जब कोई खस्ताहाल कंपनी बंद होने के कगार पर पहुंचती है तो उस पर ताला लगाए जाने से पहले कई ऐसी कानूनी अड़चनें आती हैं जो उसे जकड़ने लगती है।
औद्योगिक एवं वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) की जो प्रक्रियाएं होती हैं वह अपने आप में काफी लंबी और खीझ दिलाने वाली होती हैं। लेनदारों में इस बात को लेकर उठापटक होने लगती है कि किन्हें पैसा पहले लौटाया जाएगा।
लड़ाई तब भी खत्म नहीं होती जब आधिकारिक परिसमापक (लिक्विडेटर) संपत्ति की ब्रिकी की घोषणा कर देता है। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कुछ फैसले सुनाए हैं जिनसे यह पता चलता है कि कंपनी की संपत्ति की नीलामी के बाद भी कई दफा प्रतिभागियों के बीच कानूनी लड़ाई चलती ही रहती है।
हालांकि इन फैसलों में कानून को समझाने की कोशिश की गई है फिर भी ऐसे मामलों में आखिरी फैसला जैसी कोई बात सामने नहीं आई है और नीलामी में भाग लेने वाले प्रतिभागियों के पास अब भी यह मौका है कि वे किसी नीलामी से असंतुष्ट होने की स्थिति में उसे चुनौती दे सकें।
आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि जो सबसे ऊंची बोली लगाता है संपत्ति पर अधिकार उसी का होता है। हालांकि कुछ मामलों में ऐसा भी देखने को मिला है कि अदालत को अगर यह लगा कि नीलामी में कोई गड़बड़ी की गई है तो वह कंपनी जज को दोबारा से नीलामी करवाने का आदेश देती है।
साथ ही कई बार ऐसा भी होता है कि नीलामी के पहले संपत्ति का मूल्यांकन सही तरीके से नहीं किया गया होता है या फिर नीलामी के बाद भी संपत्ति के लिए ऊंचे दाम मिलते हैं। ऐसे में भी अदालत फिर से नीलामी करवाने का फैसला सुनाती है। ऐसा ही कुछ पिछले महीने एफसीएस सॉफ्टवेयर सॉल्यूशंस लिमिटेड बनाम ला मेडिकल डिवाइसेज लिमिटेड की सुनवाई के दौरान देखने को मिला।
उच्चतम न्यायालय ने बिक्री को स्थगित कर दिया जबकि आधिकारिक परिसमापक ने एफसीएस की बोली को मंजूरी दी थी जिसने सबसे ऊंची बोली लगाई थी। पर अदालत ने फिर भी बिक्री को रद्द इसलिए कर दिया क्योंकि बिक्री की घोषणा करते वक्त संभावित खरीदारों (प्रतिभागियों) को सभी आवश्यक जानकारियां मुहैया नहीं कराई गई थीं।
साथ ही कुछ सूचनाएं बिक्री नोटिस जारी करते वक्त भी स्पष्ट नहीं की गई थीं। ये जानकारियां संयंत्र और मशीनरी के मूल्य निर्धारण के लिए जरूरी थीं। इस फैसले में अदालत ने कहा, ‘यह जरूरी है कि अदालत संपत्ति के मूल्यांकन से खुद संतुष्ट हो।
एक बार अगर अदालत को लगता है कि संपत्ति के लिए जिस कीमत की पेशकश की गई है वह सही है तो भले ही आगे कोई दूसरा प्रतिभागी उस संपत्ति के लिए ज्यादा कीमत की पेशकश क्यों न करे नीलामी को रद्द नहीं किया जाता है।’ अदालत ने इस मामले में फैसला सुनाते वक्त 2000 के यूनियन बैंक ऑफ इंडिया बनाम आधिकारिक परिसमापक मामले के निर्णय को ध्यान में रखा था।
यूनियन बैंक के मामले में कंपनी अदालत ने लेनदारों के लिए बचाव पक्ष के तौर पर काम किया था। यह कंपनी अदालत की जिम्मेदारी है कि वह मूल्यांकन रिपोर्ट का खुलासा करते हुए यह बताए कि जो कीमत तय की गई है वह सही है या नहीं।
करीब 15 दिन पहले इसी सिद्धांत को आईएफसीआई लिमिटेड बनाम विष्णु कांत गुप्ता के मामले में दोहराया गया था। इस मामले में एक बीमार चीनी कारखाने को खरीदने के लिए गुप्ता ने सबसे अधिक की बोली लगाई थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उसके प्रस्ताव को मंजूरी भी दे दी।
हालांकि, कारखाने के खरीद के लिए जिन दूसरे प्रतिभागियों ने बोली लगाई थी उन्होंने याचिका दायर कर दी और बिक्री को 6 साल तक के लिए रोक दिया गया। ऐसे में खरीद के लिए और ऊंची कीमतें लगाई जाने लगीं और बोली के लिए नए उम्मीदवार भी आने लगे। कंपनी जज ने हालांकि ऊंची बोली को दरकिनार कर दिया और उस पर ध्यान नहीं दिया।
जब इस मामले को लेकर अपील की गई तो खंडपीठ को लगा कि कंपनी जज गलत थे। उच्चतम न्यायालय ने इस बारे में कहा कि भले ही एक समय में सबसे ऊंची बोली को स्वीकार कर लिया गया था पर इसका मतलब यह नहीं है कि बाद में उससे अधिक की बोली पर ध्यान ही न दिया जाए। इस फैसले के बाद बोली लगाने वालों के बीच जो विवाद था, उसका समाधान मिला।
ऐसा ही एक मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की एक पीठ में हुई थी। मामला वालजी खीमजी ऐंड कॉरपोरेशन बनाम आधिकारिक परिसमापक का था, जिसमें गुजरात उच्च न्यायालय के कंपनी जज ने सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को संपत्ति का अधिकार सौंप दिया था। पर तब कुछ दूसरे प्रतिद्वंद्वियों ने बढ़कर बोली लगाई और कंपनी जज के पास अपील की। कंपनी जज ने पुराने फैसले पर विचार किया।
जब इस मामले को उच्चतम न्यायालय के पास ले जाया गया तो यह फैसला आया, ‘अगर किसी बिक्री पर मुहर लगा दी गई है तो सामान्य परिस्थितियों में उस पर किसी आपत्ति पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए पर अगर बिक्री में कोई धोखाधड़ी की गई हो तो नीलामी पर फिर से विचार किया जा सकता है। अगर हर आपत्ति पर ध्यान दिया जाने लगा तो कोई नीलामी कभी पूरी ही नहीं हो पाएगी क्योंकि नीलामी होने के बाद कोई भी दूसरा प्रतिभागी आकर ऊंची कीमत का प्रस्ताव पेश कर सकता है।’
केजे इंडस्ट्रीज बनाम ऐसनयू ड्रम्स (1974) मामले में अदालत ने चेतावनी दी कि, ‘अगर ऊंची कीमत पाने के लिए नीलामी को आए दिन रद्द किया जाता रहा तो इससे खुद को ही परेशानी होगी क्योंकि उद्योगपतियों को नीलामी पर भरोसा ही नहीं रह जाएगा और वे यह सोचकर नीलामी की जगह पर जाने की जहमत ही नहीं उठाएंगे कि आगे जाकर इस पर आपत्ति उठाई जाएगी और इसे भी रद्द कर दिया जाएगा।’
दिव्या मैन्युफैक्चरिंग कंपनी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में एक दूसरा विचार उभर कर आया। इस मामले में जो फैसला सुनाया गया उसमें कहा गया कि अगर कोई नीलामी पूरी हो चुकी है तो भी उसे रद्द किया जा सकता है, अगर इसके लिए उचित कीमत नहीं चुकाई जा रही हो तो।