कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बाद पिछले कुछ दिनों से सरकार पर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ाने के लिए बेहद दबाव था। कारण कि सरकारी तेल कंपनियों को रोजाना 650 करोड़ रुपये की चपत लग रही थी।
पिछले साल तेल कंपनियों को 77,000 करोड़ रुपये का चूना लगा जिसके इस साल बढ़कर 2,45,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका है। हालांकि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम को जो घाटा होता है, उसका 33 फीसदी इन कंपनियों को झेलना पड़ता है।
वर्ष 2007-08 में 45 फीसदी घाटे की भरपाई सरकार ने तेल बांडों के जरिये की। बावजूद इंडियन ऑयल को पिछले वित्तीय वर्ष में 9,774 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा। वैसे सरकार के राजस्व में सबसे ज्यादा हिस्सा तेल का ही है। उत्पाद शुल्क के जरिये सरकार को जो राजस्व मिलता है, उसका 49 फीसदी तेल के जरिये आता है।
दूसरी ओर सीमा शुल्क की तेल राजस्व में 15 फीसदी हिस्सेदारी है। एक तरह से तेल कंपनियां सरकार के लिए कामधेनु से किसी तरह से कम नहीं हैं। वर्ष 2007-08 में इंडियन ऑयल ने खजाने में 62,668 करोड़ रुपये दिए जिसमें से आधे से अधिक केंद्र को और बाकी रकम राज्यों को मिली। वर्ष 2007-08 में भारतीय बास्केट की औसतन कीमत 80 डॉलर प्रति बैरल रही जबकि 22 मई 2008 को यह कीमत 129.08 डॉलर के स्तर तक पहुंच गई, जो कि एक रिकॉर्ड है।
ऐसे हालात में सरकार कब तक कच्चे तेल की आग में झुलसती रह सकती है? अब इस बढ़ोतरी की तपिश आम आदमी को भी झेलनी पड़ेगी। प्राइसवाटर कूपर्स में एसोसिएट एनालिस्ट दीपक माहूरकर तेल कीमतों में इजाफे का समर्थन करते हैं। उनका मानना है कि यह बढ़ोतरी कम है, बल्कि इससे ज्यादा होनी चाहिए थी। क्या सरकार के पास तेल की कीमतों को बढ़ाने के अलावा कोई और विकल्प भी था, माहूरकर कहते हैं कि पेट्रोलियम उत्पादों पर लगे कर कम होने चाहिए। राशनिंग के बारे में भी उनकी राय अच्छी नहीं है।
भारत दुनिया में तेल का सातवां सबसे बड़ा आयातक देश है और उपभोग के मामले में छठे स्थान पर आता है। दरअसल इस समय पूरी दुनिया में तेल की कीमतों ने कोहराम मचा रखा है और आयात पर निर्भर होने की वजह से भारत के पास विकल्प न के बराबर हैं।
तेल की कीमतों में अगर एक डॉलर की बढ़ोतरी होती है तो तेल कंपनियों पर 3,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ और पड़ जाता है। ऐसे में सरकार के पास तेल की कीमतें बढ़ाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। केपीएमजी में एसोसिएट डायरेक्टर कुमार मनीष का मानना है कि इस कदम की जरूरत थी। कई लोग तेल बांड को इससे निजात का हथियार मानते हैं, पर यह स्थाई हल नहीं है।
एक दूसरे विश्लेषक का कहना है कि तेल की आग से निजात पाने के लिए सरकार को राशनिंग का रास्ता अख्तियार करना चाहिए। उनका कहना है कि जब एक-एक घर में पांच-पांच कारें हैं, तो लोगों को पूल बनाकर चलना चाहिए। हालांकि अर्नेस्ट एंड यंग में साझीदार अजय अरोड़ा का मानना है कि यह सही कदम नहीं बल्कि वह कीमत बढ़ाने का स्वागत करते हैं।
क्यों बढ़े कच्चे तेल के दाम?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों के बढ़ने की कई वजहें हैं। सबसे बड़ी, अमेरिका जो कि दुनिया में तेल का सबसे बड़ा आयातक और उपभोक्ता है। दूसरी ओर दुनिया के कुल तेल उत्पादन में 40 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले ओपेक देशों की बैठक सितंबर में होने वाली है और उससे जुड़े लोग बार-बार यही कह रहे हैं कि उत्पादन नहीं बढ़ाया जाएगा।
ओपेक का आरोप है कि तेल की आपूर्ति किसी भी सूरत में कम नहीं है, केवल सट्टेबाजी की वजह से तेल की कीमतों में उफान आया है। दूसरे देशों की मुद्राओं के मुकाबले डॉलर में आई कमी को भी इसकी वजह समझा जा रहा है, क्योंकि निवेशक पूंजी बाजार का मोह छोड़कर तेल में निवेश को फायदे का सौदा मान रहे हैं, इस वजह से भी तेल की कीमतें बढ़ी हैं।