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संगीनों की छांव में जनरल

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 4:05 PM IST

पुरानी कहावत है, जो लोग तलवारों की छांव में रहते हैं, एक दिन वे उसी के शिकार बन जाते हैं। हालांकि, यह बात हमेशा सच साबित नहीं होती। कुछ खुशकिस्मत इस नियम के अपवाद भी साबित हो जाते हैं।


पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ उन कुछेक खुशकिस्मतों में से एक साबित हो सकते हैं। अगर उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाता है, तो यह पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार होगा जब किसी शासक को बंदूक के बूते पर सत्ता से नहीं हटाया गया होगा।

अक्सर उन शासकों को जिंदा छोड़ दिया जाता है, लेकिन ज्यादा जोर-जबरदस्ती की तो जान लेने से भी गुरेज नहीं किया जाता। लियाकत अली खान के बाद से अब तक  पाकिस्तान के इतिहास में एक भी ऐसा नेता नहीं आया है, जिसने वक्त पर और संवैधानिक तरीके से अपनी कुर्सी छोड़ी हो। लियाकत अली की 1951 में हत्या कर दी गई थी।

अयूब खान और याह्या खान दोनों सैन्य शासक थे, जिन्हें जबरदस्ती सत्ता से हटाया गया था। जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्ता पलट दिया गया था, जबकि जिया उल हक की विमान दुर्घटना में मौत हो गई थी। साथ ही, नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो बतौर वजीर-ए-आजम अपना एक भी कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए।

नवाज को 1999 में देश निकाला दे दिया गया था, जबकि बीबी की कुछ ही महीनों पहले हत्या कर दी गई। अब नवाज वापस आ चुके हैं और उन्हें साथ मिला है आसिफ अली जरदारी का। इन दोनों को मुशर्रफ से काफी हिसाब चुकता करना है। अगर मुशर्रफ महाभियोग प्रस्ताव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट या फिर बंदूक की मदद नहीं लेते तो उनका सत्ता से बाहर जाना तो तय है।

हालांकि, ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जिनके मुताबिक सत्ताधारी गठबंधन के पास मुशर्रफ को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने के लायक दो-तिहाई बहुमत नहीं है। मुशर्रफ के एक समर्थक का कहना है कि ‘राष्ट्रपति की पहली प्राथमिकता स्थायित्व है। महाभियोग एक लोकतांत्रिक और राजनीतिक जंग है। मुशर्रफ साहब के पास सफाई पेश करने और इस जंग को लड़ने का अधिकार है।

हमारी मानें तो उनके पास संसद में पूरा समर्थन है।’ एक दूसरे समर्थक और पूर्व सरकार में मंत्री रह चुके तारिक अजीम का कहना है कि, ‘हम इसका पूरा विरोध करेंगे। यह दिमाग से नहीं, बल्कि दिल से लिया गया फैसला है। इससे बर्बादी के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा।’ मुशर्रफ सुप्रीम कोर्ट का सहारा तो ले सकते हैं, लेकिन सेना उनके पीछे खड़ी नहीं दिखती है। सेना प्रमुख अशफाक कियानी ने इंतजार करो और देखो की नीति अपना रखी है।

खैर जो भी हो, लोगों को सेना की फ्रिक नहीं है और वे सड़कों पर भी आ सकते हैं, जैसे वे मुशर्रफ के खिलाफ उतर पड़े थे। हालांकि, शतरंज की इस बाजी में तीसरी संभावना यह है कि मुशर्रफ चुपचाप सत्ता को अलविदा कह दें। हालांकि, इसकी उम्मीद कम ही है। इस पूरी कहानी में एक कोण अमेरिका का भी है। अमेरिका को पाकिस्तानी राष्ट्रपति पर भरोसा तो है, लेकिन वह भरोसा दिनोंदिन कम होता जा रहा है।

वजह है, जिहादियों से निपटने में मुशर्रफ की नाकामयाबी। इसलिए इस मामले में अमेरिकियों के हस्तक्षेप की उम्मीद कम ही है। पाकिस्तान के लिए अनिश्चितता तो अब आम बात हो चुकी है। लेकिन बाकी की दुनिया और उसके पड़ोसियों के लिए यह अचंभे की बात है। अगर कभी यह गुबार थमा तो इस अचंभे के लिए उन्हें माफ किया जा सकता है।

आज पाकिस्तान एक ऐसा मुल्क बन चुका है जो आतंक और आतंकियों को पालता पोसता है। एक ऐसा मुल्क, जो अमेरिका को अपना सबसे करीब दोस्त कहता है, लेकिन उस पर भरोसा भी नहीं करता। एक ऐसा मुल्क जिसके पास परमाणु हथियार हैं, लेकिन उन्हें दूसरे मुल्कों को चोरी-छिपे बेचता है। जहां सत्ता जिस भी पार्टी के पास हो, सरकार तो फौज ही चलाती है। ऐसा मुल्क, जिसकी अपने पड़ोसियों से नहीं बनती।

ऐसे मुल्क के लिए खुद को लाइन पर लाना बड़ी बात होगी। लेकिन क्या वह ऐसा करेगा, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। यह एक ऐसे जनरल को सत्ता से हटाने या नहीं हटाने से बड़ा सवाल है, जो सत्ता में तख्ता पलट के जरिये आया था और उसके बाद जिसने भारी गलतियां की। 

First Published : August 11, 2008 | 1:11 AM IST