पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन पर भारत की राष्ट्रीय कार्य योजना जारी की। हम में से ज्यादातर लोग जो पर्यावरण और जलवायु विषय से जुड़े हैं, उनका शायद यह मानना होगा कि इस योजना में कुछ भी नया या ठोस नहीं है।
पर मैंने जब इस योजना को पहली बार देखा और इसे समझने की कोशिश की तो मुझे लगा कि भारत के पास अब भी ढेरों अवसर हैं कि वह अपने विकास को एक नया रुख दे सके। इसके पीछे एक वजह यह भी है कि देश अभी विकास के शुरुआती दौर में है, इस वजह से वह अपनी विकास को गाथा को मनमुताबिक बदल भी सकता है।
या फिर इसे दूसरे शब्दों में कहें तो भारत के पास मौका है कि वह कार्बन का कम उत्सर्जन करने वाली यानी लो-कार्बन अर्थव्यवस्था बनने के मामले में दूसरों से आगे बढ़े और उभरती तकनीकों का इस्तेमाल कर अपने विकास की एक अलग कहानी लिखे। साथ ही इस कार्ययोजना में सौर ऊर्जा से लेकर जलवायु शोध तक आठ बिंदुओं को शामिल किया गया है, जिन पर गहन विचार के बाद जलवायु परिवर्तन पर गठित प्रधानमंत्री परिषद की ओर से निगरानी रखी जाएगी। इस कार्य योजना की कुछ खास बातें हैं।
हमें यह साफ पता होना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना किसी एक देश की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि यह एक वैश्विक चुनौती है। पर यह देखने लायक है कि भारत इस मसले पर बाकी देशों को किस नजर से देखता है। इस संकट को पैदा करने में भारत का बहुत अधिक हाथ नहीं रहा है, न ही हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में हम सबसे आगे रहे हैं। अगर हम यह कहें कि जलवायु परिवर्तन के पीड़ितों में हम सबसे आगे रहे हैं तो यह गलत नहीं होगा।
चूंकि क्षेत्रफल और जनसंख्या के लिहाज से हम काफी आगे हैं तो साफ है कि हम पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ेगा। तापमान बढ़ने की वजह से हमें नुकसान हो रहा है और इससे हिमालय की बर्फ भी पिघल रही है। यहां यह भी साफ करना जरूरी है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जो अंतरराष्ट्रीय नियम कानून बनाए जा रहे हैं, उनका कोई बुनियाद नहीं है। ये कानून स्वार्थ से भरे हुए हैं। अमीर देशों ने पहले इस बात पर सहमति जताई थी कि इस संकट को पैदा करने में जिन देशों का जितना अधिक योगदान रहा है, इसे दूर करने में भी उनका उतना ही अधिक योगदान रहेगा।
पर अब ये देश जलवायु परिवर्तन से जुड़े कड़वे अध्यायों को समझने लगे हैं। उनके देश से जितना ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, वह पिछले 15 सालों में और बढ़ा ही है। यह अलग बात है कि वह समय समय पर संकट से निपटने के लिए वादे करते रहे हैं। पर अब उनका नजरिया थोड़ा बदल गया है। वे चाहते हैं कि इस संकट को दूर करने में उनके योगदान की प्रशंसा भी हो और उनका आर्थिक विकास भी बाधित न हो। विकास की दौड़ में वे हमेशा आगे बने रहें। जलवायु परिवर्तन से मुकाबले के लिए जो रणनीतियां बनाई गई हैं उनके कई पहलू हैं और इसके पीछे कई खिलाड़ी भी हैं।
अमेरिका का योगदान इस संकट को पैदा करने में सबसे अधिक रहा है, फिर भी वह चीन, भारत और कुछ दूसरे उभरते देशों पर यह इलजाम लगाता आया है कि अगर ये देश संकट से निपटने के लिए कोई कदम नहीं उठाते हैं तो वह भी कोई पहल नहीं करेगा। यह जानना भी जरूरी है कि अमेरिका अकेले एक चौथाई गैसों का उत्सर्जन करता है, जिसमें पिछले 15 सालों के दौरान 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। दूसरे इसमें जापान, जो कि ऊर्जा की कारगर खपत की दौड़ में सबसे आगे है, के लिए भी एक वैकल्पिक रोड मैप का प्रावधान है जो उसके उद्योगों के लिए फायदेमंद होगा।
जलवायु परिवर्तन के इस नाटक के लिए मंच सज धज कर तैयार हो चुका है और अब बारी किरदारों के अभिनय की है। चलिए जरा रुख करते हैं हाल की कुछ घटनाओं की ओर। पिछले साल जुलाई में जर्मनी में जी-8 शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया था, जिसमें दुनिया के अमीर देशों ने इस बात पर सहमति जताई थी कि, ‘वे 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 50 फीसदी तक कम करने के लिए गंभीरता से विचार करेंगे।’
दिसंबर में बाली, इंडोनेशिया और यूरोपीय यूनियन ने बड़े ही चिंतन भरे अंदाज में सम्मेलन में यह प्रस्ताव पेश किया कि 1990 में गैस उत्सर्जन का जो स्तर था, उसे औद्योगिक देश 2020 तक 25 से 40 फीसदी कम कर लें। पर इस बैठक में कुछ खास निष्कर्ष निकल कर नहीं आया। विभिन्न देश बस इसी बात पर विचार करते रह गए कि आखिर कैसे गैसों के उत्सर्जन को लेकर कोई लक्ष्य तय किया जाए। उसके बाद फरवरी में जी-8 समूह का मुखिया जापान यह प्रस्ताव लेकर आया कि 2050 तक अगर कुल उत्सर्जन में कटौती के लिए कोई लक्ष्य तय नहीं किया जा सकता तो कम से कम अलग अलग क्षेत्रों के हिसाब से तो गैसों के उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य तैयार कर ही लिया जाए।
इस प्रस्ताव के क्रियान्वयन के लिए जरूरी था कि सबसे पहले यह तय किया जाए कि कौन से ऐसे क्षेत्र हैं जहां से सबसे अधिक गैसों का उत्सर्जन होता है। उसके बाद जिम्मेदार देश ये सुनिश्चित करें कि वे उन क्षेत्रों में उन्नत तकनीकें उपलब्ध कराएं ताकि इन उद्योगों से हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कमी देखने को मिल सके। इसमें भारत जैसे देश को भी शामिल किया गया था जिससे इस वादे की अपेक्षा की गई थी कि वह उन उद्योगों की पहचान करेगा जिनसे सबसे अधिक गैसों का उत्सर्जन होता है। इन क्षेत्रों की पहचान के बाद यह भी जरूरी है कि यहां ऐसे तकनीकों का इस्तेमाल किया जाने लगे जो ज्यादा से ज्यादा पर्यावरण के अनुकूल हैं।
अब इन तकनीकों को खरीदने के लिए यह भी आवश्यक है कि इनकी दरों को कम किया जाए। यह एक ऐसा कदम हो सकता है जो गरीब देशों के लिए वरदान साबित हो। ऐसे गरीब देश जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं उन्हें उच्च कोटि की तकनीक सस्ती दर में उपलब्ध कराना। इससे उनका नुकसान नहीं बल्कि उनका भला ही होगा। इस अवधि में अमेरिका ने जलवायु परिवर्तन मसले पर दूसरे देशों को घेरने की अच्छी योजना तैयार कर ली है। उसने तमाम ऐसे देश जो इस संकट के लिए जिम्मेदार हैं (इसमें चीन और भारत भी शामिल है) को एक श्रेणी में ला खड़ा किया है।
उसका कहना है कि अमीर देशों को इस बात की इजाजत है कि अगर ये देश गैसों के उत्सर्जन पर रोक नहीं लगा पाते तो उनके खिलाफ कार्रवाई करें। उसने भारत को भी कहा है कि अगर वह उसके गुट में शामिल हो जाता है तो उसे कोई वादा करने की जरूरत नहीं होगी। पर यहां भी शायद अमेरिका अपनी बात पर कायम नहीं रह पाया और उसने दूसरा राग अलापना शुरू कर दिया। पहले जो देश चीन और भारत को रियायत देने को तैयार था वह भी अब अन्य देशों के लिए उदाहरण पेश करते हुए कोई लक्ष्य तय कर ले।