदात्री इकाई वॉटसन व्याट के अनुसार चीन जिस हिसाब से पेशेवर तैयार करने में जुटा है, उससे तो यही लगता है कि इस क्षेत्र में भारत की दावेदारी को बहुत जल्द चुनौती मिल सकती है। इस इकाई के अनुसार कुछ ही समय में चीन भारत की तुलना में दोगुने दक्ष श्रमिक और कामगार तैयार करने लगेगा।

हालांकि, भारत के पास अब तक भारी संख्या में पेशेवर रहे हैं, यही वजह है कि यहां कारोबारी आउटसोर्सिंग को फलने फूलने में इतनी मदद मिली है। भारत के श्रम बाजार को आखिर क्यों चीन से खतरा है, इसके लिए यह परामर्शदात्री इकाई तीन कारण गिनाती है: इसकी सबसे पहली और बड़ी वजह है कि चीन की तुलना में भारत के पास अधिक बड़ी महिला आबादी रही है जो पेशेवर और दक्ष है।

और तो और अगर आप गांवों की ओर रुख करें तो पाएंगे कि ग्रामीण इलाकों में जहां 16 फीसदी पुरुष पेशेवर हैं, वहीं उनसे थोड़ा ही कम 14 फीसदी महिलाएं भी किसी न किसी काम के लिए प्रशिक्षित हैं। देश की कुल सात फीसदी दक्ष महिलाओं की सालाना विकास दर पुरुषों की तुलना में 1.5 गुना अधिक है। इसके बावजूद, भारत की तुलना में चीन में ज्यादा महिलाएं कार्यक्षेत्र में मौजूद होती हैं, यह अलग बात है कि चीन में दक्ष महिला कामगारों की संख्या भारत से कम है।

इसकी वजह है कि चीन में महिलाओं की काम में भागीदारी भारतीय महिलाओं की तुलना में दोगुनी है। भले ही भारत की महिलाओं को काम के लिए प्रशिक्षित किया जाता हो फिर भी इन दक्ष महिला कामगारों में से केवल 25 फीसदी ही श्रम बाजार में हिस्सेदारी करती हैं। दूसरी वजह है कि चीन शिक्षा के क्षेत्र में अधिक से अधिक संसाधन खर्च करने में जुटा हुआ है।

ज्यादा से ज्यादा संख्या में चीनी युवा कॉलेज और विश्वविद्यालयों का रुख कर रहे हैं। चीन शिक्षा व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बदलाव किया जा रहा है। अकेले नानजिंग में पिछले कुछ वर्षों के दौरान 30 नए विश्वविद्यालय खोले गए हैं। वॉटसन वयाट का कहना है, ‘जिस तेजी के साथ दुबई में होटल खुल रहे हैं, कुछ उसी रफ्तार से चीन में विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं।’

अनुमान है कि 2010 तक 2.3 करोड़ छात्र चीनी विश्वविद्यालयों में शिक्षा ग्रहण करेंगे और इनमें से 10 लाख के करीब की संख्या उच्च प्रशिक्षित स्नातक छात्रों की होगी। यह अपने आप में एक विशेष उपलब्धि है क्योंकि, 1992 में ऐसे छात्रों की संख्या महज छह लाख थी। मैनेजमेंट गुरु पीटर ड्रकर ने एक समय में कहा था कि चीन की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा थी कि यहां साक्षर लोगों की संख्या काफी कम थी। पर अब हालात ऐसे नहीं है।

वहीं इसकी तुलना में भारत की शिक्षा व्यवस्था में ठहराव देखने को मिलता है। विश्वविद्यालय जाने वाले छात्रों की संख्या में कोई खासी बढ़ोतरी नहीं हो रही है। भारत की जीडीपी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा शिक्षा के क्षेत्र में निवेश किया जाता है। इसे देखते हुए आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि आखिर क्यों चीन ने तीन साल पहले भारत में कॉलेज जाने वाले छात्रों की 31 लाख की सालाना संख्या को पार कर लिया था।

तीसरी बात है कि चीन में ज्यादातर छात्र इंजीनियरिंग, प्रबंधन और विज्ञान विषयों की पढ़ाई में दिलचस्पी दिखाते हैं। और दुनिया भर में भी इन विषयों की ही मांग सबसे अधिक है। साथ ही चीन के अधिकांश विश्वविद्यालयों में वैश्विक जुड़ाव स्थापित करने के लिए नियमित तौर पर अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस आयोजित किए जाते हैं और साथ ही विदेशों से प्रोफेसर बुलाकर कक्षाएं भी आयोजित कराई जाती हैं। अब जरा इसकी तुलना भारत से करें।

देश में भले ही कुकुरमुत्तों की तरह शैक्षणिक संस्थान खुल गए हों पर वैश्विक स्तर पर उनका जुड़ाव नहीं के बराबर है। पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारत पूरी बाजी हार चुका है। वॉटसन व्याट के अनुसार अब भी तीन ऐसे मोर्चे हैं जहां भारत की बराबरी करने में चीन को वक्त लगेगा। भारत में किसी भी प्रशिक्षित कामगार पर दूसरे शहरों या राज्यों में जाकर काम करने पर कोई पाबंदी नहीं है। जबकि चीन में कामगारों के लिए गतिशीलता एक बड़ा अवरोध है।

चीन में अब भी ‘हुकू’ व्यवस्था को माना जाता है जिसके तहत प्रशिक्षित कामगारों के लिए दूसरे विकसित इलाकों में जाकर काम करना उतना सहूलियत भरा नहीं होता है। उदाहरण के लिए किसी टियर 2 शहर से स्नातक करने वाला कोई छात्र अगर शंघाई में जाकर काम करना चाहे तो उसके रास्ते में काफी अड़चनें होंगी। आमतौर पर नियोक्ताओं को इसके लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता है कि वे दूसरे इलाकों या प्रांतों से कामगारों को अपने यहां भर्ती करें।

ऐसे में होता यह है कि ज्यादातर नियोक्ता स्थानीय कामगारों को ही अपने यहां भर्ती कर लेते हैं और सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा की खोज में यह एक बड़ी बाधा बनती है। दूसरी बात यह है कि चीनी छात्र जो विदेशों में पढ़ाई करने के लिए जाते हैं उनमें से काफी कम ही देश में वापस लौट कर आते हैं। वहीं दूसरी ओर अध्ययन से पता चला है कि बेहतर घरेलू संभावनाओं की वजह से अब भारतीय छात्र जो विदेशों में शिक्षा ग्रहण करते हैं वापस अपने देश लौटने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

अब तीसरी और सबसे बड़ी बाधा जो चीन के रास्ते में है वह है यहां के लोगों में अंग्रेजी का कमजोर ज्ञान। यही वजह है कि चीन में बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपना कारोबार स्थापित करने से कतराती हैं। अगर टेस्ट ऑफ इंगलिश ऐज ए फॉरेन लैंगवेज (टीओईएफएल) के औसत स्कोर को देखें तों पता चलता है कि सभी विषयों में भारतीय छात्रों की तुलना में चीनी छात्रों का प्रदर्शन कमजोर रहा है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि चीन में भारत की तुलना में छात्रों को अंग्रेजी की शिक्षा देर से दी जाती है।

First Published : June 18, 2008 | 10:47 PM IST