भारतीय रिजर्व बैंक की आक्रामक मौद्रिक नीति के चलते इस समय कैश रिजर्व रेशियो और रेपो रेट, दोनों बढ़कर 9 प्रतिशत के आंकडे पर पहुंच चुके हैं।
स्वाभाविक है कि रिजर्व बैंक का उद्देश्य बाजार में मुद्रा प्रवाह को रोकना है, जिससे लोगों की क्रय शक्ति कम हो और मांग में कमी आए। यह कोशिश सरकार और रिजर्व बैंक पिछले 6 महीने से कर रहे हैं। महंगाई है कि रुकने का नाम ही नहीं लेती। 5 प्रतिशत से चलते-चलते महंगाई दर साल भर के भीतर 12 प्रतिशत के करीब पहुंच चुकी है।
कड़ी मौद्रिक नीति के चलते कंपनियां हलकान हैं। जिन कंपनियों ने कर्ज की बदौलत विस्तार की योजनाएं बनाई थीं उन्होंने या तो अपना इरादा छोड़ दिया है या कुछ महीनों के लिए आगे बढ़ाया है। सामान्यत: ऐसा होता है कि मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने की वजह से चीजें महंगी हो जाती हैं। लेकिन अब यह भी गौरतलब है कि महंगाई बढ़ने की प्रमुख वजह मांग में बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि कंपनियों के कच्चे माल पर बढ़ते खर्च की वजह से भी ऐसा हुआ है।
अगर हम टेक्सटाइल क्षेत्र की बात करें तो पिछले एक साल में कपास की कीमत 18,000 रुपये प्रति कैंडी (365 किलो) से बढ़कर 28,500 रुपये प्रति कैंडी हो चुकी है। एक साल में इसकी कीमतों में 63 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो चुकी है। पिछले छह महीने के आंकडे बताते हैं कि कपास की कीमतों में 40 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
उद्योगों में प्रयोग होने वाले कच्चे माल पर गौर करें तो पिछले 6 महीनों में एफएमसीजी क्षेत्र में 8 से 10 प्रतिशत, कंज्यूमर डयूरेबल्स में 15-20 प्रतिशत, स्टील, कॉपर जैसी धातुओं में करीब 50 प्रतिशत, प्लास्टिक में 10-20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। बहरहाल केंद्र सरकार इसी कोशिश में लगी है कि बाजार में धन का प्रवाह रोककर कीमतों में कमी लाई जाए।
क्यों उठे सख्त कदम
बढ़ती महंगाई दर और आम आदमी की जिंदगी पर पड़ने वाले असर और आगामी आम चुनावों को देखते हुए सरकार कोई खतरा नहीं लेना चाहती। जब महंगाई दर दो अंकों में पहुंची तो सरकार पर हमला होना स्वाभाविक था। सरकार के पास एक ही उपाय था कि वह मौद्रिक नीति को सख्त करे।
सकारात्मक असर
केंद्रीय बैंक ने पिछले छह सप्ताह में दूसरी बार बैंक दरों में परिवर्तन किया है। इससे बैंक मजबूर हो गए और उन्हें ब्याज दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ी। इससे कर्ज लेकर काम करने वाले निराश हुए हैं।
महंगाई बढ़ने की वजह
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बेतहाशा बढ़ीं। सरकार ने जब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों को बढ़ाकर सब्सिडी के बोझ को कम करने की कोशिश की तो हालत यह हो गई कि महंगाई की आग और भड़क उठी। इसके अलावा वैश्विक बाजार में जिंसों की बढ़ती कीमतों और घरेलू मांग ने भी असर डाला। स्वाभाविक है कि सरकार का वैश्विक कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं है। कीमतें बढ़ती गईं और महंगाई दर ने रफ्तार बनाए रखा।
कड़ी मौद्रिक नीति का सीधा असर विकास पर पड़ा है। उद्योग के क्षेत्र में मंदी आई है। ऐसा नहीं है कि रिजर्व बैंक या सरकार नावाकिफ है। रिजर्व बैंक ने विकास दर के अपने पिछले अनुमानित आंकड़े 8 से 8.5 प्रतिशत को घटाकर पिछली 29 जुलाई को 8 प्रतिशत कर दिया है। वरिष्ठ अर्थशास्त्री सोनल वर्मा का कहना है कि नीतिनिर्माताओं को 1970 में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ने से महंगाई दर बढ़ने की घटना से सीख लेनी चाहिए। उनका कहना है कि आपूर्ति की समस्या से बढ़ने वाली मुद्रास्फीति को ज्यादा दिनों तक नहीं टाला जा सकता।
मौद्रिक नीति को कड़ा किए जाने से हो सकता है कि कुछ समय के लिए महंगाई दर पर काबू पाया जा सके, लेकिन इसका सही तरीका आपूर्ति को बढ़ाने में ही है। कड़ी मौद्रिक नीति से उद्योग जगत में निराशा है वहीं बढ़ती लागत से भी उन्हें समस्या का सामना करना पड़ रहा है। इससे न केवल घरेलू उत्पादन और बाजार प्रभावित हो रहा है बल्कि इसका असर निर्यात पर भी पड़ रहा है। लेकिन सरकार के सामने भी मजबूरियां बहुत हैं। एक शायर के शब्दों में कहें तो-
पांव का होश अब, न फिक्र सिर की
वोट की धुन में बन गए फिरकी।