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आखिरकार पूरा हुआ सपना

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:48 PM IST

श्रवण श्रॉफ का इंटरव्यू लेने की बात जब तय हुई तो उन्होंने हमें गुड़गांव के ट्राइडेंट होटल में बुलाया। जब हम इंटरव्यू के लिए पहुंचे तो उन्होंने अपने लिए केवल बियर मंगाई।


जबकि मैंने हर्बल मॉकटेल और फोटोग्राफर ने कोल्ड कॉफी का ऑर्डर दिया। श्रॉफ 45 मिनट पहले ही दिल्ली पहुंचे थे और फिलहाल उन्होंने एक हाथ में लैपटॉप पकड़ा हुआ है। उनको देर रात विमान से वापस मुंबई जाना है। श्रॉफ, मुंबई में ही पैदा हुए और वहीं पले-बढ़े। इसी शहर में उनका परिवार ‘श्रृंगार फिल्म्स’ नाम से फिल्म वितरण के कारोबार में लगा है।

लेकिन वह हमेशा से ही अपने पुश्तैनी कारोबार से अलग हटकर कुछ करना चाहते थे तभी तो उन्होंने फेम नाम से मल्टीप्लेक्स श्रृंखला की नींव डाली। पिछले साल फेम ने 100 करोड़ रुपये का कारोबार किया। शर्ट की बांह चढ़ाते हुए वह कहते हैं, ‘मैं अपने दम पर कुछ करना चाहता था। मैं अपनी विरासत के दम पर ही तरक्की नहीं करना चाहता था।’ वह महीने में 20 दिन यात्रा पर होते हैं।

इस दौरान वह छोटे शहरों में भी मल्टीप्लेक्स लगाने के लिए संभावनाएं तलाशने में लगे रहते हैं। इंटरव्यू से एक दिन पहले वह झारखंड के धनबाद शहर में थे। वहां से वह मुंबई के लिए रवाना हुए जहां उन्हें घाटकोपर में बन रहे मल्टीप्लेक्स का काम देखना था जो कि अगले महीने से ही शुरू होने वाला है। फिलहाल वह दिल्ली में हैं। उसके बाद उन्हें फिर से मुंबई जाना है। फिर उन्हें भरूच की राह पकड़नी है।

आराम से बियर की चुस्कियां लेते हुए वह कहते हैं, ‘हम जल्द ही धनबाद, भरूच, पुणे और चंडीगढ़ समेत कई शहरों में सात मल्टीप्लेक्स शुरू करने जा रहे हैं। चंडीगढ़ में ही हमारे 2 मल्टीप्लेक्स होंगे।’ सात प्रस्तावित और आठ शहरों में 61 स्क्रीन के मालिक श्रॉफ को कुछ समय बाद ही खबरों में जगह मिली। कुछ इस तरह की खबरें भी आ रही हैं कि ऐडलैब्स फिल्म्स, फेम के अधिग्रहण की कोशिशों में लगी है।

फिलहाल ऐडलैब्स की फेम में 50 फीसदी हिस्सेदारी है। इस बात पर श्रॉफ हल्के से मुस्करा देते हैं। वह कहते हैं, ‘यह तो कंपनी के लिए खुशी की बात है कि इसमें रुचि दिखाई जा रही है। यह बात कंपनी की सफलता को ही बयां करती है।’ भले ही उन्होंने कारोबार में अपने लिए एक अलग राह बनाई हो लेकिन वह अभी भी अपने पिता के कारोबारी नुस्खों को मानते हैं। इस बात को वह स्वीकार भी करते हैं।

वह बताते हैं, ‘अपने से कुछ कमजोर या फिर अपने से कुछ कदम आगे वाले लोगों के साथ ही कारोबार करना चाहिए। अगर कोई आपसे सौ गुना आगे है तो कभी भी उसके साथ कारोबार नहीं करना चाहिए। दीर्घ अवधि में यह कारगर नहीं साबित होता।’

फेम के अधिग्रहण को वह मीडिया की गढ़ी हुई कहानी बताते हैं जिसमें कोई दम नहीं है। वह कहते हैं, ‘कुछ साल पहले इस तरह का ऑफर था। और पैसों के लिहाज से भी यह काफी आकर्षक था, लेकिन मैं उस पर तैयार नहीं हुआ। फेम मेरे लिए बच्चे की तरह है। इसके बदले में मुझे कोई चीज मंजूर नहीं।’ बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में श्राफ ने एक खास बात भी बताई।

उन्होंने बताया कि प्रोवोग और मनीष आचार्या के साथ मिलकर वह जल्द ही प्रोडक्शन के क्षेत्र में भी कदम रखने जा रहे हैं। उनकी कंपनी का नाम होगा ‘हेडस्ट्राँग फिल्म्स। उनके मुताबिक अगले पांच महीनों में उनकी फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो जाएगी।

श्रॉफ ने मुंबई से बीकॉम की पढ़ाई की। एमबीए, उन्होंने मेलबर्न से किया। फिल्में देखने का शौक उन्हें किशोर अवस्था से ही रहा है। वे फिल्मी पार्टियों में जाया करते थे जहां उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि लोग उनके पिता का कितना सम्मान करते हैं। वह कहते हैं, ‘मैं भी कुछ इसी तरह चाहता था।’ लेकिन कहते हैं कि हर तरह की शुरुआत के पीछे कोई न कोई दिलचस्प कहानी जरूर होती है।

कुछ इसी तरह की कहानी फेम एडलैब्स के बारे में भी है। श्रॉफ और उनके कुछ मित्र जिनमें उनकी गर्लफ्रेंड भी शामिल थीं, मुंबई के इरोस सिनेमा की सीढियों पर बैठे थे। यह मंडली वहां फिल्म देखने के लिए गई थी। वह कहते हैं, ‘ उस वक्त मेरी गर्लफ्रेंड ने मुझसे कहा कि मैं अपने दम पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश क्यों नहीं करता? उसकी बातों का मुझ पर असर भी हुआ।

मैंने इरादा बनाया कि एक दिन मेरे खुद के एक नहीं बल्कि कई सिनेमाघर होंगे।’ वह लड़की बाद में तो उनकी जिंदगी से चली गई लेकिन श्रॉफ का सपना और भी बड़ा होता जा रहा है। पुराने दौर में सिनेमा हॉलों में उनका फिल्म देखने का अनुभव किसी भी लिहाज से बढ़िया नहीं कहा जा सकता। आखिर बेकार कुर्सियों और उसमें भी खटमल, टिकट की लंबी लाइन, ये सब किसी भी फिल्म का मजा बिगाड़ने के लिए काफी हैं।

इन सब बातों ने उन्हें बेहतरीन सिनेमा हॉल बनाने के लिए प्रेरित किया। कंधे उचकाते हुए वह कहते हैं, ‘पुराने दौर के सिनेमाहॉलों से मुझे चिढ़ मचती थी। हमारी फिल्में अच्छी होती थीं लेकिन उनको दिखाने वाले सिनेमाहॉल बेहद खस्ताहाल में थे।’ उन्होंने 2001 में अपना पहला मल्टीप्लेक्स मुंबई के अंधेरी वेस्ट इलाके में ऐडलैब्स की साझेदारी से शुरू किया था। उस वक्त उनकी उम्र 30 साल थी।

वह कहते हैं कि तब से अब तक उनके अंदर कोई खास परिवर्तन नहीं आए हैं। दो बच्चों के पिता श्रॉफ एक वक्त पायलट बनना चाहते थे। वह कहते हैं, ‘मेरी आंखें कमजोर थीं, बाद में मुझे सर्जरी करानी पड़ी।’ विमानों के प्रति उनकी दिलचस्पी अभी भी बरकरार है। वह कई अलग-अलग माध्यमों के जरिये नई-नई जानकारियां प्राप्त करने में लगे रहते हैं। वह रोजाना सात से ज्यादा अखबारों पर नजर डालते हैं।

फिल्म देखने के बड़े दीवाने श्रॉफ न केवल अपने बल्कि दूसरे मल्टीप्लेक्सों में फिल्म देखते हैं। अपने कारोबारी प्रतिद्वंद्वियों की तारीफ करने में भी वह कंजूसी नहीं करते। वह कहते हैं, ‘पीवीआर का लातूर में मल्टीप्लेक्स खोलने का कदम एकदम सही है। ‘ वह डीवीडी पर भी काफी फिल्में देखते हैं। वैसे तो उन्हें कारोबार से कम ही फुर्सत मिल पाती है लेकिन जितना भी वक्त मिलता है, वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ बिताते हैं।

First Published : September 13, 2008 | 12:16 AM IST