मुल्क की 40 करोड़ की कुल कामकाजी आबादी में से केवल डेढ़ से दो करोड़ लोग ही रिटायरमेंट के बाद के लिए पैसे सुनियोजित तरीके से बचा पा रहे हैं। यह काफी कम संख्या है।
ऐसा इसलिए क्योंकि रिटायरमेंट के वक्त इन लोगों में से हरेक को 52 हजार रुपये मिल पाते हैं। इनमें से भी ऐसे लोगों की तादाद काफी कम है, जो उतने वक्त तक पैसे जमा कर पाते हैं, ताकि उन्हें जीवन भर ज्यादा से ज्यादा 3,250 रुपये की पेंशन मिल सके।
फिर भी इनवेस्ट इंडिया फाउंडेशन के आईआईएमएस डाटावर्क्स सर्वे की मानें तो मुल्क में केवल आठ करोड़ कामगार ही ऐसे हैं, जो रिटायरमेंट फंड में पैसे जमा करना चाहते हैं। वह भी ऐसे दौर में जब बच्चों द्वारा अपने बूढ़े माता-पिता का भार उठाने की परंपरा टूटती जा रही है। तो ऐसी कौन सी वजह है, जिस कारण लोग-बाग पेंशन फंड में पैसे जमा नहीं करना चाहते हैं?
असल में वजह कोई और नहीं बल्कि वह संगठन ही है, जिसके पास मुल्क में पेंशन फंड को संभालने का एकाधिकार है। मतलब, खुद कर्मचारी भविष्यनिधि संगठन (ईपीएफओ)। 1990 के दशक के बाद से तो मोटी ब्याज दरों का जमाना पूरा हो गया और प्राइवेट म्युचुअल फंड अच्छे-खासे रिटर्न देने लगे। लेकिन ईपीएफओ ने अपने काम करने के तरीके को नहीं बदला। मुल्क के वित्त बाजार से तो लोग मालामाल हो गए, लेकिन ईपीएफओ ने मुनाफा कमाने के मामले में बदतर ट्रैक रिकॉर्ड जारी रखा।
लोगों को बेहतर सर्विस देने के मामले में इसका ट्रैक रिकॉर्ड इतना खराब है कि यह अब अपने खातेदारों को एक यूनिक कस्टमर आईडी तक मुहैया नहीं करवा पाई है, जिससे लोग अपने खातों के बारे में जब चाहें तब जान सकें। इसी वजह से इसके ज्यादा खातेदारों के पास दो-दो, तीन-तीन खाते हैं। उन खातों को मैनेज करना तो काफी मुश्किल हो ही जाता है। साथ ही, कई लोग इसमें पैसे जमा कराने के फायदों को भी नहीं उठा पाते।
ऐसा इसलिए क्योंकि मासिक पेंशन हासिल करने के लिए लोगों को कम से कम दस साल तक एक ही अकाउंट में पैसे जमा कराने होते हैं। इसके अलावा, कई दिक्कतें और भी हैं। सबसे बड़ी दिक्कत तो पेंशन स्कीम में ईपीएफओ का 25000 करोड़ रुपये को पार कर चुका घाटा है, लेकिन इससे लोगों से ज्यादा सरकार परेशान है। अब उसके घाटे को पाटने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही है न। इसी घाटे को पाटने के लिए तो 2005 के शुरुआत में सरकार ने पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण बिल संसद में भेजा था। इससे नए पेंशन फंड मैनेजरों को भी बाजार में उतरने की इजाजत मिल जाती।
इससे सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह के नए पेंशन फंड मैनेजरों को ईपीएफओ से दो-दो हाथ करने का मौका मिल जाता। पेंशन फंड मैनेजरों के इस नए बाजार पर नजर रखता पेंशन फंड नियामक और विकास प्राधिकरण, ताकि कामगारों का पैसा सुरक्षित रहता। लेकिन वामदलों ने इस मामले पर लालझंडी दिखा दी और इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
अप्रैल में तस्वीर एक बार फिर बदली जब खुद ईपीएफओ ने सात फंड मैनेजर कंपनियों से अपने फंड को मैनेज करने के लिए बोलियां मंगवा लीं। वैसे ईपीएफओ के सेंट्रल ट्रस्टी बोर्ड के कुछ बड़े नाम संगठन के इस कदम के सख्त खिलाफ हैं, लेकिन अगर अब संगठन ने अपने पांव वापस खींच लिए तो यह मुल्क के करोड़ों कामगारों की किस्मत के साथ मजाक से कम नहीं होगा।