केंद्र सरकार के आर्थिक मामलों से जुड़े मंत्रालयों के कई सचिव अकेले में स्वीकार करते हैं कि महंगाई के मुद्दे को लेकर यूपीए सरकार ने जरूरत से ज्यादा चुस्ती दिखा दी है।
यह बात तो सच है कि हफ्ते में एक बार जारी होने वाला थोक मूल्य सूचकांक पिछले कुछ दिनों में ऐसे स्तर पर जा पहुंचा, जो किसी भी सरकार की नींदें उड़ाने के लिए काफी है। इसी सूचकांक के जरिये सरकार पिछले साल की कीमतों के आधार पर इस साल की कीमतों में उतार-चढ़ाव को नापती है।
लेकिन जब आप इन्हीं सचिवों से यह पूछेंगे कि क्या कीमतें सचमुच इसी दर से चढ़ रही हैं, तो वे उलटे आप से ही सवाल कर बैठेंगें, ‘क्या आपको सचमुच लगता है कि कीमतों में इजाफा इस सूचकांक के मुताबिक ही हो रहा है? और क्या आपको यह भी लगता है कि सरकार इस मामले में जरूरत से ज्यादा चुस्ती दिखा रही है?’
इसके बाद वे आपको बताएंगे कि कैसे यह सूचकांक लोगों के लिए जरूरी सामान की कीमतों में सही उतार-चढ़ाव को नहीं दिखलाता। वे आपको यह भी बताएंगे कि कैसे इनमें से कई सामान के दामों को समय-समय पर अपडेट भी नहीं किया जाता। उनके मुताबिक तो कीमतों के मासिक औसत की पिछले महीने के औसत से तुलना करना, कीमतों के उतार चढ़ाव के बारे में ज्यादा सटीक जानकारी दे पाएगा।
यह तरीका पिछले साल से तुलना करने से काफी बेहतर रहेगा। फिर भी अगर सरकार और रिजर्व बैंक के कदमों को गौर से देखें तो साफ पता चल जाता है कि उन्होंने पिछले कुछ हफ्तों के दौरान महंगाई को काफी गंभीरता से लिया है। निर्यात करों में इजाफा, आयात करों को कम करना, न्यूनतम निर्यात कीमतों में बढ़ोतरी, कुछ खास चीजों के निर्यात पर पाबंदी और नकद जमा अनुपात (कैश रिजर्व रेश्यो) जैसे कुछ कदम सरकार और रिजर्व बैंक ने महंगाई से परेशान होकर ही उठाए हैं।
महंगाई कोई मुद्दे है या नहीं, इस पर कोई बहस हो ही नहीं सकती। जाहिर सी बात है, भारत जैसे विकासशील मुल्क के लिए बढ़ती महंगाई सबसे बड़ी दिक्कत साबित हो सकती है। इसलिए इससे दो-दो हाथ करने की गंभीर कवायद को गलत भी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इस मामले में सरकार के आला अधिकारियों का बर्ताव भी गौर करने के लायक है।
उनके बर्ताव से उनका यह डर सामने आ रहा था कि शुक्रवार आते ही नया थोक मूल्य सूचकांक जारी हो जाएगा और उनसे बढ़ती महंगाई पर सवालों की झड़ी लग जाएगी। अभी पिछले ही गुरुवार की बात है, वित्तमंत्री पी. चिदंबरम किसानों के लिए कर्ज माफी योजना के दिशानिर्देशों के बारे में बताने के लिए आए थे। जब महंगाई के बारे में उनसे पूछा गया तो चिदंबरम साहब का मजाक में ही सही, यही जवाब था कि, ‘शुक्र है, आज शुक्रवार नहीं है।’
यह सचमुच हैरानी की बात है कि आज कल क्यों मंत्री सभी अहम मुद्दों के बारे खुद ही बताना पसंद करते हैं? इसके पीछे बहुत गहरी सोच छुपी हुई है। इसके पीछे वजह यह है कि जब बुरी खबर मिले तो मीडिया का सामना वह नहीं, बल्कि नौकरशाह करें। वैसे, यह परंपरा आज की नहीं, बल्कि काफी पुरानी है। वैसे, इस महंगाई की दिक्कत के लिए भी सरकार खुद ही जिम्मेदार है। उसने लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों को नजरअंदाज किया है।
साथ ही, सरकार ने एक साल से ज्यादा वक्त से सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ाने की इजाजत नहीं दी। इसलिए तो आज जब कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में 135 डॉलर प्रति बैरल को पार कर चुके हैं, तो खुद सरकार की भी कंपकपी छूट रही है। इसलिए आज उसके सामने इस बोझ का कुछ ही हिस्सा ही सही, मुल्क की जनता के साथ बांटना पड़ेगा।
इसका मतलब जिस महंगाई दर की वजह से उनकी अभी से रातों की नींद उड़ चुकी है, उस पर अंकुश कसना और भी मुश्किल हो जाएगा। तो सरकार के आला अधिकारी कैसे निपटें इस मुसीबत से? एक विकल्प तो यह हो सकता है कि सरकार हालात और वक्त को देखते हुए बढ़ती महंगाई को एक न टल सकने वाली मुसीबत मान ले और दूसरे राजनैतिक दलों के साथ विचार-विमर्श शुरू कर दे।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपनी सरकार के कार्यकाल के चार साल पूरे हो जाने के मौके पर केवल इतना कह देना काफी नहीं है कि इस वक्त बढ़ती महंगाई के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्दे जिम्मेदार हैं। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की नैशनल फ्रंट सरकार के सामने भी ऐसी ही मुसीबत खड़ी हो गई थी। उस वक्त इराक ने कुवैत पर कब्जा कर लिया था और इस वजह से कच्चे तेल की कीमतों में भारी इजाफा हो गया था।
तब सरकार ने एक ही झटके में घरेलू बाजार में तेल की कीमतों में 25 फीसदी इजाफा करने की योजना बनाई थी। हालांकि, इस लाने से पहले वी.पी. सिंह सरकार ने वामदलों और भारतीय जनता पार्टी के साथ एक बैठक बुलाई। वैसे, उस बैठक से सभी राजनौतिक दल तेल कीमतों में किसी भी प्रस्तावित इजाफे के खिलाफ नारे लगाते बाहर निकले थे, लेकिन उस मुश्किल वक्त में राजनीतिक प्रबंधन की दुरुह मंजिल हासिल हो गई थी।
बदकिस्मती से यूपीए सरकार ने अभी तक अपने सहयोगी दलों या विपक्षी पार्टियों के साथ इस मुद्दे पर बातचीत करने के लिए नहीं बुलाया है। इसलिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में इजाफे से पहले काफी हंगामा होना तो तय है। वैसे, इस हंगामे की धूल छंटने के बाद यूपीए सरकार को भी इस बात का अहसास होगा कि विपक्षी दलों को पता है कि वर्तमान परिस्थितियों में तेल कीमतों में इजाफा ही एकमात्र रास्ता है।