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मुश्किल बनती सरकारी अतिसक्रियता

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 12:43 AM IST

इस साल गेहूं और चावल की सरकारी खरीद के नए रिकॉर्ड को छूने की संभावना को देखते हुए लग तो यही रहा है कि मुल्क पर मंडरा रहे खाद्यान्न संकट के बादल छंट चुके हैं।


सरकारी भंडार में आज की तारीख में इतना अनाज जमा हो चुका है, जो मुल्क की बफर जरूरत से कहीं ज्यादा है। सरकार के लिए यह खबर ऐसे वक्त में राहत का सबब बनकर आई है, जब वह महंगाई के खिलाफ हर मोर्चे पर हारती जा रही है।

कुछ अहम राज्यों के विधानसभा चुनावों और आम चुनाव को देखते हुए भी इसे सरकार के लिए खुशखबरी माना जा सकता है। मोटे-ताजे स्टॉक ने खाद्यान्नों की आयात की जरूरत को भी खत्म कर दिया है, जिसकी वजह से देश में अच्छा-खासा विवाद खड़ा हो गया था।

इन बातों पर हमें खुश होने का हक तो है, लेकिन  आने वाले कल पर नजर भी रखनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार द्वारा अपने स्टॉक के लिए जरूरत से ज्यादा अनाज खरीद लेने से कई बड़ी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। अब गेहूं को ही ले लीजिए।

फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) और राज्य सरकारों ने मिलकर दो से लेकर 2.1 करोड़ टन गेहूं खरीद लिया है। मतलब, देश में गेहूं की कुल पैदावार का 90 फीसदी हिस्सा तो सरकारी गोदामों में जमा हो गया है। दूसरी तरफ, कारोबारियों ने इस साल केवल 3.4 लाख टन ही गेहूं खरीदा, जबकि पिछले साल उन्होंने 25 लाख टन की खरीद की थी।

डर इस बात का है कि इससे खासतौर पर ऑफ सीजन में खुले बाजार में गेहूं की कमी हो सकती है, जिससे इसकी कीमतों में और इजाफा हो सकता है। जरूरत यह समझने की है कि जिस सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए 90 फीसदी गेहूं को उठा लिया गया है, उससे केवल 35-40 फीसदी आबादी का ही पेट भरता है।

ज्यादातर लोगों की जरूरत को तो निजी कारोबारी ही पूरा करते हैं, जिन पर कालेबाजारी और जमाखोरी की दुहाई देते हुए कड़े नियम कायदे लाद दिए गए हैं। माना कि बड़े स्तर पर गेहूं का उत्पादन करने वाले किसान अपनी फसल के कुछ हिस्से को जमा रखते हैं, ताकि वे ऑफ सीजन में उन्हें ऊंची कीमतों पर बेच सकें।

लेकिन ऐसे किसानों की तादाद काफी कम है। इसलिए अच्छे उत्पादन के बावजूद मांग को पूरा करने के लायक फसल नहीं होगी, अगर सरकार अपने अनाज स्टॉक के कुछ हिस्से को खुले बाजार में नहीं उतारती। जहां तक चावल की बात है, तो वहां मुश्किलें दूसरी तरह की हैं। इसकी वजहें सरकार के ही अपने कुछ गलत कदम हैं। इनमें गैर बासमती चावल के निर्यात पर रोक और बासमती चावल पर एक्सपोर्ट टैक्स लगाना है।

इनका खामियाजा आखिर में घरेलू बाजार में कम कीमतों के रूप में किसानों को ही भुगतना पड़ा। भारत चावल का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक मुल्क बन चुका है। इस वजह से किसानों को अच्छी कमाई होने लगी थी, लेकिन उनसे यह फायदा भी अब छीन चुका है। इसलिए इन असरों को देखते हुए सरकार को अब अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए, ताकि महंगाई का घोड़ा काबू में रहे।

First Published : May 20, 2008 | 10:52 PM IST