अपने इंडॉर्समेंट के लिए सेलिब्रिटी को बेहद अचूक हथियार की भांति इस्तेमाल करने वाली कंपनियां क्या आगे भी इसे बतौर औजार इस्तेमाल करते रहना बरकरार रखेंगी, यह एक दिलचस्प सवाल बन चुका है।
जिस कदर सेलिब्रिटी की फीस में बढ़ोत्तरी हो रही है, उससे कम से कम ऐसी उम्मीद तो नही रखी जा सकती है। बात हम अगर फोर्ड फियेस्टा के ‘गो फिदा’ कैंपेन की करें, तो इससे उसकी बाजार हिस्सेदारी में किसी प्रकार का कोई इजाफा नही हुआ है। याद रहे कि इस कैंपेन के लिए कंपनी अभिषेक बच्चन की मदद ली गई थी।
मीडिया ई2ई के मुताबिक छोटे बजट वाले विज्ञापन कुल 75 करोड़ रुपये खर्च कर सकते हैं। लेकिन इनके कुल बजट की 24 फीसदी रकम तो बड़े सितारों की फीस ही देने में निकल जाती है। मसलन शाहरुख खान की ही बात करें। वह आज से तीन साल पहले तक बतौर फीस एक से दो करोड़ रुपये लिया करते थे, लेकिन अब उनकी फीस दिन दुनी, रात चौगुनी रफ्तार से बढ़कर छह करोड़ हो चुकी है।
इस वक्त वह कुल 39 ब्रांडों को इंडॉर्स कर रहें हैं, जबकि 2003 में वह केवल आठ ब्रांडों के लिए विज्ञापन किया करते थे। उनके बाद अमिताभ बच्चन का नंबर आता है, जो 36 ब्रांडों के विज्ञापनों में दिखते हैं, जबकि धोनी 24 और सचिन 21 ब्रांडों की इंडॉर्समेंट कर रहे हैं। सचिन अपने कद के हिसाब से पांच करोड़ ले रहे हैं।
लेकिन ध्यान खींचने वाली बात यह है कि युवराज सिंह जैसे अपेक्षाकृत कम मशहूर खिलाड़ी भी आज की तारीख में तीन करोड़ रुपये तक बतौर फीस डिमांड रहे हैं। इतना ही नहीं इनके विज्ञापनों को टीवी पर प्राइम टाइम पर दिखाने के लिए कंपनियों ने कुल 7,000 करोड़ रुपये का बजट तैयार किया है। लिहाजा जिन कंपनियों का मार्केटिंग बजट बडा है, वे तो यह झेल लेते हैं।
लेकिन छोटे बजट वालों के लिए यह किस हद तक कामयाब रहता है, यह गौर करने वाली बात है। इस बारे में एडफैक्टर कंपनी के क्रिएटिव हेड आशीष नंदी का कहना है कि बड़े सितारों के इंडॉर्समेंट हर वक्त काम नही करते। वहीं दूसरे बाजार विशेषज्ञ अमोल गाडगिल का कहना है कि ये महज एक तात्कालिक असर ही पैदा कर पाता है।
कुछ ऐसे ही तर्क फिक्की की रिपोर्ट में भी बयां किए गए हैं। इसके मुताबिक महंगाई ज्यादा होने से बने माहौल और मांग में गिरावट के आसार होने के कारण स्टारों को विज्ञापनों में लेने का काम खासा खर्चीला हो गया है। आशीष नंदी के मुताबिक यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें सेलिब्रिटी कंपनियों का खून तक चूस लेते हैं। वो तो पैसा बनाते चले जाते हैं, लेकिन ब्रांड खस्ताहाल हो जाते हैं।
लेकिन स्थिति बिल्कुल ऐसी भी नही है कि सेलिब्रेटियों का कोई असर नही होता है। मोटोरोला इंडिया के वाइस प्रेसीडेंट लॉयड मेथिस (बिक्री एवं विपणन) के मुताबिक पहला मेड इन इंडिया हैंडसेट सी 115 की बात करें तो यह अभिषेक के व्यक्तित्व और उनकी ‘टेक्नो-फ्रेंडली’ इमेज का ही असर था, जिसने 2005 में इस हैंडसेट की बिक्री को लेकर परेशान मोटोरोला को सहारा मिला।
उस वक्त मोटोरोला की बाजार हिस्सेदारी केवल चार फीसदी थी, जो सितंबर 2007 में बढ़कर 15 फीसदी हो गई। इस साल अप्रैल में सैमसंग ने बतौर ब्रांड मैनेजर आमिर खान को लिया। देखिए, अब उनकी बाजार हिस्सेदारी बढ़कर 7.1-7.4 फीसदी पर पहुंच गई, जबकि छह साल पहले यह केवल 2.7 फीसदी थी।
कंपनी के कंट्री हेड सुनील दत्त के मुताबिक इस हिसाब से सैमसंग, सोनी एरिक्सन को पछाड़ते हुए दूसरे पायदान पर पहुंच गई। लेकिन इस साल मोटोरोला के लिए स्टॉर प्रोमोशन सफल साबित नही हुआ और यह बाजार हिस्सेदारी के लिहाज से चौथे पायदान पर पहुंच गया।
टाटा स्काई की बात की जाए, तो आमिर खान के जादुई व्यक्तित्व का तकाजा रहा कि इसके प्रति लोग आकर्षित हुए। लेकिन इसे लेने के बाद संस्थापन की समस्या से जूझ रहे लोगों से समस्या निवारण के लिए इसके कस्टमर केयर ने उतनी दिलचस्पी नही दिखाई।
ठाणे के विनोद सिन्हा ने पिछले साल 5,000 रुपये में टाटा स्काई का कनेक्शन खरीदा, लेकिन उनके हाउसिंग सोसाइटी ने कहा कि वह मकान की छत पर डिस्क एंटीना नही लगा सकते। कनेक्शन बेचने के बाद स्काई वालों ने उनकी समस्या के प्रति एक बार भी तस्दीक नही की है।
तो अब कशमकश यह है कि किस प्रकार इनका इस्तेमाल हो ताकि इतना पैसा सार्थक साबित हो सके। इस बारे में एैड एजेंसी ‘सिक्वेंस’ के क्रिएटिव हेड अमूल गोयल का कहना है कि सबसे बेहतर बात यह होती है कि उत्पाद और सेलिब्रिटी का सही तालमेल यानी जो काम मोटोरोला के लिए अभिषेक बच्चन ने किया या फिर सैमसंग के लिए आमिर खान ने।
मतलब, वे एक इंटैलेक्चुअल यानी प्रबुद्ध वर्ग को प्रदर्शित करते हैं। लिहाजा इसने दोनों कंपनियों के लिए बेहतर काम किया। तीन साल पहले 72 फीसदी बाजार हिस्सेदारी वाली मोबाइल कंपनी नोकिया के मार्केटिंग निदेशक देविंदर किशोर के मुताबिक शाहरुख यूथ आइकन हैं, इसलिए हमने उनका चुनाव किया।
गोयल इस बात पर भी जोर देते हैं कि जब क्राइसिस का समय यानी तंगी का वक्त हो तब सेलिब्रिटी इंडॉर्समेंट काफी कामयाब हथियार साबित होता है। जैसा मिस पालमपुर वाले विज्ञापन में डेरी मिल्क का विज्ञापन अमिताभ बच्चन ने किया। फिर उसकी बिक्री में खासा उछाल दर्ज किया गया। तबसे डेरी मिल्क का इंडॉर्समेंट बिग बी कर रहे हैं। साथ ही कंटेंट के साथ जरूरी नही कि हमेशा बड़े स्टार ही काम करते हैं।
मसलन एयरटेल के हालिया विज्ञापन जिसमें माधवन और विद्या बालन ने काम किया, लोगों ने इसे बेहद पसंद भी किया। इन सबके अलावा अगर लंबी रेस का घोड़ा बनना है तो फिर दरकार इस बात की है कि गुणवत्ता पर ज्यादा जोर दिया जाए क्योंकि अंतिम रूप से यही वो चीज है जो उपभोक्ताओं के दिल एवं भरोसे जीतने में अहम भूमिका अदा करती है।