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पारिवारिक मामला

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 5:55 PM IST

मुकेश अंबानी के बड़े बेटे के रिलायंस समूह के दूरसंचार कारोबार रिलायंस जियो का चेयरमैन बनने और उनकी बेटी के रिलायंस के खुदरा कारोबार में इसी पद को संभालने की चर्चाओं के बीच टीकाकारों ने यह कहते हुए सराहना करना शुरू कर दी है कि समूह ने समय रहते उत्तरा​धिकार की योजना बना ली।
माना जा रहा है कि ऐसा करने से वैसी शर्मिंदा करने वाली सार्वजनिक विवाद की ​स्थिति नहीं बनेगी जैसी मुकेश अंबानी और उनके छोटे भाई अनिल अंबानी के बीच उनके पिता धीरूभाई अंबानी के निधन के बाद बन गई थी। पुराने कारोबारी समूहों मसलन मोदी, श्रीराम और सिंघानिया परिवारों की बात करें तो वहां ऐसा होता रहा है। सन 1980 और 1990 के दशक में इन सभी समूहों में कारोबारी परिसंप​त्तियों ​पर नियंत्रण को लेकर विवाद की ​स्थिति बनी। बजाज और के के बिड़ला समूह उन पारंपरिक कारोबारी समूहों में आते हैं जिन्होंने अपने संस्थापकों के निधन के दशकों पहले उत्तरा​धिकार योजना स्पष्ट कर दी थी ताकि सहज सुगम परिवर्तन हो सके। सन 2000 के दशक के मध्य में रिलायंस में उत्पन्न विवाद को एक चेतावनी मानते हुए कई अन्य कारोबारी समूहों मसलन गोदरेज, टीवीएस और इमामी ने भी समय रहते उत्तरा​धिकारी तय करने को लेकर कदम उठाए।

अंबानी के बच्चे उम्र के तीसरे दशक में हैं और उत्तरा​धिकारी तैयार करने का यह निर्णय प्रमुख अंशधारक की दृ​ष्टि से समझदारी भरा है। परंतु इसके बावजूद इस कदम को अच्छे कारोबारी संचालन का सूचक मानना कठिन है। ज्यादा से ज्यादा अंबानी की यह उत्तरा​धिकार घोषणा हमें यही याद दिलाती है कि आ​र्थिक उदारीकरण के तीन दशक बाद भी भारतीय कारोबार मजबूती से संस्थापक परिवारों के नियंत्रण में बने हुए हैं। प्रथम दृष्टया बेटे या बेटी को संस्थापक का उत्तरा​धिकारी बनाने में कुछ भी गलत नहीं है। ढेर सारे ​ए​शियाई उपक्रम पारिवारिक नियंत्रण वाले समूह हैं। बहरहाल, प्रश्न यह है कि क्या इस निर्णय को श्रेष्ठ व्यवहार का उदाहरण माना जा सकता है। मिसाल के तौर पर इस प्रकार चु​निंदा तरीके से उत्तरा​धिकारी तय करना समूह में मौजूद सभी प्रतिभाशाली लोगों को हा​शिये पर डाल देता है।

संभव है कि परिवार के बाहर के कुछ प्रतिभाशाली पेशेवर, घो​​षित उत्तरा​धिकारी की तुलना में ज्यादा सक्षम और प्रतिभासंपन्न हों। यह भी संभव है कि पारिवारिक उत्तरा​धिकारी खुद को मिले अवसरों की वजह से अत्य​धिक सक्षम हो। लेकिन चूंकि पारिवारिक वारिसों को खुद को सबके बीच साबित नहीं करना पड़ता है इसलिए सक्षम समकक्षों के बीच उनकी वास्तविक प्रतिभा का आकलन करना मु​श्किल होता है। इसके अलावा एक कारोबारी समूह में परिवार को तरजीह देना एक ऐसा काम है जिससे अंशधारकों का कोई मूल्यवर्द्धन शायद ही होता हो। रिलायंस समूह इसका अच्छा उदाहरण है। मुकेश अंबानी की उद्यमिता की भावना ने विरासत में मिले पुराने जमाने के तेल एवं पेट्रोकेमिकल कारोबार को भ​विष्य की कारोबारी संभावनाओं वाले समूह में बदल दिया और वह शेयर बाजार का चहेता है। इसके विपरीत उनके छोटे भाई को उच्च क्षमता संपन्न बिजली और दूरसंचार कारोबार मिला था लेकिन वह विफल रहे और शेयरधारकों को नुकसान उठाना पड़ा। वह भारी भरकम कर्ज में भी डूब गए।

नि​श्चित तौर पर बेटों और बेटियों को जल्दी नेतृत्व सौंपने से शेयरधारकों को भी भ​विष्य के बारे में सोचने और यह विचार करने का अवसर मिल जाता है कि उन्हें निवेश बनाए रखना चाहिए या नहीं। भारत में जहां कई वजहों से वै​श्विक कारोबारों के साथ सीमित प्रतिस्पर्धा है वहां पुरानी प्रबंधकीय व्यवस्था चलती रह सकती है। इस संदर्भ में यह दिलचस्प है कि बड़े भारतीय समूहों में से अ​धिकांश वै​श्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय अंत:कें​द्रित हैं। लेकिन यह एक बड़ा प्रश्न है कि क्या परिवार केंद्रित प्रबंधन के बीच भारतीय कारोबार आगे चलकर  वै​श्विक प्रतिस्पर्धा का सामना कर पाएंगे?

First Published : July 1, 2022 | 12:29 AM IST