Categories: लेख

वैश्वीकरण से संरक्षणवाद की ओर बढ़ने की उम्मीद

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 11:05 AM IST

पिछले सप्ताह मैंने एक लेख में तर्क दिया था कि एशियाई देशों के आर्थिक शक्ति के रूप में उभरने से वैश्वीकरण के बारे में अलग राय बनने लगी है।


अब वैसा नहीं रहा है जैसा कि परंपरागत रूप से भूमंडलीकरण के पश्चिमी देशों के समर्थक सोचते थे। हाल में कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए हैं, जिनके चलते खासकर अमेरिका के राजनीतिक नेताओं को संरक्षणवादी रवैया अपनाने पर विवश होना पड़ सकता है। अमेरिका के इस चुनावी साल में मंदी की चपेट में आने की आशंका है। इसके लिए जिम्मेदार हैं-

तेल की बढ़ती कीमतें
वित्तीय और बैंकिंग प्रणाली में गड़बड़ियां
भारी वित्तीय घाटा, इतना कि सरकार आर्थिक मंदी पर काबू पाने के लिए कोई भी महत्त्वपूर्ण कदम उठाने में असमर्थ हो गई है।

अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार ने संरक्षणवाद का राग अलापना पहले ही शुरु कर दिया है। अमेरिका में पिछले 6 महीने से रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं। यह प्रक्रिया आधिकारिक रूप से आर्थिक मंदी की घोषणा के पहले ही शुरू हो गई है।

बढ़ती बेरोजगारी और श्रमिक वर्ग के वेतन में ठहराव का दोष वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार को ही दिया जाएगा। ऐसे में चीन के विनिर्माण क्षेत्र और भारतीय सेवा क्षेत्र पर आरोप लगाना और आसान हो जाता है। इस हालत को देखते हुए जनता अपने राजनीतिक आकाओं से भी बढ चढ़कर सवाल उठा सकती है। अक्टूबर 2007 में चुनाव से पहले कराए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि यूरोप और अमेरिका में मुक्त व्यापार का समर्थन कम हो रहा है।

जेफरी फ्राइडेन ( इंटरनेशनल पॉलिटिकल इकनॉमी: पर्सपेक्टिव्स आन ग्लोबल पॉवर ऐंड वेल्थ के लेखक) ने हाल ही में एक साक्षात्कार में वैश्वीकरण की व्याख्या एक गंदे शब्द के रूप में की। पॉल सैम्यूलसन, पॉल क्रूगमैन और लॉरेंस समर्स जैसे अर्थशास्त्री भी इसी सुर में सुर मिला रहे हैं, हालांकि वे कुछ शालीन शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं। ये सभी तुलनात्मक रूप से उदारवादी अर्थशास्त्री के रूप में जाने जाते हैं, न कि लाऊ डोब्स या पैट्रिक बुकानान जैसे इस विषय के कट्टर अर्थशास्त्रियों जैसे। अब ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक बार फिर और अधिक संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था की ओर झुकाव बढ़ रहा है?

इस खतरे को अनदेखा करना मुश्किल है। हकीकत यह है कि  भविष्य में क्या हो सकता है, इसे लेकर चिंता बढ़ रही है। 19 वीं सदी में एकीकृत वैश्विक अर्थव्यवस्था थी, जो पहले विश्व युध्द से बुरी तरह प्रभावित हुई, इसके बाद 1930 के दशक में मंदी का एक लंबा दौर चला, जिसकी वजह से एक के बाद कई देशों ने आयात पर शुल्कीय और गैर शुल्कीय प्रतिबंध लगा दिए। उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए अवमूल्यन का सहारा लिया। ऐसे में एक सवाल यह खड़ा होता है कि क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? (दोहा दौर की वार्ता में कोई प्रगति न होना इस बात के संकेत देता है। क्षेत्रीय व्यापार समूह भी वैश्विक अर्थव्यवस्था के खिलाफ ही मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं)

इस सवाल पर हम एशियावासियों का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमने उदारवादी, वैश्विक अर्थव्यवस्था से बहुत कुछ हासिल किया है। हम देख रहे हैं कि भारत के एक दशक पहले के समाजवादी ढांचे की तुलना में विकास दर कहीं बहुत ज्यादा है। और शायद हमारे बहुत से राजनीतिक आका पुराने दौर में जाकर बहुत खुश होंगे, क्योंकि बंद अर्थव्यवस्था में उनके राजनीतिक अधिकार बहुत बढ़ जाते हैं। चिंता की बात यह है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में तमाम बड़े परिवर्तन जारी रहेंगे।

अगर हम कुछ गड़बड़ी नहीं करते हैं तो एशियाई अर्थव्यवस्था की ताकत पश्चिमी देशों के मुकाबले बढ़ती रहेगी। इसमें पश्चिमी देशों की बूढ़ी होने वाली आबादी का भी योगदान रहेगा। तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से कच्चे तेल का आयात करने वाले देशों में जीवन शैली पर असर पड़ना लाजिमी है।  इसमें पश्चिमी देश भी शामिल हैं। निश्चित रूप से चीन और भारत में तेल की खपत बढ़ना भी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की प्रमुख वजह है।

तेल की कीमतें 140 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हैं ( ईरान पर अमेरिका और इजरायली हवाई हमले न होने के बावजूद) तथा भारत और चीन में 1000 की जनसंख्या के लिए औसतन 10 कारें हैं। अगर एशिया के इन दो दिग्गज देशों में कारों का वैश्विक औसत यानी 1000 व्यक्तियों पर 111 कारों का हो जाए, तो तेल की कीमतें कहां पहुंचेंगी? अगर केवल अमेरिका के स्तर यानी 1000 लोगों पर 750 कारों के औसत पर पहुंच जाएं तो क्या होगा?

यह सुनिश्चित करने का बढ़िया तरीका क्या होता कि भारत और चीन के लोग तेल की खपत न बढ़ाते ताकि पश्चिमी देशों के लोगों के लिए तेल की कीमतें वाजिब बनी रहतीं? निश्चित रूप से उस हालत में कोई भी कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सवाल नहीं उठाता। इसे राजनीतिक रूप से गलत माना जाता। लेकिन पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक तापमान का मुद्दा निश्चित रूप से चिंता का विषय है। जैसा कि जी-8 देशों की बैठक में राष्ट्रपति बुश ने तर्क दिया था कि चीन और भारत को अपनी कार्बन उत्सर्जन की सीमाओं को स्वीकार करना चाहिए अगर वे पूरी दुनिया को प्राकृतिक आपदा से बचाना चाहते हैं।

दिलचस्प है कि हाल के बीते दिनों में वह इस तरह के किसी भी खतरे से इनकार कर रहे थे। क्या अल गोर की फिल्म ‘एन इनकन्विनियेंट ट्रुथ’ को देखने के बाद उनके विचारों में यह क्रांतिकारी बदलाव आया है या उन्होंने यह महसूस किया है कि इस तरह की नसीहत देने से एशिया में कार के प्रयोग करने वालों की संख्या में कमी आएगी और तेल की बढती कीमतों पर लगाम लगेगी? लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था, खासकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है।

First Published : July 15, 2008 | 10:51 PM IST