भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को रेपो रेट 0.25 फीसदी बढ़ाने की घोषणा की और यह 7.75 फीसदी से बढ़कर 8 फीसदी हो गया।
रेपो रेट वह दर है जिस पर केंद्रीय बैंक, वाणिज्यिक बैंकों को कर्ज देता है। हालांकि आरबीआई का यह कदम अप्रत्याशित नहीं था।
महंगाई की दर के बेकाबू होकर पिछले कुछ हफ्तों के दौरान 8 फीसदी से भी ऊपर चले जाने और 2007-08 के संशोधित आंकड़ों के अनुसार जीडीपी की दर 9 फीसदी रहने के बाद साफ लग रहा था कि जल्द ही सख्त मौद्रिक नीति लागू की जाएगी।
वक्त की बात थी, विकास दर में तेजी का रुख है, तो ऐसे में स्वाभाविक ही है कि आरबीआई का ध्यान अब महंगाई रूपी राक्षस पर ही होगा। इसी वर्ष अप्रैल में आरबीआई ने सीआरआर (नकद सुरक्षित अनुपात) में बढ़ोतरी की थी, पर इस बार उसने ऐसा करने की बजाय रेपो रेट बढ़ाना उचित समझा। मकसद साफ है। आरबीआई को अब आर्थिक विकास में मंदी का डर नहीं सता रहा है।
मार्च के औद्योगिक उत्पादन के नतीजों को देखने के बाद शायद कोई भी आरबीआई के इस कदम का विरोध कर सकता था। मार्च 2008 के दौरान औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में महज तीन फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी, जो सरकार के लिए एक बड़ा झटका था। हालांकि, इस बात का अंदेशा तो पहले से ही था कि इस क्षेत्र में मंदी का रुख रहेगा, पर विकास दर इतनी कम रहेगी इसका अनुमान तो नहीं था।
हालांकि आईआईपी के अप्रैल महीने के नतीजों ने उसके इस कदम को सही ठहरा दिया है। आरबीआई की इस घोषणा के ठीक एक दिन बाद अप्रैल के आईआईपी के नतीजे जारी किए गए हैं और सूचकांक में 7 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। हालांकि यह आंकड़ा भी उत्साहजनक नहीं है, पर अर्थव्यवस्था के लिए इसे सुकून वाला तो माना जा ही सकता है।
पूंजीगत वस्तुओं, व्यावसायिक वाहन, मशीनरी और उपकरणों में अप्रैल में 14 फीसदी से भी अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 2007-08 में मशीनरी और उपकरण क्षेत्र का प्रदर्शन शानदार रहा है। इससे संकेत मिलता है कि लंबी अवधि तक विकास को लेकर निवेशकों में उत्साह है। इस विचार को आईआईपी के आंकड़ों ने और पुख्ता किया है। अब सबसे अहम सवाल है कि क्या रेपो रेट बढ़ाने से महंगाई पर लगाम लगाना मुमकिन हो पाएगा?
इतना तो साफ है कि मौजूदा परिस्थितियों में रेपो रेट बढ़ाने से बैंकों पर ऋण देने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का दबाव बढ़ेगा। हाल के कुछ हफ्तों में पूंजी का प्रवाह विदेशों की ओर बढ़ा है। इसका ही नतीजा है कि घरेलू बाजार में तरलता की कमी देखने को मिल रही है।
भले ही एकबारगी बैंक इन परिस्थितियों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी न भी करें तो कम से कम वे इसमें कटौती भी नहीं कर पाएंगे। कहना गलत नहीं होगा कि आरबीआई ने बड़ी सूझ बूझ से एक आक्रामक कदम उठाया है। हो सकता है कि इससे विकास दर थोड़ी धीमी हो, पर बढ़ती महंगाई पर कुछ लगाम लगने की तो उम्मीद है ही।