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अलविदा… सैम बहादुर

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:01 AM IST

सैम बहादुर नहीं रहे। 94 साल की उम्र में कुनूर में अपने मकान स्टावका से उन्हें मिलिट्री अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका देहांत हुआ।


भारत ने अपने सबसे जांबाज, लोकप्रिय और बेबाक सैनिक को खो दिया। सैम होरमसजी फ्रेमजी जमेशदजी मानेकशॉ मजाक में कहा करते थे कि, ‘अगर मैं अपने दस्तखत पूरे नाम से करुंगा तो कागज पर कुछ और लिखने की जगह ही नहीं रह जाएगी।’

हालांकि, उनके नेतृत्व में 2000 सालों के बाद भारत ने अपने दुश्मन को धूल चटाई थी, लेकिन खुद मानेकशॉ 1971 की जीत में नियति का बहुत बड़ा योगदान मानते थे। इससे पहले 300 ईसापूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस को हराकर भारत के लिए विजयश्री हासिल की थी। 1971 की जंग में जीत की वजह से बांग्लादेश का जन्म हुआ था।

सैम 1973 में भारत के पहले फील्ड मार्शल बने थे, लेकिन यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि यही वह शख्स था, जिसे जनरल बनाने के बाद सरकार में सेना से बर्खास्त करने की बात चली थी। ऐसा इसलिए क्योंकि उस समय के रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन और लेफ्टिनेंट जनरल बिन्नी कौल उनसे खुश नहीं थे। सैम ब्रिटेन की परंपराओं और हावभाव से गहराई से प्रभावित थे और उस समय के रक्षा तंत्र को फूटी आंखों नहीं सुहाते थे।

लेकिन 1962 के भारत-चीन के बाद उन्होंने जनरल कौल की जगह 4 कोर की कमान संभाली (4 कोर वहां तैनात थी, जहां जंग चल रही थी), तब वे मेस में गए और सैनिकों से कहा, ‘मैं आ गया हूं। अब हम कोई निकास-विकास नहीं करेंगे। हम लडेंग़े।’ भारतीय फौज का उस वक्त क्या हाल हुआ था, यह कौन नहीं जानता। भगवान की दया से चीन ने  एकतरफा युध्दविराम की घोषणा कर दी और भारत को मुंह की नहीं खानी पड़ी। लेकिन फिर भी हर एक फौजी का सिर पराजय की शर्म से जरूर झुक गया था।

ऐसे में सैम मानेकशॉ 1971 की जंग जीत पाए तो जाहिर सी बात है कि वे हर फौजी के लिए एक संबल बन गए थे। नौजवान सैनिकों से वे अक्सर कहा करते थे कि, ‘लड़ो तो जीतने के लिए, नहीं तो घरवाली स्वीकार नहीं करेगी।’ चापलूसों और चापलूसी से उन्हें सख्त नफरत थी। एक चापलूस (उनकी निगाह में) अफसर की गोपनीय फाइल में उन्होंने लिखा कि, ‘यह अफसर इतने तलवे चाटता है। मुझे हैरत है कि उसने अब तक हकलाना शुरू क्यों नहीं किया।’ वह नौकरशाही को हिकारत भरी निगाह से देखते थे।

सैनिक होने का गर्व और आत्मसम्मान उनमें कूट-कूट कर भरा था। वह कुर्सी और मेज को तो कुछ भी नहीं समझते थे। नियमों के पाबंद थे, उन नियमों के जिनका कोई मतलब था। अगर कोई सेनाध्यक्ष कोई ऐसा नियम पारित कर देता था, जो सैम बहादुर के समझ में नहीं आता, जैसे भूरे जूतों के साथ काली वर्दी, तो वह उसका उल्लंघन करते थे। उनके बाल नियम से जरा से लंबे होते थे, वर्दी औरों से ज्यादा चुस्त हुआ करती थी। सैम बहादुर मानते थे अपने आप को, पर थोड़ा हटके। 1971 के युध्द के बारे में कई बातें हैं, जिन्हें लेकर सैम और उनके सहयोगी ले. जनरल जे.एफ.आर. जैकब के बीच मतभेद थे।

जैकब ने अपनी किताब में इन सब बातों का खुलासा किया है। मगर सैम ने कभी अपना मुंह नहीं खोला।  जब कोई जैकब की किताब के बारे में उनसे पूछता तो वह हंसकर बात को टाल दिया करते थे। जिस आदमी को भारतीय सेना एक आदर्श मानती है, उसके ऊपर पाकिस्तान की तरफ से हमला न हो, ऐसा कैसा हो सकता है। पिछले साल भूतपूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सैम से मिलने गए और घोषणा की कि उनकी पेंशन बढ़ाई जाएगी। 1.6 करोड़ रुपये का चेक उन्हें थमाया, जो बकाया था।

उसी समय पाकिस्तान के विदेश मंत्री गौहर अयूब खान ने किसी ऐसे भारतीय फौजी के बारे में बताया, जिसने अपनी पत्नी की मांग पूरी करने के लिए 20 हजार रुपये लिए और 1965 के युध्द के दस्तावेज बेच डाले। यह इंसान कौन हो सकता है, इस पर काफी बहस हुई और फिर नतीजा यह निकाला गया कि अयूब खान साहब का इशारा सैम बहादुर की तरफ था। सैम तब तक 90 बंसत देख चुके थे। वह तो चुप रहे, लेकिन रक्षा मंत्रालय ने जांच करके गौहर अयूब खान के आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। हर सैनिक उबल कर आग बबूला हो गया।

अयूब ने कहा कि वह पूरी कहानी का खुलासा अपनी आने वाली अगली किताब में करेंगे। वैसे, वह किताब तो अभी तक आई नहीं । शायद यह मानेकशॉ की दिलेरी और हंसमुख स्वभाव ही था, जिसकी वजह से उनकी कई ऐसी बातों को भारत सरकार ने नजरअंदाज कर दिया, जो सैम बहादुर को नहीं करनी चाहिए थी। मसलन 1971 की जीत के बाद उन्होंने कहा था कि, ‘अगर भारत पाकिस्तान के बंटवारे के बाद मैंने पाकिस्तानी सेना को चुना होता तो शायद भारत 1971 का युध्द नहीं जीत पाता।’

फिर उन्होंने कहा कि वह लंदन को विश्व का सबसे लुभावना शहर मानते हैं। लेकिन भारत सरकार ने इन बातों को तवज्जो नहीं दी क्योंकि सैम तो आखिरकार सैम हैं। उस इंसान से आप क्या कह सकते हैं, जो भारत की प्रधानमंत्री से कहे, ‘आप आज बेहद खूबसूरत लग रही हैं।’ और प्रधानमंत्री उनके सामने झुक कर कहे, ‘शुक्रिया सैम बहादुर।’ मानेकशॉ की एक खासियत यह भी थी कि चाहे वो हर्खा बहादुर (वह शख्स, जिसने उन्हें सैम बहादुर का नाम दिया था) हो या फिर भारत की प्रधानमंत्री, हर किसी से एक ही अंदाज में बात करते थे।

एक बार उनसे पूछा गया कि वे अपने जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि किस चीज को मानते हैं? उन्होंने कहा कि, ‘मुझे अपनी जिंदगी में कभी किसी को कोई सजा नहीं देनी पड़ी। मैं अपने आप को इस बात के लिए बड़ा भाग्यशाली मानता हूं।’ जब उनसे पूछा गया कि जंग जीतने के क्या गुर होते हैं, तो उनका जवाब था, ‘जंग? मैं किसी से जंग नहीं करता। हां, अपनी पत्नी से जरूर लड़ता था, लेकिन चार साल पहले उनका भी स्वर्गवास हो गया…।’ आजकल बहुत बोल बाला है, मैनेजमेंट में लीडरशिप ट्रेनिंग का। असली लीडरशिप तो है फौज की, जहां आपको बचाने के लिए फौजी अपनी जान देने के लिए तैयार रहता है। इसके स्रोत थे सैम मानेकशॉ जैसे सिपाही।

First Published : June 27, 2008 | 11:09 PM IST