ऐसा ही रहा तो नहीं उभरेगा बंगाल
चिंतामणि पाण्डेय
वरिष्ठ अधिवक्ता दीवानी, ओरीजोत, गांधी नगर, बस्ती, उत्तर प्रदेश
उद्योगपति हो या आम आदमी सबकी पहली प्राथमिकता अमन-चैन व सुरक्षा की होती है। नैनो परियोजना में रुकावट से आहत रतन टाटा के साक्षात्कार से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखने वाले इस महत्वाकांक्षी उद्योगपति का साहस भी जवाब दे रहा है।
दुखी मन से उनका सिंगुर छोड़कर अन्य राज्य में इस परियोजना को स्थापित करने का निर्णय यह साबित करता है कि पश्चिम बंगाल में अराजकता का वातावरण दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। हालात बेकाबू हैं। हालात ऐसे ही रहे तो इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल का पिछड़ापन, गरीबी और बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है।
देशहित में है यह परियोजना
के. के. अस्थाना
राजकीय कर्मचारी, उत्तर प्रदेश सरकार
नैनो परियोजना ने केवल पश्चिम बंगाल के लिए ही नहीं बल्कि देश के हित में है। इस परियोजना का आकलन एक राज्य से करना ठीक नहीं है। ममता बनर्जी का आचरण पूरे देश के उद्योग जगत को प्रभावित करने वाला है। नैनो परियोजना समूचे देश की है। राष्ट्र गौरव इसके साथ जुड़ा है। केंद्र सरकार को पहल कर ममता को इससे अलग कर देना चाहिए। कम से कम देश इस बड़ी परियोजना के निर्माण से वंचित तो न हो।
राजनेताओं से सख्ती से निपटे सरकार
कृष्ण कुमार उपाध्याय
एडवोकेट, जनपद बार एसोसिएशन, बस्ती, उत्तर प्रदेश
नैनो परियोजना को लेकर सिंगुर के लोगों को आंदोलित करके वहां की स्थानीय नेता ममता बनर्जी अपना राजनीतिक कद ऊंचा बनाने का प्रयास कर रही हैं। उन्हें न तो सिंगुर के विकास की चिन्ता है और न ही वहां के लोगों की खुशहाली की।
फूट डालो और राज करो की मानसिकता से वे वहां के लोगों को गुमराह करके नैनो परियोजना में रुकावट डाल रही हैं, केंद्र सरकार को ऐसे जनविरोधी निर्णय लेकर आंदोलन करने वाले सभी राजनेताओं से सख्ती से निपट कर उद्योग जगत को इस बात का भरोसा दिलाना चाहिए कि उन्हें सुरक्षा और जरूरी-सहूलियतें देने के लिए सरकार तत्पर है।
समझदारी से उठाना होगा कदम
ओ.पी.मालवीय
भोपाल
नैनो परियोजना को लेकर पश्चिम बंगाल में जो हालात बने हुए हैं, वहां के मुख्यमंत्री को चाहिए कि स्थिति को भापते हुए और बहुत समझदारी से कदम उठाएं। यानी सरकार को बीच का रास्ता निकलना होगा। सरकार को चाहिए कि रतन टाटा को मना ले और नैनो परियोजना को राज्य में ही रहने दे। इसमें कोई शक नहीं कि इससे राज्य का ही फायदा होगा।
कंपनी को भी चाहिए कि वह सरकार के साथ बातचीत करे और बेहतर हल निकाले। किसानों को जमीन का बेहतर मुआवजा मिलना चाहिए। सरकार की भी छवि न खराब हो, इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए। अगर राज्य का विकास होगा, तभी अन्य कंपनियां भी वहां निवेश करेंगी।
सरकार की भूमिका सवालों के घेरों में
सिम्प्रित सिंह
सामाजिक कार्यकर्ता, नायगांव-दादर, मुंबई
गौरतलब है कि नैनो संयंत्र को स्थापित करने से पूर्व सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में थी और संयंत्र स्थापित करने के बाद भी कमोबेश तस्वीर यही झलक रही है। सबसे अहम बात है कि सरकार ने जिन किसानों की जमीन को हथियाकर टाटा को जमीन दी, उन किसानों को सरकार ने विश्वास में नहीं लिया।
सरकार का यह कदम गैर लोकतांत्रिक है, जो संविधान के अधिनियम 73 का उल्लंघन है। उल्लेखनीय है कि सरकार को निर्णायक चर्चा के पश्चात ही संयंत्र के लिए जमीन सौंपनी चाहिए थी। इसके अलावा वर्तमान में जिस जमीन पर संयंत्र स्थापित है , वह जमीन उपजाऊ है और सिंगुरवासियों की मांग है कि उपजाऊ जमीन को वापस कर गैर उपजाऊ जमीन पर नैनो संयंत्र प्रस्थापित करना चाहिए।
जमीन लीज पर मिलनी चाहिए
राजेंद्र प्रसाद मधुबनी
व्याख्याता मनोविज्ञान, फ्रेंड्स कॉलोनी, मधुबनी, बिहार
नैनो परियोजना की सफलता के लिए भरपूर सरकारी मदद मिलनी चाहिए। क्योंकि इसकी सफलता से हर मध्यमवर्गीय परिवार के दिवास्वप्न को धरातल पर लाने की बातें निहित है। जमीन देने वाले निम्नवर्ग में घबराहट इस बात की है कि अंग्रेज के समय भी मुआवजा दिया जाता था फिर उसे हटाने की आवश्यकता गरीबों को भी क्यों पड़ी थी?
आज भी औने-पौने दाम में ली जमीन कुछ समय के बाद आसमान छूने क्यों लग जाती है? इस हकीकत को सभी समझकर ही उलझ रहे हैं। किसान से जमीन सीधे लीज पर दिलवाकर, शेयरधारक बनाकर प्रशिक्षण संरक्षण देना चाहिए क्योंकि वह अपने जीवन का आधार जमीन जिसके माध्यम से कई पुश्त आनंद से रह रहा था और रहता। वहीं कुछ लाख पाकर वह दुनिया की चकाचौंध में खो जाएगा, फिर बाल-बच्चों का क्या होगा?
दोनों ही हालात में जनता ही भुगतेगी
डॉ. जी.एल. पुणताम्बेकर
रीडर, वाणिज्य विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर, मप्र
दुनिया की सबसे सस्ती कार के तमगे के साथ देश के लगभग 72 लाख दुपहिया वाहन धारकों को कार मालिक बनाने के स्वप्न की कीमत केवल सिंगूर के किसानों की 400 एकड़ जमीन ही नहीं है। कार मालिक बनने के बाद उसे रखने के लिए घर-गली मोहल्ले और चलाने के लिए सड़कों की स्थिति किससे छुपी है?
फिर तेल और खाद्यान्नों की कीमतों से झुलसी सरकार को नैनो परियोजना की कीमत टाटा के 1500 करोड़ के निवेश के पूर्व तय करनी चाहिए थी। दुर्भाग्य यह है कि बुध्ददेव सरकार अपनी प्रगतिशीलता की छवि से तो ममता बनर्जी 4 करोड़ किसान मतदाताओं की हितैषी बनकर केवल वोट की जुगाड़ में हैं। टिकाऊ तथा समावेषी विकास के लिए तो कृषि और औद्योगिकरण के समन्वय की नीति ही निर्विकल्प है, जिसकी उपेक्षा की कीमत दोनों स्थितियों में जनता ही चुका रही है।
किसानों को मिलें जमीन के ऊंचे दाम
भरत कुमार जैन
अध्यक्ष, फोरम ऑफ एग्रो इंडस्ट्रीज, 14, जानकी नगर, अनेक्स-1 इंदौर, मप्र
विशेष आर्थिक क्षेत्र और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण पर असंतोष तो पूरे देश में किसी न किसी कारण से जरूर है। उपजाऊ खेती की जमीन पर विशेष आर्थिक क्षेत्र नहीं बनाने दिया जाना चाहिए। लेकिन यदि ऐसा किया जाना आर्थिक विकास की मजबूरी है तो जमीन मालिकों को उनकी जमीन के अधिकतम दाम दिया जाना समय और न्याय की मांग है।
टाटा ने विश्व के आर्थिक परिदृश्य पर उंची बोली लगाकर कंपनियां खरीद कर अपने कार्य के विस्तार को बढ़ाया है, तो फिर गरीब किसानों की जमीन सस्ती दर पर, शासन से अधिग्रहित करवा कर कम दाम पर लेने के प्रयास क्यों किए जा रहे हैं।
टाटा की सस्ती कार बनाने की परियोजनाएं कुछ हद तक निर्माण का स्वरूप ले चुकी हैं और वर्तमान में दो राजनैतिक दलों के आपसी झगड़े का शिकार बन गईं हैं। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दलों का उद्देश्य राजनैतिक लाभ प्राप्त करना है।
आखिरकार जरुरत क्या है नैनो की?
उल्का महाजन
राष्ट्रीय संयोजक – नैशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मुवमेंट, मुंबई
सरकार को यदि नैनो संयंत्र की रुकावटों को हर हाल में दूर करना होगा तो सबसे पहले स्थानीय लोगों को विश्वास में लेना बेहद जरूरी है। गौरतलब है कि बिना किसी योग्य बातचीत के किसी योजना को अमलीजामा पहनाना गैर लोकतांत्रिक कदम है। जिसका तात्पर्य है कि कोई भी परियोजना जबर्दस्ती नहीं चलाई जा सकती है अन्यथा उसका अंजाम वही होगा जो वर्तमान में सिंगुर में हो रहा है।
इसके अलावा सवाल यह है कि क्या वाकई में नैनो जैसी कार की कोई आवश्यकता है? सरकार को चाहिए कि कॉर्पोरेट जगत के बहकावे में आने की बजाय पेट्रोल, डीजल और सार्वजनिक यातायात के साधनों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। यदि बुनियाद मजबूत होगी तो आशा है कि भविष्य भी सुनहरा होगा।
विरोध करने वाले राष्ट्रविरोधी
ओ. पी. शर्मा
पूर्व विभागाध्यक्ष, डीएवीपीजी कॉलेज, लखनऊ
नैनो परियोजना का विरोध करने वाले राष्ट्रविरोधी तत्व हैं। देश नहीं परदेश में इस कार का डंका बज चुका है। ऐसे मौके पर इसका विरोध राष्ट्रद्रोह है। भारत सरकार को ऐसे लोगों से सख्ती से निपटकर कानून का राज्य स्थापित कर देना चाहिए। उत्तर प्रदेश में जहां निजी सरकारी क्षेत्र की पहल की बात हो रही है, वहां तो ममता बनर्जी जैसे तत्वों का प्रवेश प्रतिबंधित होना चाहिए।
देश की विकास विरोधी तस्वीर बन रही
सुरेन्द्र श्रीवास्तव
प्रवक्ता, लोकसत्ता मुवमेंट, मुंबई
फिलहाल सिंगुर में जो हो रहा है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उल्लेखनीय है कि सरकार दीर्घावधि योजनाओं को लघु अवधि योजनाओं में परिवर्तित करने का मन बना चुकी है। हालांकि दूरगामी योजना वाकई में लाभदायक है, लेकिन वोट बैंक के चलते नैनो संयंत्र राजनीति का शिकार हो गया है। परिणामस्वरूप वैश्विक परिदृश्य में विकास विरोधी राष्ट्र के रुप में भारत की तस्वीर जा रही है।
ऐसे में सरकार को चाहिए कि जल्द से जल्द सिंगुरवासियों से बातचीत कर मामले को निर्णायक स्थिति में पहुंचाए। यदि इससे समस्या का हल नहीं निकलता है तो बल प्रयोग करें और नैनो संयंत्र में कार्यरत कर्मचारियों को पूर्ण तरीके से सुरक्षा प्रदान की जाय। इस मुहिम से विकास की बहार आएगी और नैनो संयंत्र शुरू होने के साथ-साथ आर्थिक विकास को भी बल मिलेगा।
किसान भी खुश रहें, टाटा भी
मंजरी पाण्डेय
राष्ट्रीय उर्वरक भण्डार, भीती चौराहा, गोशाईगंज, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश
भूख, आवास, आजीविका और विस्थापन की कीमत पर सरकार नैनो परियोजना को पूरा न करे। अधिग्रहित जमीन के किसानों को उचित मुआवजा और पुनर्वास के विकल्पों को सोचकर ही सरकार इस परियोजना को पूरा करे। टाटा मोटर्स एक ग्लोबल ब्रांड है, इसे पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि देश का कोई भी राज्य यहां तक कि पड़ोसी राष्ट्र भी अपने यहां आमंत्रित कर सकते हैं।
लेकिन बेहतर यह होगा कि संयंत्र यही लगाया जाए। इससे उत्पन्न समस्याओं के निराकरण के बाद ही यह योजना पूरी हो। किसान आंदोलन और विकास दोनों के अपने अलग-अलग कारण और प्रभाव है। सरकार को एक दूसरे के लिए समस्या बनने से रोकना होगा। विकास, पुनर्वास, रोजगार, आजीविका सभी में समन्वय स्थापित करना होगा। एक कृषि प्रधान देश को विकसित राष्ट्र में बदलने का यही एक सूत्र है।
सर्वोच्च प्राथमिकता दें नैनो को
पौरूष उपाध्याय ‘हिमांशु जी’
8262 बैरिहवां, गांधी नगर बस्ती, जनपद-बस्ती, उत्तर प्रदेश
नैनो परियोजना की रुकावट दूर करने के लिए सरकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो रतन टाटा की लखटकिया कार यानी नैनो की महत्वाकांक्षी योजना तो प्रभावित होगी ही, लेकिन इससे यह भी साबित हो जाएगा कि सरकार उद्योग जगत को सुरक्षा और सहूलियतें देने में नाकाम है और कानून व्यवस्था के ऊपर अराजकता भारी पड़ रही है।
यह वातावरण दुखद होने के साथ ही यह साबित करता है कि ममता बनर्जी और उनका साथ दे रहे राजनेताओं को पश्चिम बंगाल के विकास की चिंता कम है और अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की ज्यादा है। यह दुखद है। सरकार को ऐसे अराजक तत्वों से कड़ाई से निपटना चाहिए।
केंद्र सरकार मामले में हस्तक्षेप करे
ओ. पी. भट्ट
प्रवक्त, राजकीय आयुर्वैदिक कॉलेज, लखनऊ
रतन टाटा की नैनो कार ने देश नहीं विदेशों में सबका ध्यान अपनी ओर खींचा था। नैनो परियोजना का बंगाल में बनना देश के लिए गौरव की बात थी। राज्य सरकार अगर डर कर काम करेगी तो कुछ भला नहीं होना है। ममता को सिंगुर के आसपास का कुछ चुनावी फायदा दिखता है और राष्ट्रहित नहीं।
वे सिर्फ राजनीति स्वार्थों के लिए इस तरह कर रही हैं। केंद्र सरकार को पूरे मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए क्योंकि यह पार्टी हित से बड़ा मामला हो चुका है। मनमोहन सिंह को व्यक्तिगत रुचि लेकर मामले को सुलझाना पड़ेगा।
पुरस्कृत पत्र
नहीं चाहिए भूख व आंसुओं वाली नैनो
प्रशांत कुमार दूबे
ग्राम-भगवानपट्टी, पोस्ट-मिझौड़ा, अंबेडकरनगर, उप्र
नैनो परियोजना का विरोध राजनीति और चुनावी शगूफे से ज्यादा भी कुछ है। यह एक ऐसी परियोजना है जो किसानों से उनकी उपजाऊ भूमि और आवास छीन रही है। क्या यह परियोजना उसी उपजाऊ भूमि में ही लग सकती है? क्या किसानों को विस्थापित करके ही लग सकती है? यदि ऐसा है तो नहीं चाहिए ऐसी कार जिसमें बैठने के लिए गरीब किसानों को बेघर होना पड़े, आजीविका गंवानी पड़े।
औद्योगीकरण होना चाहिए लेकिन रक्तरंजित जमीन पर औद्योगिकीकरण, वह भी इसलिए कि हम भूखे, बेघर लोगों को दुनिया की सबसे सस्ती कार दे सकें। सबसे सस्ता ट्रैक्टर बनाने के लिए क्यों नहीं कोई सिंगुर बना? देश में और जगहों पर भी मोटर-उत्पादन इकाइयां लगी हैं और वहां कि सानों की सहभागिता भी रही है।
अन्य सर्वश्रेष्ठ पत्र
सुरक्षा का दायित्व राज्य सरकार पर
सौरभ राज
सी-297298, नेहरु विहार (तिमारपुर), नई दिल्ली-54
सिंगूर में नैनो परियोजना को एक बिना विवाद का विवादित विषय बनाया जा रहा है। मुख्य रूप से यह राज्य सरकार की राजनैतिक इच्छा शक्ति की कमजोरी को ही दर्शाता है। क्योंकि जो जमीन राज्य सरकार की स्वीकृति के बाद टाटा को नैनो निर्माण के लिए दी गई, उसकी सुरक्षा का दायित्व भी पूरी तरह राज्य सरकार को लेनी चाहिए और उस पर की सिंगुर का नैनो निर्माण का कारखाना उत्पादन के लिए तैयार हो चुका है। यह बिल्कुल भी ठीक नहीं है कि कृषकों को उनके जमीन के बदले कम मुआवजा मिले।
लोगों को विश्वास में लेने की जरूरत
डॉ बी. के. वर्मा
प्रभारी चिकित्साधिकारी, एस. एम. होमियो हॉस्पिटल, गोटवा, बस्ती, उप्र
सरकार को चाहिए कि सिंगुर में रतन टाटा की नैनो परियोजना से 400 एकड़ भूमि वापसी की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे लोगों को विश्वास में लेकर बताएं कि इस परियोजना से पश्चिम बंगाल के विकास को गति मिलेगी, बेरोजगारी दूर होगी, क्षेत्रीय महत्व बढ़ जाएगा, इससे वहां के लोगों को रोजी-रोटी की तलाश में बाहर जाकर भटकने से छुटकारा मिल जाएगा। सकारात्मक पहल हो तो कोई कारण नहीं कि वहां का आंदोलन समाप्त हो जाए और यह परियोजना अपनी तयशुदा समय सीमा में आरंभ हो जाए।
असंतोष फैलना तो स्वाभाविक है
शैलेश गांधी
कार्यकर्ता, सूचना के अधिकार, सांताक्रूज, मुंबई
अगर हम सच्चाई पर गौर करें तो इस पूरे विवाद में सरकार का असली चेहरा सामने आता है। जिसमें जमींदारों और उद्योगपतियों को बसाने का मकसद जगजाहिर है। अमूमन इसी विचारधारा को लेकर टाटा मोटर्स को सिंगुर में नैनो संयंत्र स्थापित करने का न्योता दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि आखिरकार किसानों की जमीन सरकार द्वारा हथियाकर उसे उद्योगपतियों को रियायत पर देने का क्या औचित्य है? साथ ही किसानों को उनकी जमीन का भाव कौड़ी के मोल मिले तो ऐसे में असंतोष फैलना स्वाभाविक है।
आर्थिक पहलू नजरअंदाज न हो
विजय व्यास
मातृछाया, 17, प्रभात कॉलोनी, शिलांगण रोड, अमरावती
ममता बनर्जी इस परियोजना के आर्थिक पहलू को नजरअंदाज कर रही हैं। वास्तव में वह स्वार्थपरक राजनीति का खेल खेल रही हैं और देशहित से कोई मतलब नहीं है। उनके इस आंदोलन से बौध्दिक स्तर पर जुड़े लोग अब दूर होते जा रहे हैं। इसके पहले भी एक प्रकल्प नंदीग्राम में बसने से पहले ही उजड़ चुका है। लोग यह महसूस करने लगे हैं कि अगर नैनो कारखाने के मामले में ‘टाटा’ जैसे औद्योगिक क्षेत्र के दिग्गज घराने ने उनके राज्य को ‘टा-टा’ कर दिया तो इससे पश्चिम बंगाल में उनकी प्रतिभा मलिन हो जाएगी।
बकौल विश्लेषक
परियोजना शुरू करने का सवाल ही नहीं पैदा होता है
मेधा पाटकर
सामाजिक कार्यकर्ता, नर्मदा बचाओ आंदोलन
किसानों की जमीनों पर किसी फैक्टरी के लगाने या फिर किसी भी परियोजना को शुरू करने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। जमीन आखिर किसान की जीविका होती है। जमीन ही छिन जाएगी तो किसान क्या करेगा। इसलिए पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार को चाहिए कि वह सबसे पहले उन किसानों की जमीन वापस करे, जो उसने नैनो परियोजना के लिए उनसे छीन ली है।
दूसरी बात यह कि टाटा अगर अपना नैनो संयंत्र किसी अन्य राज्य में ले जाना चाहते हैं तो ले जाएं, अन्य राज्यों की सरकारें तो बेसब्री से उनका इंतजार कर ही रही हैं। किसी कारखाने के लिए सिंगुर की इस उपजाऊ भूमि को लेना का क्या औचित्य है? जहां तक सिंगुर में इस विवादित जमीन पर नैनो संयंत्र लगने या न लगने की बात है तो इस बारे में सिंगुर के लोग बहुत पहले फैसला कर चुके हैं।
वर्तमान में जो कुछ भी नैनो संयंत्र को लेकर सरकार जो कुछ भी निर्णय कर रही है, वह गैर लोकतांत्रिक और जन विरोधी है। जनहित के किसी भी कार्य को अंजाम देने के लिए सरकारों को लोकतांत्रिक मार्ग अपनाना चाहिए। लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार ने जैसे हालात सिंगुर में बना दिए हैं, उनसे बिलकुल नहीं लगता कि नैनो संयंत्र बिना रुकावट शुरू हो पाएगा।
कॉर्पोरेट जगत की चकाचौंध भूलकर सरकारों को जनहित के कार्यों के लिए मुख्यधारा से जुड़े रहना चाहिए। जनहित को सर्वोपरि रखकर ही सरकार नैनो संयंत्र की रुकावट दूर कर सकती है और विश्वपटल पर भारत को विकास की ओर अग्रसर कर सकती है।
बातचीत: अरुण कुमार यादव
तब कहां थे ये दल, जब समझौता हो रहा था
विशाल जैन
कंट्री हेड, स्पार्टा इंफोटेक इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा
सरकार को किसी भी हाल में नैनो परियोजना के सामने आने वाली रुकावट को दूर करना चाहिए। पश्चिम बंगाल में इतना बड़ा निवेश पहली बार हो रहा है। इससे सैकड़ों लोगों को रोजगार मुहैया होगा। एक तरफ हम कहते हैं कि देश को आगे बढ़ाना है और ऐसे में अगर इतनी बड़ी कंपनी को सुरक्षा एवं सहायता नहीं मिलती है तो तरक्की कैसे होगी।
वहां की कुछ राजनीतिक पार्टियां सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए इस परियोजना में टांग अड़ा रही हैं। आज जब इस परियोजना पर इतना निवेश किया जा चुका है, तब ये पार्टियां उठकर क्यों आ रही हैं? वे उस वक्त कहां थी, जब 400 एकड़ जमीन को लेकर टाटा समूह और वहां की वर्तमान सरकार में समझौते हो रहे थे? वहां की पार्टियां नजदीक के फायदे के लिए दूर का नुकसान सोच ही नहीं रही हैं।
जहां तक परियोजना शुरू करने की बात है तो वह इस राज्य में नहीं तो दूसरे राज्य में सही, कहीं न कहीं तो शुरू होगी। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा नुकसान पश्चिम बंगाल की सरकार और वहां की जनता का होगा। अगर टाटा बंगाल से खाली हाथ लौटते हैं तो वहां अन्य कंपनियां भी निवेश करने में हिचकेंगी। वहां के निवेश पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।
जहां तक टाटा के शेयर का सवाल है तो इन गतिविधियों से शेयर पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ने वाला है। लेकिन इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इससे नैनो के उत्पादन में थोड़ी देरी हो सकती है और परिणामस्वरूप उसकी बिक्री पर भी असर पड़ सकता है। हालांकि यह आशंका तभी लगाई जा रही है जब टाटा को बंगाल से जाना पड़ जाए। देश का विकास उद्योगपतियों की वजह से ही हो रहा है। सरकार प्राइवेटाइजेशन को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा दे।
बातचीत:पवन कुमार सिन्हा
…और यह है अगला मुद्दा
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आशा है, हमारी इस कोशिश को देशभर के हमारे पाठकों का अतुल्य स्नेह मिलेगा।