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इंसानों की बढ़ती दखल का नतीजा है बाढ़

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:44 PM IST

बिहार में इस साल की बाढ़ को कुछ ने पिछले 50 सालों में आई सबसे भयानक बाढ़ का तमगा दिया। वहीं कई लोगों ने इसे बिहार के इतिहास की ही सबसे भयानक बाढ़ करार दे दिया।


सचमुच तबाही के मामले में इस साल आई बाढ़ काफी भयानक रही। लेकिन हकीकत तो यह है कि उत्तर बिहार को हर साल बाढ़ का सामना करना पड़ता है। हर साल बरसात के मौसम में नेपाल से निकलने वाली कोसी अपना कहर ढहाती है।

कोसी पर नकेल कसने के लिए भारत और नेपाल ने 1950 के दशक में साथ काम करना शुरू किया। नेपाल में कोसी बांध का निर्माण किया गया और भारत ने कोसी के किनारों पर तटबंध बनाना शुरू किया। बांध और तटबंधों की देखभाल की जिम्मेदारी भारत की थी, लेकिन हम अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने में बुरी तरह से नाकामयाब साबित हुए।

नेपाल की राजनैतिक अस्थिरता और बिहार की बद से बदतर होती गई प्रशासनिक हालत की वजह से नेपाल में बांध और तटबंधों की देखभाल ठीक तरीके से नहीं हुई। इस साल भी बांध नेपाल में ही टूटा है, लेकिन इस वजह से दोनों तरफ के लोगों को नुकसान झेलना पड़ा है। 

हमारे मुल्क में यह आरोप तो आम बात है कि नेपाल ने हमारे साथ सहयोग नहीं किया और इसीलिए बाढ़ आई। माना, बाढ़ का ज्यादा खामियाजा हमें उठाना पड़ता है, लेकिन तबाही तो नेपाल में भी मचती है। ऊपर से हम यह भी सलाह देने से नहीं बाज नहीं आते हैं कि इस मुसीबत का समाधान नेपाल में बड़े-बड़े बांध हैं, जिनसे ज्यादा पानी रोका जा सके। अगर नेपाल सहयोग नहीं कर रहा तो यह काम कैसे मुमकिन होगा।

बड़े बांधों का मतलब होगा, बड़े इलाके पानी में डूब जाएंगे। और नेपाल को उनकी जरूरत होगी भी क्यों? नेपाल भारत को पनबिजली बेचकर काफी पैसा कमा तो सकता है, लेकिन इसमें काफी दिक्कतें हैं। सबसे बड़ी दिक्कत तो यही है कि उसके काफी इलाके पानी में डूब जाएंगे। स्थानीय लोग भी इन बांधों का काफी विरोध कर सकते हैं।

इसके अलावा, बांधों के लिए काफी बालू की जरूरत पड़ेगी, जिससे आस-पास इलाके बंजर हो जाएंगे। अब तक तो यह बात साफ हो जानी चाहिए कि बिहार में हर साल होने वाली इस तबाही के जिम्मेदार ही इस समस्या का सबसे बड़ा समाधान भी है। मतलब, तटबंध। इस मामले से जुड़ा हर शख्स मसलन राजनेता, सिविल इंजीनियर और ठेकेदार इस बात को अच्छी तरह से जानता है।

हैरानी की बात यह है कि हम लोग ही इस बात से अनजान हैं। तीन साल पहले इस मामले के एक विशेषज्ञ ने ‘सिविल सोसाइटी’ में लिखा था कि 1952 के मुकाबले 2002 तक बिहार में बाढ़ से प्रभावित होने वाले संभावित इलाकों का आकार तीन गुना हो चुका था। 1952 में 25 लाख हेक्टेयर जमीन पर मॉनसून के दौरान बाढ़ का खतरा मंडरा रहा था, जबकि 2002 तक इस जमीन का आकार बढ़ कर 69 लाख हेक्टेयर हो चुका था।

हैरानी की बात यह है कि इस दौरान तटबंधों की लंबाई भी तेजी से बढ़ती गई है। 1952 में जहां केवल 160 किलोमीटर जमीन पर बांध मौजूद थे, वहीं 2002 तक तटबंधों की लंबाई बढ़कर 3,340 किलोमीटर हो चुकी थी। इसके बावजूद भी बाढ़ पर लगाम नहीं लगी, उल्टे इसने अपने पंजे में और बड़े इलाके को ले लिया। आज तरकरीबन उत्तर बिहार की तीन चौथाई आबादी मॉनसून के दौरान बाढ़ के खतरे में जिंदगी बिताती है।

आईआईटी से पढ़े इंजीनियर दिनेश कुमार मिश्र के पास इस बारे में काफी जानकारी है। उन्होंने भी ‘सिविल सोसाइटी’ में इस बारे में लिखा था कि, ‘ तटबंधों का बार-बार टूटना हम इंसानों का नदी के प्राकृतिक बहाव के साथ किए गए छेड़छाड़ के प्रति उसकी नाराजगी को दिखलाता है। सरकारी महकमों में जो लोग-बाग बैठे हुए हैं, उनके लिए प्रकृति को समझना काफी जरूरी है।

पहले लोग प्रकृति को साथ लेकर बाढ़ से निपटने का रास्ता निकाला करते थे। तब बाढ़ का मटमैला पानी गांवों के काफी बड़े इलाके में फैल जाया करता था। इससे जमीन पर उवर्रक मिट्टी की परत फैल जाती थी। साथ ही, जमीन को आद्रता भी मिल जाती थी। इसके अलावा, भूमिगत जल का स्टॉक भी भरा-पूरा हो जाता था। इसके बदले में गांव के लोग कुछ दिनों की दिक्कत को सहने के लिए खुशी-खुशी तैयार हो जाते थे।

लेकिन तटबंधों ने सब गुड़-गोबर कर दिया। हमें अब प्रक्रिया को बदलने की कोशिश करनी चाहिए, ताकि बाढ़ से लोगों को फायदा भी हो।’ आम तौर होता है कि ज्यादा से ज्यादा ऊंचे तटबंध बना दिए जाते हैं। हालांकि, मॉनसून में उफनती नदियों के आगे वे बौने साबित हो जाते हैं। दरअसल, बालू की वजह से नदियों का स्तर काफी बढ़ जाता है, जिस वजह से पानी को तटबंध तोड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगता है।

एक बार यह पानी तटबंध के आस-पास के निचले इलाकों को पार कर गया तो इसका वापस लौटना काफी मुश्किल हो जाता है। इस वजह से बाढ़ का प्रकोप ज्यादा दिनों तक और ज्यादा तीव्रता के साथ लोगों को सहना पड़ता है। साथ ही, खेतों में काफी पानी भर जाता है और उस पानी में मौजूद बालू की वजह से वे खेत भी बंजर हो जाते हैं।

अक्सर बाढ़ की वजह से राहत शिविरों का सहारा लेने वाले विस्थापित गांववालों के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बचती है। इसलिए वे ज्यादा राहत की मांग करते रहते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार और सरकारी काहिलपने की वजह से वह राहत उन्हें मिल भी नहीं पाती है। होता यह है कि बाढ़ की वजह से जमीन की उर्वरता काफी घट जाती है।

ज्यादा से ज्यादा बालू वाली जमीन की वजह से ज्यादातर किसान अब पारंपरिक धान के मुकाबले मक्के और गेहूं की फसल ज्यादा उपजा रहे हैं। एक विश्लेषक का तो यहां तक कहना है कि उत्तर बिहार अब राजस्थान की शक्ल ले रहा है। मिश्र की बाढ़ के साथ जीने की बात को दो इंजीनियर वैज्ञानिक आधार पर भी सही मान रहे हैं।

जियोग्राफिकल इनफॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) सॉफ्टवेयर बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी ईएसआरआई इंडिया के जी. वेंकट बापलू और आईआईटी, कानपुर में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के फैकल्टी राजीव सिन्हा ने कोसी बेसिन में बाढ़ से होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाने के लिए जीआईएस का इस्तेमाल किया। फिर उन्होंने इस नुकसान का अंदाजा लगाने के लिए एक कठिन सूचकांक को बनाया।

उनका कहना है कि, ‘बाढ़ को रोकने और उसके प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए ही तटबंधों का निर्माण किया गया। इसने प्रवाह को तो नियंत्रित कर दिया, लेकिन बाढ़ की समस्या बढ़ती ही चली गई। वजह, बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में इंसानों का बढ़ता प्रभाव। कोसी जैसी हर अपना प्रवाह बदलने वाली नदियों के दोनों तरफ पक्के ढांचे बनाने से बेहतर तो यही ही रास्ता है कि हम जोखिम और नुकसान को कम करने की कोशिश करें।’

First Published : September 3, 2008 | 11:03 PM IST