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चुनावी भूलभुलैया में उलझे आर्थिक सुधार

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:01 PM IST

पिछले सप्ताह सत्तासीन साझा सरकार ने विश्वास प्रस्ताव में विजय हासिल कर ली है, लेकिन वह व्यापक स्तर पर समस्याओं के समाधान के लिए कुछ नहीं कर सकती है।


मीडिया ने इस तरह के कयास लगाए हैं कि सुधार की प्रक्रिया फिर से गति पकड़ेगी, लेकिन ऐसा नहीं लगता। सही हो या गलत, चुनावी मौसम में सुधार की प्रक्रिया ऐसा मुद्दा नहीं है जो वोटों को जुटा सके, और आम चुनाव 2009 के मध्य में होना निर्धारित है।

हालात को देखते हुए ऐसा लगता है कि आर्थिक उदारवाद जैसा मुद्दा कांग्रेस नेताओं के लिए कम ही महत्त्वपूर्ण होगा। सरकार का नेतृत्व करने वाले लोग इस मसले पर पार्टी और अपने सहयोगी दलों को समझाने और परमाणु समझौते पर उनका समर्थन हासिल करने के लिए पहले ही बहुत ज्यादा खून-पसीना बहा चुके हैं।

इस बीच हालत यह है कि बड़ी समस्याएं बरकरार हैं। विकास दर गिर रही है। इसके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही कारण हैं। वहीं महंगाई दर भी 12 प्रतिशत के करीब बनी हुई है- इसकी वजह से भी समस्याएं बढ़ी हैं, जिसके निम्न कारण हो सकते हैं-

तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों का प्रभाव घरेलू कीमतों और चार प्रमुख पेट्रो-उत्पादों पर नजर आने लगा है।
उद्योग जगत द्वारा खुद स्टील की कीमतें कम किए जाने के फैसले की समयसीमा अब खत्म होने ही वाली है, इससे कीमतें बढ़ेंगी और घरेलू तथा आयातित कीमतों में अंतर खत्म करने की कोशिश होगी।
हाल के महीनों में पहले से घोषित महंगाई दर से अगली घोषणा में इसमें बढ़ोतरी ही हुई है।
वार्षिक आधार पर थोक मूल्य सूचकांक में बेस इफेक्ट भी बढ़त दिखा रहा है।

अगर महंगाई के लिहाज से देखें तो केवल एक ही सकारात्मक पहलू नजर आता है। बीते दो सप्ताह में पेट्रोलियम पदार्थों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम हुई हैं और अब वह 125 डॉलर प्रति बैरल के आस पास है। लेकिन इसे भी शुरुआती रुझान ही माना जा सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में, मैं इस संभावना को भी खारिज नहीं कर सकता कि राष्ट्रपति बुश अपने कार्यकाल के बचे हुए कुछ महीनों के दौरान ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले करेंगे। स्वाभाविक है कि अगर इस तरह की कोई कार्रवाई होती है, तो पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें नई ऊंचाइयां छुएंगी।

हाल ही में जारी वैश्विक आर्थिक परिदृश्य (डब्ल्यूईओ) में आईएमएफ ने भविष्यवाणी की है कि वैश्विक विकास में परिवर्तन आएगा और इसके साथ ही महंगाई में बढ़ोतरी होगी। डब्ल्यूईओ में कहा गया है, ‘वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय बुरे दौर से गुजर रही है। ज्यादातर विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों में मांग में कमी आ गई है और हर तरफ महंगाई बढ़ रही है। यह उभरती हुई र्अथ्व्यवस्था और विकासशील अर्थव्यवस्था में प्रभावी है… ज्यादातर उभरती अर्थव्यवस्थाओं में मौद्रिक नीति को कड़ा किया गया है और वित्तीय प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसके साथ ही परिवर्तनीय विनिमय दर प्रबंधन लागू किया गया है।’

आईएमएफ द्वारा सुझाए गए तीन उपचारों पर विचार करना बेकार है। इसके पहले भी हमने लिखा है कि मौद्रिक नीति का कीमतों पर पड़ने वाले असर के मामले में मेरी सोच निराशाजनक ही है- जब तक कि बहुत ज्यादा कड़ाई न बरती जाए। यह विश्वास मौद्रिक नीति द्वारा महंगाई पर असर डालने के लिए किए गए पिछले फैसलों से और भी पुष्ट हो जाता है। हाल ही में अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बर्नान्के ने स्पष्ट रूप से कहा था कि किस तरह से केंद्रीय बैंक द्वारा लिए गए फैसले प्रभावित करते हैं और किस तरह का प्रभाव बाद में पड़ता है।

(श्रीमती थैचर के पहले चांसलर ऑफ एक्सचेकर ने भी बाद में अपनी गलती स्वीकार की थी। थैचर प्रशासन ने मौद्रिक उपायों को बहुत भरोसे के साथ शुरू किया था और उन्हें इसके प्रभाव पर बहुत भरोसा था कि महंगाई को रोके रखा जा सकता है। चांसलर ने बाद में स्वीकार किया कि वे विभिन्न मौद्रिक उपायों को लागू करने के बारे में भ्रम की स्थिति में थे। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा था कि कौन से कदम उठाए जाएं और उनका कीमतों पर वास्तविक प्रभाव क्या होगा।) कमोबेश कुछ लोग यह उम्मीद करते होंगे कि वर्तमान महंगाई दर को मौद्रिक नीतियों को कड़ा किया जाना चाहिए।

बहरहाल इस समय सरकार के लिए मध्य वर्ग के लोग चुनावी लिहाज से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं जो बड़ी संख्या में हाउसिंग लोन लेते हैं। अगर ब्याज दरों मंव बढ़ोतरी की जाती है, तो इन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। क्या विनिमय दर में बढ़ोतरी बरकरार रखनी चाहिए, जैसा कि कुछ लोग इसकी वकालत कर रहे हैं? मै उम्मीद करता हूं कि ऐसा नहीं होना चाहिए। पहला कारण यह है कि विनिमय दर में बढ़ोतरी का कीमतों पर प्रभाव सीमित है।

दूसरी बात यह है कि हम देख रहे हैं कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में चालू खाता घाटा जीडीपी का 4 प्रतिशत है। ऐसा इसके बावजूद है कि तेल की कीमतें बढ़ी हैं, गुड्स और सेवा क्षेत्र के निर्यात में विकास दर कम हुई है और इस समय पोर्टफोलियो पूंजी प्रवाह भी सुरक्षित है। क्या आप जानते हैं कि रुपये के मजबूत होने से किसे खामियाजा भुगतना पड़ा है? इसका प्रभाव तिरुपुर के अस्थायी कर्मचारियों को भुगतना पड़ा है, जिनकी नौकरियां चली गईं, गुजरात में हीरे की तराशी और पालिश करने वाले लोगों की मजदूरी एक तिहाई घटी है और एसएमई क्षेत्र के उनके सहयोगियों पर प्रभाव पड़ा है।

वृहद अर्थव्यवस्था को देखें तो वित्तीय हालत कमजोर हुई है। वास्तव में यही कारण है कि रेटिंग एजेंसी फिच ने दो हफ्ते पहले भारत की घरेलू मुद्रा की रेटिंग में परिवर्तन दिखाया है। अगर ढंग से देखा जाए तो बजट के बाहर जो बॉन्ड जारी किए गए हैं उन्हें जोड़ने से कुल घाटा जीडीपी के 8 प्रतिशत से ऊपर जा सकता है। ऐसा उस स्थिति में हो रहा है जब आर्थिक नीतियों का निर्धारण ड्रीम-टीम द्वारा किया जा रहा है, जिसमें प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष शामिल हैं।

First Published : July 29, 2008 | 11:06 PM IST