पिछले कुछ सालों में हमारे मुल्क ने विकास की राह में जो फर्राटा दौड़ लगाई है, उसकी एक बड़ी वजह निवेश से मिलने वाली ताकत है। इन कुछ सालों में भारत के जीडीपी में निवेश का हिस्सा काफी तेजी से बढ़ा है।
पिछले साल तो यह 38 फीसदी के स्तर तक पहुंच गया था। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही को लेकर हाल ही में जो आंकड़े सामने आए हैं, उनके मुताबिक विकास दर पर संकट के बादल बरकरार रहने के बावजूद निवेश की दर जीडीपी के 35 फीसदी के बराबर बनी रहेगी। बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें तो निवेश आज की तारीख में दोगुना हो चुका है।
कम वक्त में इसकी मदद से वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ाने में मदद मिलती है। दूसरी तरफ, लंबे वक्त में यह मुल्क की उत्पादकता में इजाफा करता है, जिससे हमारे लिए आगे की राह आसान होती है। कम होती विकास दर और बढ़ती महंगाई के बावजूद भी निवेश में तेजी का बरकरार रहना, उत्पादकों के भरोसे को दिखलाता है।
साथ ही, यह बात हमारे मुल्क के भविष्य के कारोबारी हालत के बारे में एक अच्छी तस्वीर पेश करती है। हालांकि, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि आने वाले कल को लेकर काफी भरोसेमंद रहने वाली कंपनियां, मुश्किलों से भरे आज को नजरअंदाज करने का जोखिम उठा सकती हैं। आज के हालात की वजह से जो ऊंचे ब्याज दर वाला माहौल बन गया है, उसने निवेश को बढ़ाने वाली गतिविधियों को काफी चोट पहुंचाई है।
ज्यादा महंगी पूंजी और अल्पावधि में विकास की गई-गुजरी उम्मीद कारोबार को काफी नुकसान पहुंचा सकती है। साथ ही, इसकी वजह से अपनी क्षमता में विस्तार करने की कंपनियों की योजनाओं पर भी गहरी चोट लग सकती है। रिजर्व बैंक के एक हालिया अध्ययन की मानें तो यह अपना असर अब दिखाने भी लगा है। इस बारे में इस अखबार में सोमवार को खबर भी छपी थी।
इस अध्ययन की मानें तो पिछले साल की तुलना में इस वित्त वर्ष में कॉर्पोरेट सेक्टर का पूंजीगत खर्च 30 फीसदी तक घट सकता है। यह एक बहुत बड़ी बात है क्योंकि पिछले चार सालों से पूंजीगत खर्च हर साल कम से कम 40 फीसदी की रफ्तार से तो बढ़ ही रहा था। ऊंची ब्याज दरें, कच्चे तेल तथा दूसरी चीजों की ऊंची कीमतें और उथल-पुथल से भरे बाजार के हालात को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया है।
इस साल कंपनियों का निवेश कम रहने की बात किसी झटके के तौर पर नहीं आनी चाहिए। अगर हालात अच्छे भी रहते तो भी निवेश में यह गिरावट तो आनी ही थी। वजह थी निवेश का मोटा होता थैला। दरअसल, उत्पादकों ने काफी निवेश करके मांग से ज्यादा उत्पादन करने की क्षमता बना ली। ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि यह करना उन्हें काफी सस्ता लगा।
यह कदम उठाकर उन्होंने आगे निवेश पर ब्रेक लगा दी, ताकि आगे क्षमता बढ़ाने से पहले उसके बराबर मांग तो बनाई जा सके। रिजर्व बैंक के अध्ययन के मुताबिर दिक्कत की बात निवेश की गाड़ी पर ब्रेक मुल्क की माली हालत तो कितना चोट पहुंचाती है। अगर हालत ऐसे ही बने रहे तो निवेश में आई यह गिरावट मुल्क की विकास दर को अच्छी खासी चोट पहुंचा सकती है।