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वायदा कारोबार: शर्तें लागू

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 3:35 PM IST

 अहम कृ​षि जिंसों के वायदा कारोबार पर करीब एक वर्ष से लागू प्रतिबंध हटाने की वि​भिन्न संगठनों की मांग उचित तो है लेकिन उस पर अंतिम निर्णय लेने के पहले समुचित विचार-विमर्श किया जाए। अपने तमाम ज्ञात लाभों के बावजूद वायदा कारोबार के भारत में अपनी पूरी संभावनाओं के साथ अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना बहुत कम है। ऐसा इसलिए कि जिंस विपणन में सरकार का हस्तक्षेप बहुत अ​धिक है तथा घरेलू और बाहरी व्यापार नीतियों में ​स्थिरता नहीं है।
बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कई कृषि उपज के वायदा अनुबंधों पर रोक लगा रखी है। इनमें कुछ खाद्य तेल और तिलहन, दालें, गेहूं और गैर बासमती चावल शामिल हैं। ऐसा इसलिए किया गया है ताकि इनकी कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके। परंतु यह उद्देश्य नहीं पूरा हो सका क्योंकि कृ​षि जिंसों की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव आता रहा है। ज्यादातर मौकों पर कीमतों में इजाफा ही देखने को मिला। प्रतिबंध के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा।
ताजा आ​धिकारिक आंकड़ों से संकेत मिलता है कि खाद्य मुद्रास्फीति जुलाई के 6.75 फीसदी के स्तर से बढ़कर अगस्त में 7.62 फीसदी हो गई। ऐसा वायदा कारोबार निरस्त होने के बावजूद हुआ। समय-समय पर गठित कई समितियों और आयोगों ने हाजिर बाजार कीमतों पर डेरिवेटिव कारोबार के प्रभाव का अध्ययन किया और उन्हें दोनों के बीच कोई संबंध नहीं मिला। यहां तक कि 2007-08 के वै​श्विक खाद्य कीमत संकट के बाद 2009 में जारी रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट में भी कहा गया कि कीमतें मूल्य परिवर्तन के जाने-पहचाने कारकों से प्रभावित हुईं। उदाहरण के लिए मांग-आपूर्ति का अंतर, आयात पर निर्भरता का स्तर और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में परिवर्तन आदि।
वास्तव में वायदा कारोबार को अगर समुचित ढंग से काम करने दिया जाए (दुर्भाग्य से भारत में ऐसा नहीं है) तो यह अनेक लाभ देता है। इनमें से कुछ को 2006-07 की आ​र्थिक समीक्षा में अत्यंत सारग​र्भित ढंग से गिना गया। इसमें कहा गया कि वायदा कारोबार किफायती मूल्य निर्धारण में मदद करता है, यह बाजार प्रतिभागियों को सूचना समय पर पहुंचाने में सहायक होता है, कीमतों में पारद​र्शिता सुनि​श्चित करता है, मूल्य के झटके कम करता है और मूल्य व्यवहार में विसंगति पर तत्काल उपचारात्मक कदम की सुविधा देता है। बहरहाल, ये लाभ पूरी तरह मुक्त बाजार व्यवस्था में ही हासिल हो सकते हैं।
भारत में यह पूर्वशर्त नहीं पूरी हो पाती है क्योंकि यहां जिंस कीमतें और खासकर राजनीतिक रूप से संवेदनशील जिंस की कीमतें सरकार द्वारा नियंत्रित की जाती हैं। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, स्टॉक हो​ल्डिंग और निर्यात पर प्रतिबंध तथा आयात और निर्यात नीतियों और दरों में बदलाव आदि कदम उठाए जाते हैं। यहां तक कि कुछ गैर कृ​षि जिंस मसलन सोने और तेल आदि में भी अक्सर सरकारी हस्तक्षेप होता है।
इसके अलावा जिंस डेरिवेटिव बाजार के एक अन्य पहलू की अनदेखी नहीं की जा सकती है और वह यह कि ये क्षेत्र सटोरियों की छेड़छाड़ से मुक्त नहीं है। जब तक बाजार नियामक उनकी गतिवि​धियों पर नजर रखने के लिए पूरी तरह सतर्क न हो और बचाव के उपाय न करे तब तक ये अमीर बाजार प्रतिभा​गी कीमतों को अपने हित में प्रभावित कर सकते हैं। हकीकत में के एन काबरा समिति, जिसकी अनुशंसा पर 2002-03 में चार दशक बाद कृ​षि जिंसों में वायदा कारोबार दोबारा शुरू किया गया था, उसने भी सटोरियों की गतिवि​धियों के ​खिलाफ चेतावनी दी थी। बहरहाल, वायदा कारोबार के समर्थक अलग ढंग से सोचते हैं।
उनका कहना है कि सटोरिये ही जो​खिम उठाते हैं जबकि अन्य बाजार प्रतिभागी इस तरह के विपणन में बचने की को​शिश करते हैं। इसमें दो राय नहीं कि ये दोनों ही इस बाजार का अनिवार्य अंग है और ऐसे में कृ​षि जिंसों में वायदा कारोबार से जुड़ा कोई भी निर्णय लेने से पहले इन बातों को पूरी तरह ध्यान में रखा जाना चाहिए। 

First Published : September 14, 2022 | 10:53 PM IST